Thursday, Jan 20, 2022
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और भी चुनौतियां सामने हैं कोरोना के सिवा

  • Updated on 5/28/2020

भारत के सामने सिर्फ़ कोरोना एक चुनौती नहीं है. इस अंतहीन सी लगती सुरंग से बाहर आने का समय भले ही टलता रहा है, पर हम जानते हैं, कि जल्द ही वह वक़्त भी आ ही जाएगा. और तब हम बहुत सारे सवालों से दो चार हो रहे होंगे. हम बहुत सारी असुरक्षाओं, चिंताओं, अनिश्चितताओं से भरे हुए हैं, जिनके जवाब न सरकारों के पास हैं न नेताओं, अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के पास. वे सभी महत्वपूर्ण सवाल हैं. जिनके जवाब अभी हमारे पास साफ़ और सामने नहीं हैं. पर बतौर एक देश, समाज और नागरिक हमें उन्हें तलाशना पड़ेगा. मसलन-

अर्थव्यवस्था : से जुड़े तमाम सवाल हैं, जो हमें हर तरह से प्रभावित करेंगे. चाहे रोज़गार हो, चाहे ख़रीद शक्ति, महंगाई, टैक्स और सेस. सरकार ने कई सारे ऐलान तो किये हैं तो पर यह कहना मुश्किल है कि उनसे नौकरीपेशा, मजदूरी, व्यापार, उद्यमियों को कितनी आश्वस्ति का अहसास हुआ है. इसकी असली तस्वीर सुरंग से बाहर आकर ही मिल पाएगी. विशेषज्ञों, रेटिंग एजेंसियों की राय में अभी काफ़ी मायूसी ही है. 

चीन की सीमा पर बढ़ता तनाव: रक्षा मामलों के माहिर लोग बता रहे हैं कि क़रीब 10000 से ज़्यादा चीनी सैनिक भारतीय सीमा में आ चुके हैं और उसे लेकर अभी संशय और भ्रम की स्थित बनी हुई है. वैसे तो युद्ध के लिए कोई भी वक़्त सही नहीं होता, पर ये तो बिल्कुल भी नहीं हैं. अगर तनाव बढ़ता है, तो भारत के लिए चुनौतियाँ और अधिक बढ़ जाएंगी. न सिर्फ़ सामरिक और कूटनीतिक तौर पर बल्कि आर्थिक तौर पर भी भारत और चीन के रिश्ते काफी महत्वपूर्ण और गंभीर हैं. और इस बढ़ते तनाव का असर उन सब पर पड़ सकता हैं. 

टिड्डी दल का हमला : अभी राजस्थान में होने की ख़बर है, पर उनके दूसरे कृषि प्रधान राज्यों (हरियाणा, पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश) में फैलने का अंदेशा कम नहीं है. अगर ऐसा हुआ तो खड़ी फसलों को जो नुक़सान होगा, उससे हमारी आत्मनिर्भरता पर व्यापक असर पड़ेगा.  

जन-स्वास्थ्य सेवाओं के हाल : ये देखना दिलचस्प होगा कि भारत कोरोना काल से बाहर आकर अपने अस्पतालों, स्वास्थ्य सेवाओं, स्वास्थ्य कर्मियों, स्वास्थ्य शोध और अनुसंधान का क्या करता है. सबसे बड़े सबक़ मेरे ख़्याल से यहीं खुले हैं. चाहे सरकारी हो या प्राइवेट, चाहे दवा या मशीन कम्पनियाँ हों या आँकड़ों को जवाबदेही और पारदर्शिता के साथ साझा किया जाना, सबमें दिक़्क़तें सामने आई हैं.  स्वास्थ्य कर्मियों के साथ हमारा बर्ताव कैसा रहा और कैसा होना चाहिए, ये भी सोचने की बात होगी. 

