Sunday, Oct 17, 2021
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leaders do not want to get out of caste handi or are unable to do so musrnt

नेता जातीय हांडी से बाहर नहीं निकलना चाहते या ऐसा करने में अक्षम हैं

  • Updated on 8/11/2021

अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन ने अपनी पुस्तक  ‘द रीयल वार’ में लिखा है, ‘‘यह विचार कि हम अपनी स्वतंत्रता को सद्भावना फैलाकर बचा सकते हैं, न केवल बचकाना है, अपितु खतरनाक भी है।’’ उनके इन चेतावनी भरे शब्दों पर हमारे नेतागणों ने कोई ध्यान नहीं दिया है। हमारे नेतागण अब स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रहे हैं और वे ‘सबका साथ, सबका विकास’ तथा ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे लुभावने भाषण देते हैं और उनमें आम आदमी का कर्कश मौन प्रतिध्वनित होता है।

दु:खद तथ्य यह है कि गत 75 वर्षों में कुछ भी नहीं बदला। आज भी भारत जातिगत मतभेदों के दुष्चक्र में फंसा हुआ है, जहां पर दलित, जो हिन्दू जातीय पदानुक्रम में सबसे निचले क्रम में आते हैं, उनके साथ आज भी वही पुराना व्यवहार किया जाता है। पिछले 10 दिनों में दलितों के साथ जातीय घृणा ने पुन: अपना सिर उठा दिया है। 

भारतीय महिला हॉकी टीम की ओलिम्पिक सैमीफाइनल में अर्जेंटीना से हार के बाद हरिद्वार में भारतीय महिला हॉकी टीम की कैप्टन वंदना कटारिया के घर के बाहर उच्च जाति के लोगों ने उनका उपहास करते हुए नृत्य किया, पटाखे छोड़े और जातीय अपशब्द कहे। उन्होंने इस हार का कारण महिला हॉकी टीम में कई दलित खिलाड़ियों को बताया।

दिल्ली में 9 वर्षीय गरीब दलित बच्ची के साथ कुछ पुजारियों द्वारा सामूहिक बलात्कार किया गया, जिसका बाद में जल्दबाजी में अंतिम संस्कार किया गया, जिसके बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक तू- तू, मैं- मैं देखने को मिली। राहुल पीड़ित परिवार से मिलने गए और उनका साथ देने का वायदा किया जबकि भगवा ब्रिगेड ने उन पर आरोप लगाया कि वह बलात्कार के मामलों में प्रतिक्रिया करने को लेकर चयनात्मक नीति अपनाते हैं। वह कांग्रेस शासित पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में दलितों पर अत्याचार के मामले में चुप्पी साधे रहते हैं। 

दलितों के संरक्षण के लिए कानूनों के बावजूद सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष उनके विरुद्ध 46,000 अपराध दर्ज किए गए। नौ राज्यों- राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और ओडिशा में वर्ष 2019 में हुए कुल अपराधों में से दलितों के विरुद्ध 84 प्रतिशत अपराध हुए। हालांकि देश में दलितों की जनसंख्या 25 प्रतिशत है किंतु देश की जेलों में कैदियों की संख्या में उनकी संख्या 33.$2 प्रतिशत है।

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार देश में प्रत्येक दिन 15 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है। वर्ष 2009-2019 के बीच दलित महिलाओं पर हमले की घटनाओ में 5 प्रतिशत की गिरावट आई किंतु दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाओ में इस अवधि में लगभग 111 प्रतिशत की वृद्धि हुई और उनकी संख्या 1346 से बढ़कर 1486 तक पहुंच गई जबकि सजा दिलाने की दर मात्र 32 प्रतिशत है।

युवा दलितों में उभरती आकांक्षाओं के कारण उच्च जाति के लोगों द्वारा उनके साथ हिंसा की जा रही है क्योंकि वे इन जातियों की प्रगति को पचा नहीं पा रहे। इन दलितों के अपराध तुच्छ हैं। वे मूंछें बढ़ा लें, जाति से बाहर शादी करें, बारात में घोड़ी पर चढ़ें या उच्च जातियों के मोहल्ले से गुजरें तो उनके साथ हिंसा हो जाती है।

मत पत्र के माध्यम से सामाजिक इंजीनियरिंग आज राजनीतिक दलों की सफलता का मंत्र बन गया है और लोगों का मानना है कि केवल 15 प्रतिशत ब्राह्मण और ठाकुर ही क्यों राज करें। दूसरे शब्दों में, आज राजनीतिक जागरूकता जाति और समुदाय के स्तर पर आकर ठहर जाती है। फलस्वरूप लालू, मुलायम और मायावती जैसे मेड इन इंडिया नेताओं के उदय के साथ जातीय मतभेद बढ़े हैं। वे दलितों को एक नई पहचान देते हैं और उनके दृष्टिकोण में बदलाव लाते हैं।

जीवन के किसी भी क्षेत्र-राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, शैक्षणिक या न्यायिक, किसी को भी चुनें, जाति का बोलबाला है, जिससे एक ऐसी स्थिति बन गई है कि हर चीज को जातीय आधार पर देखा जाता है। आज के समाज में विभिन्न जातियों के बीच संघर्ष है और कोई भी पार्टी अपने जातीय वोट बैंक को खतरे में नहीं डालना चाहती।

विभिन्न जातियां मानती हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ है और वे रोजगार आदि के क्षेत्र में अपनी अपूर्ण आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए आरक्षण की मांग करती हैं, ताकि समाज में आगे बढ़ सकें। किंतु आरक्षण से न तो रोजगार की समस्या का समाधान हुआ और न ही जातीय समावेशन को बढ़ावा मिला। दलित समाज सामाजिक और राजनीतिक रूप से निराश है।  
हमारे नेता इतिहास से सबक लेते। इतिहास बताता है कि भारत में सभी संघर्ष जातीय आधार पर हुए हैं। 1976 में बिहार के बेलची में ठाकुर- दलित संघर्ष से लेकर 1980-90 के दशक में जाट-सिख उपद्रव और कश्मीर में दो दशक से अधिक समय से पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों द्वारा हिन्दू पंडितों का सफाया इसका उदाहरण है। आज हर पार्टी जातीय जीरो-काटा खेल में व्यस्त है। जिसके चलते हम आज भारत को वह देश नहीं मान सकते, जिसे कभी एमरसन ने मानवीय विचारों का शिखर कहा था।

जातीय आधार पर वोट बैंक बढ़ाना आसान है, किंतु साथ ही वर्तमान में चल रहा जातीय सत्ता का खेल और जातीय प्रतिद्वंद्विता खतरनाक भी है। इस दृष्टि से संपूर्ण सामाजिक सुधार आंदोलन निरर्थक हो जाएगा जो कि प्रगति की चाह रखने वाले किसी भी आधुनिक राष्ट्र के लिए आवश्यक है। 

नि:संदेह हमारे नेता या तो जातीय हांडी से बाहर नहीं निकलना चाहते अथवा ऐसा करने में अक्षम हैं। दीर्घकाल में इससे सभी वर्गों में असंतोष फैलेगा। भारत इस बात का साक्षी है कि विशेषाधिकार की शक्ति चुनावी प्रतिस्पर्धा के माध्यम से संख्या की शक्ति में बदल गई। अब समय आ गया है कि हर कीमत पर सत्ता प्राप्त करने की चाह रखने वाले हमारे नेताओं को वोट बैंक की राजनीति से परे सोचना और इसके दीर्घकालिक परिणामों पर विचार करना होगा। नहीं तो यह हमारे लोकतंत्र के लिए खतरनाक होगा। 

पूनम आई. कौशिश

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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