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गांव की 'याद' में डूबे करोड़ों गरीब

  • Updated on 5/4/2020

जीवन हो, समाज हो, संस्था हो या राष्ट्र हो, इन सभी जीवनों में प्रारंभ से ही उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। कोरोना वैश्विक महामारी भी इसी तरह की एक घटना है। सुघटना हो या दुर्घटना, दोनों के ही दो पहलू पाए जाते हैं। एक सकारात्मक, एक नकारात्मक। कोरोना का नकारात्मक पक्ष हैकि वह मानव का जीवन समाप्त कर रहा है। वहीं, उसका दूसरा पक्ष है कि कोरोना के कारण शहरों में रहने वाले परदेसी लोगों को गांव की बहुत याद आ रही है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर भारत के भिन्न-भिन्न शहरों एवं बड़े-बड़े महानगरों में जीविकोपार्जन करने के लिए जाने वाले गांव भूल गए और आज करोड़ों गरीबों को सबसे ज्यादा गांव की याद आ रही है। वैश्विक महामारी कोरोना का संदेश है कि गांव और शहर के बीच में सदैव संतुलन रहना चाहिए। जैसे संतुलित आहार शरीर को स्वस्थ रखता है, वैसे ही गांव और शहर का संतुलन रहने से ही भारत की संस्कृति भी बचेगी और प्रगति भी होगी।

भारत के गांव अंग्रेजी राज से हजारों वर्ष पहले वैदिककाल में भी हर तरह से प्रतिभा सम्पन्न थे। गांव में ज्ञान था। विज्ञान था। वेद थे, उपनिषद थे, पुराण थे, महाभारत था और रामचरितमानस भी। ऋग्वेद में कहा गया है : ‘पृथ्वी:पू:च उवीं भव’। अर्थात समग्र पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश परिशुद्ध रहें, नदी, पर्वत, वन, उपवन सब स्वच्छ रहें, गांव नगर सबको विस्तृत और उत्तम परिसर प्राप्त हो, तभी जीवन का सम्यक् विकास हो सकेगा। ऋषि और कृषि की भूमि भारत की ग्राम्य सभ्यता और संस्कृति की विश्व में धाक थी।

भारत को विश्व गुरु  यों ही नहीं कहा गया। ज्ञान और प्रतिभा के मामले में शिखर पर था यह। महात्मा गांधी ने 1909 में ‘हिन्द स्वराज’ में भारतीय गांवों का चित्र खींचते हुए भारतीय ग्राम संस्कृति को विश्व संस्कृति बताया था। उन्होंने जोर देकर कहा था, ‘‘अगर गांव नष्ट होता है तो भारत भी नष्ट हो जाएगा, भारत किसी मायने में भारत नहीं रहेगा।’ उन्होंने सच ही ‘गांव को भारत की आत्मा’ कहा था। उनका मानना था कि न केवल भारत बल्कि विश्व व्यवस्था का उज्ज्वल भविष्य गांवों पर निर्भर करता है।

लेकिन आजादी के बाद दशकों तक ऐसी सरकारी नीति रही, शहर फैलता गया गांव सिमटता गया। फैलता शहर गांव को निगलता गया। महानगरों के आसपास के गांव-गांव दुबकते गए, वहीं गांव में शहर घुस आया। शहर अमीर हो गया, गांव गरीब हो गया। शहर खाने वाला, जबकि गांव उगाने वाला बन कर रह गया। शहर की स्वार्थी सभ्यता ने गांव को गुलाम बना दिया। शहरी लालच में गांव वीरान होने लगा। किसी ने सुध न ली, न सरकारों ने, न व्यक्ति ने और न समाज ने।

दुष्परिणाम सामने हैं। 1951 में भारत की 83 प्रतिशत आबादी गांव में रहती थी, आज घटकर 69 प्रतिशत रह गई है। गांव समृद्ध हो, इसकी न नीयत रही है और न नीति। 1951 में गांव का बजट का कुल बजट का 11.4 प्रतिशत था, 1960-61 में 12 प्रतिशत, 1970-71 में 9.5 प्रतिशत, 1980-81 में 10.9 प्रतिशत, 1990-91 में 10.8 प्रतिशत और 2000-01 में 9.7 प्रतिशत थी, 2019-20 में 9.83 प्रतिशत। वहीं 1970-71 में देश के कुल कार्यबल का 84 प्रतिशत गांवों में था, जो 1980-81 में घटकर 80.8 प्रतिशत, 1990-91 में 77.8 प्रतिशत, 2010-11 में 70.9 प्रतिशत और वर्तमान में घटकर लगभग 70 प्रतिशत रह गया है। देश के 70 प्रतिशत कार्यबल के लिए 10 प्रतिशत से भी कम बजट। ऐसे में गांव की समृद्धि में अभिवृद्धि कैसे हो सकती है? ग्राम स्वराज्य का सपना कैसे पूरा हो सकता है?

आजादी के बाद देश की बागडोर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के हाथ में आई, जो बहुत ही संपन्न परिवार के थे। आजादी की लड़ाई में गांधी जी के मार्गदर्शन में उनकी भूमिका रही, पर आजादी के बाद महात्मा गांधी के विचारों खासकर उनके ग्राम स्वराज्य के विचारों की सबसे अधिक अनदेखी जिसने की तो वे स्वयं जवाहर लाल नेहरू  थे। हालांकि वे अपने भाषणों में कहा करते थेे सब कुछ इंतजार कर सकता है पर कृषि नहीं। पर उनकी करनी में कहीं पर भी कृषि को महत्व नहीं दिया गया।

 ‘भारत गांव का देश है’, अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों ने यही बात कही है। कौन नहीं जानता भारत गांवों में बसता है लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि गांव की कितनी ङ्क्षचता की गई? डेढ़ वर्षों के अपने अल्प कार्यकाल में भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने गांव एवं किसान की चिंता करते हुए ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया। गांव और किसान के जीवन में आशा की नई किरण का संचार हुआ लेकिन उनकी आकस्मिक मृत्यु ने आशा की उस किरण को भी मृत कर दिया। अत्यंत अल्पकालिक कार्यकाल के कारण मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर पाए।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नीति ‘गरीबी हटाओ’ के नारे से आगे नहीं बढ़ पाई। गांव और शहर का संतुलन बिगड़ता गया, भ्रष्टाचार और लालच गांव की संस्कृति और संवृद्धि को निगलता गया। प्रधानमंत्री के रूप में स्वयं राजीव गांधी ने स्वीकार किया था कि केंद्र सरकार द्वारा जो 1 रु पया गांव को भेजा जाता है उसमें 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं।

गांव के भाव और भविष्य, विश्वास और विकास की अगर किसी ने समझा है तो वे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। उनकी सोच में गांव की संस्कृति भी है और समृद्धि भी। गांव भी है, शहर भी। वे स्मार्ट शहर की बात करते हैं तो गांव स्मार्टनैस की भी बात करते हैं। महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज्य की बात करते हैं। वे गांव की सभ्यत और संस्कृति के रक्षक के रूप में बात करते हैं। 15 अगस्त, 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर में अपने पहले भाषण में गांवों में मां-बहनों की गरिमा की बात की, घर-घर शौचालय बनाने की बात की। स्वच्छ भारत की बात की। गांव के हर व्यक्ति के पास मोबाइल कनैक्टिविटी देने की बात की। गांव के स्कूलों में डिस्टैंस एजुकेशन की बात की। गांव के विकास के आधुनिक पैरीमीटर्स की बात की।

- प्रभात झा (भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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