स्कूल और उच्च शिक्षा : भले ही छोटे दौर के लिए पर भ्रम और संशय की हालत रहेगी. कब परीक्षाएँ होंगी, कब नतीजे आएँगे और कब अगले दाख़िले होंगे. भारत में इस वक़्त आधे लोग 29 साल के नीचे हैं, और ऐसे में इस चुनौती की भयावहता का अंदाज़ा मुश्किल है. कई जगह ऑनलाइन कक्षाओं और परीक्षाओं की बात चल रही है, पर जिस देश में कनेक्टिविटी के इतने मसले हों, ये बात को और उलझाएगी.  कनेक्टिविटी के अलावा अभी माइंडसेट का भी सवाल है, क्योंकि जितने भी शिक्षकों और छात्रों से मेरी बात हुई, उनकी अनिश्चितताएं और चिंताएं ज़्यादा दिखलाई दीं.  

रोज़गार के अवसर : जब नौकरियाँ जा रही हैं, तनख्वाहों में कटौतियां हो रही हैं और कंपनियाँ अपने पोटलियां कस रही हैं, ऐसे में नौजवानों के लिए नौकरी पाना और अधिक मुश्किल होने वाला है. भारत में उनकी संख्या भी बहुत ज़्यादा है और उनके हाथों में अगर काम नहीं होगा, तो उसी अनुपात में भूख, फ़्रस्ट्रेशन और हिंसा बढ़ने की आशंका है. भारत में बेरोज़गारी रिकॉर्ड ऊंचाई पर है. नौकरियां या काम अपने गाँव देश के क़रीब नहीं होगा, तो दूसरी तरह की दिक़्क़तें होंगी. 
डिजीटल इंडिया का स्वरूप : कोरोना जैसी महामारी के बीच जीवन में डिजीटल समाधान लाना शायद सबसे ज़रूरी पहल होनी चाहिए थी. पर हम देख रहे हैं कि आरोग्य सेतु जैसी सरकारी एप और रेलवे जैसी सरकारी सेवाएँ भी लोगों को वायदों के मुताबिक़ तसल्ली और राहत नहीं दे सकीं.  

यातायात, सफ़र पहले जैसे नहीं रहेंगे : चाहे लिफ़्ट हो या मेट्रो, या बस या हवाई जहाज़, सफ़र करने के तरीक़े बदलते चले जाएंगे. चाहे दूरी बनाए रखने का सलीका हो, या टेस्टिंग का, कोई भी ऐसी जगह जहां हम अजनबियों के साथ होंगे, हमारी चिंताओं को बढ़ाएगी. ऐसे में सबसे बेहतर तरीक़े क्या होंगे, इस बारे में अभी बहुत स्पष्टता नहीं है.

क़ानून और व्यवस्था : लॉक डाउन के दो महीने बाद भी पुलिस की लाठियाँ भांजी ही जा रही हैं, अदालतें अनमने भाव से अपना काम करती दीख रही हैं और कई जगह नागरिक अधिकारों को दरकिनार करते हुए कुछ ख़ास लोगों को निशाना बनाया जा रहा है. पारदर्शिता, जवाबदेही, संवैधानिकता, न्यायिकता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. और ये भी कि खुले तौर पर क़ानून का उल्लंघन करने वाले कई लोगों पर कार्रवाई इसलिए नहीं हुई कि वे सत्ता के क़रीब समझे गये. हर ऐसे आपात हालात के बाद ये ख़तरा होता है कि सरकार पहले से ज़्यादा निरंकुश और दमनकारी हो जाए. ऐसा कई दूसरे देशों में हो रहा है और इस भारत में नहीं ही होना चाहिए.  

ये सारे मसले ऐसे हैं जिनको लेकर सवाल सबके दिमाग़ में चल रहे हैं. न इसका राजनीति से मतलब है, न कोरोना की बीमारी से. सवा सौ करोड़ लोगों को पता है कि पुराना सामान्य अब नहीं होगा. पर ये तसल्ली सबको चाहिए कि जो नया सामान्य होगा, वहाँ वे सुरक्षित, स्वस्थ और सकारात्मक महसूस करें.

- निधीश त्यागी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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