Thursday, Feb 27, 2020
light budget show in the defense budget

इस बार रक्षा बजट में नहीं दिखा ‘जोश’

  • Updated on 2/14/2020

देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए 2 हालिया रुझान-सेना का राजनीतिकरण और एक सपाट तथा नकारात्मक रक्षा आधुनिकीकरण बजट चिंताजनक है। इस बारे में मैं पहले ही काफी कुछ लिख चुका हूं कि कैसे सत्तारूढ़ राजनीतिक अभिजात्य वर्ग ने चुनावी लाभ के लिए सशस्त्र बलों का दोहन किया है- चाहे वह उड़ी हमला हो या बालाकोट हवाई हमले लेकिन इस प्रक्रिया में, उन्होंने उनका राजनीतिकरण किया है। भाजपा द्वारा राजनीतिक पोस्टरों पर सेना के सेवारत अधिकारियों की  तस्वीरें लगाना भयानक है लेकिन सेना और वायु सेना को ‘मोदीजी की सेना’ कहना बिल्कुल अस्वीकार्य है। इसी प्रकार वायु सेना के कमांडरों का उपयोग राफेल विमानों की खरीद को सही ठहराने के लिए करना भी गलत है।

कर्नाटक चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनरल के.एस. थिमय्या के बारे में 7 दशक पुरानी घटनाओं का जिक्र किया लेकिन उन्होंने गलत तरीके से जनरल के.एस. करियप्पा का नाम ले लिया जिससे दोनों परिवार आहत हुए। इसके विपरीत, नए सेना प्रमुख को सुनना उत्साहवर्धक था जब उन्होंने अपने सैनिकों को संविधान के बारे में याद दिलाया। हालांकि यह निराशाजनक था कि उन्होंने जम्मू और कश्मीर में अपने कार्यों का श्रेय सरकार को देने की कोशिश की, खासकर जब कानून निर्णय प्रक्रिया के अधीन है। वरिष्ठता मानदंड को नजरअंदाज करते हुए सेना प्रमुखों का चयन और चीफ आफ डिफैंस स्टाफ (सी.डी.एस.)की नियुक्ति की राजनीतिक प्रतिध्वनि होगी। 

सैन्य कार्यक्रमों में राजनीतिक प्रचार
वर्तमान सत्ता अपने पक्षपातपूर्ण एजैंडे को बढ़ावा देने के लिए सेवारत और सेवानिवृत्त कर्मियों को शामिल करने के बारे में चुनाव आयोग, राजनीतिक विरोधियों और वैटरन समुदाय द्वारा की जा रही आलोचना को सुनना नहीं चाहती हालांकि कई मामले न्यायालय के विचाराधीन हैं। हाल ही में वाॢषक परेड के दौरान राष्ट्रीय कैडेट कोर (एन.सी.सी.) कैडेट्स को संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री के थीम राजनीतिक और अनुचित थे। राजनीतिक उपलब्धियों के बारे में कैडेटों को यह कहना कि भारत 7 से 10 दिनों में पाकिस्तान को युद्ध में हरा सकता है, काफी हैरानी भरा था। ऐसे समय में जबकि सेना आधुनिकीकरण के लिए धन की कमी से जूझ रही है, राष्ट्रवादी प्रचार को बढ़ावा देना हैरानी भरा है।

प्रधानमंत्री, रक्षा एक्सपो 2020 के दौरान बढ़ा-चढ़ाकर उपलब्धियों को बताते हुए एक कलाश्निकोव राइफल के साथ लक्ष्य साधते देखे गए। एन.सी.सी. रैली में सैन्य राजनीतिकरण चरम पर था। यह अजीब था कि न तो किसी सेना प्रमुख और न ही सी.डी.एस. ने प्रधानमंत्री को कैडेटों को दिल्ली चुनावों के उद्देश्य से होने वाली राजनीतिक घटनाओं के बारे में बोलने से रोका। इसके विपरीत, हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई सी.डी.एस., जनरल एंगस जॉन कैम्पबेल ने ठीक यह किया: उन्होंने अपने रक्षा मंत्री क्रिस्टोफर पायने को रोक दिया  जब उन्होंने वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की उपस्थिति में सैन्य मुद्दों के बजाय राजनीतिक सवालों के जवाब देने शुरू किए तो उन्होंने कहा कि वह अपनी सेना को यहां से जाने के लिए कहेंगे- और उन्होंने ऐसा ही किया। कैम्पबेल नहीं चाहते थे कि उनके अधिकारी उनकी पार्टी की राजनीतिक उपलब्धियों पर अपने मंत्री का समर्थन करते दिखें।

बजट में रक्षा आबंटन का उल्लेख नहीं 
लगातार चौथे साल, इस महीने पेश किए गए 2020-21 के बजट के दौरान रक्षा आबंटन का उल्लेख नहीं किया गया। अपने मैराथन भाषण में,  वित्त मंत्री ने एक तमिल ऋषि को उद्धृत किया और कहा: ‘जिस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा एक सहस्राब्दी पहले महत्वपूर्ण थी, उसकी सरकार के लिए, यह आज का नम्बर एक मुद्दा है।’ लेकिन रक्षा आधुनिकीकरण के लिए उन्होंने जो धनराशि प्रदान की, वह कुछ और ही कहानी कहती है। 

रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार पहले से खरीदे गए हथियारों के लिए किस्तों का भुगतान करने के लिए फंड मुश्किल से पर्याप्त हैं। रक्षा मंत्री ने अपने ही मंत्रालय की खराब दुर्दशा के बारे में एक शब्द का उल्लेख किए बिना बजट की सराहना करते हुए एक बड़ी प्रैस विज्ञप्ति जारी की। इसी तरह प्रधानमंत्री जो अभी भी सॢजकल स्ट्राइक के हैंगओवर का सामना कर रहे हैं, ने कुछ नहीं कहा, हालांकि 7 से 10 दिनों में परमाणु हथियार सम्पन्न पाकिस्तान को हराने की उनकी टिप्पणी हैरान करने वाली है, खासकर जब रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा है कि 10 दिवसीय गहन युद्ध के लिए  गोला-बारूद केवल 2022-23 तक उपलब्ध होगा।

अमरीकी राजदूत केनेथ जस्टर ने हाल ही में कहा कि आॢथक मंदी, जिसे सरकार ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है, रक्षा क्षमता के आधुनिकीकरण को प्रभावित करेगी।  आधुनिकीकरण फंड्स पर पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेतली ने कहा था, ‘रक्षा बलों के पास पैसा खर्च करने की उचित व्यवस्था नहीं है। हमारे पास उन्हें देने के लिए धन नहीं है। एक बार टैक्स नैट बढऩे के बाद ही फंड उपलब्ध होगा।’ 2014 के बाद से, जब भाजपा सत्ता में आई, रक्षा बजट 1962 के बाद से सबसे निचले स्तर पर है जोकि सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का लगभग 1.5 से 1.6 प्रतिशत पर रहा है। रक्षा और प्राक्कलन समिति की स्थायी समिति में भाजपा के अपने दिग्गजों, जनरल बी.सी. खंडूरी और एम.एम. जोशी ने रक्षा तैयारियों में बड़ी कमी की ओर इशारा किया था जिसके कारण  खंडूरी को इस काम से हटा दिया गया। 

रक्षा आबंटन में मौजूदा 5 प्रतिशत की वृद्धि के तुरंत बाद सी.डी.एस. ने स्पष्ट रूप से सेना प्रमुखों द्वारा किसी भी टिप्पणी पर एक तरह से रोक लगा दी, जब उन्होंने कुछ पत्रकारों से कहा कि बजट पर्याप्त था। बजट का प्रबंधन महत्वपूर्ण है और यह पर्याप्त धन का नहीं बल्कि प्रबंधन का मुद्दा है। उन्होंने यह भी कहा कि वे अधिग्रहण को प्राथमिकता देंगे, सेवानिवृत्ति की आयु को 58 वर्ष तक बढ़ाएंगे, भीतर से धन का सृजन करेंगे और यदि कोई अतिरिक्त आवश्यकता हुई तो इसके लिए सरकार से कहेंगे। प्रधानमंत्री ने एन.सी.सी. कैडेटों से बात करते हुए, सी.डी.एस. की नियुक्ति का उल्लेख किया, जिसमें विस्तार से बताया कि सेना प्रमुखों के साथ यह वन प्लस वन प्लस वन को दर्शाता है जोकि 111 बनता है। इसका अर्थ है कि सी.डी.एस. रक्षा मामलों में सर्वेसर्वा हैं।

2014 के चुनाव अभियान की गहमागहमी में प्रधानमंत्री द्वारा लिए गए वन रैंक वन पैंशन (ओ.आर.ओ.पी.) पर निर्णय वह था जिस पर अब उन्हें पछतावा हो रहा होगा। रक्षा पैंशन बिल 1.33 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है, जो वेतन के लिए 1.18 लाख करोड़ रुपए  से अधिक है। 2010 में यह 41,000 करोड़ रुपए था और पिछले साल यह 1.13 लाख करोड़ रुपए था। इस वर्ष ओ.आर.ओ.पी. बराबरी के लिए 6,500 करोड़ रुपए की और आवश्यकता होगी। टुथ टू टेल अनुपात में इस असंगति को ठीक किया जाना चाहिए। इसी प्रकार चीन के साथ आधुनिकीकरण के मामले में मुकाबला करने के लिए अधिक धन आबंटित किया जाना चाहिए, जिसका रक्षा बजट भारत से 3 गुना अधिक है।

चुनाव और युद्ध जीतना अलग-अलग मामले
जाहिर है, सॢजकल स्ट्राइक का जोश रक्षा तैयारियों में कमी के लिए कोई कवर नहीं है। चुनाव और युद्ध जीतना दोनों एक जैसे मामले नहीं हैं। सरकार अब अतिराष्ट्रवाद के सहारे अपने घटते आधुनिकीकरण कार्यक्रम को नहीं छिपा सकती है। रक्षा के बारे में इसकी गम्भीरता का अंदाजा 6 साल में 5 रक्षा मंत्रियों की नियुक्ति से लगाया जा सकता है। फिर भी, सी.डी.एस. एक सकारात्मक कदम है, हालांकि जिस तरह से वह पदानुक्रम में स्थित है, वह प्रधानमंत्री के 111 के अंकगणित में एक और ‘1’ है।

राष्ट्रीय सुरक्षा की राजनीति ने इसके अर्थशास्त्र को छिन्न-भिन्न कर दिया है, जिससे 15वें वित्त आयोग को अतिरिक्त रक्षा फंड के लिए आक्रामक होना पड़ा। कठिन राजकोषीय स्थिति को देखते हुए सरकार को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा महत्वाकांक्षाओं और लक्ष्यों को कम करना चाहिए और पेशेवर सेना को अकेला छोड़ देना चाहिए। 

- ए के मेहता    

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