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मोदी चुनावी जीत के साथ बचा रहे हैं विचार धन

  • Updated on 11/17/2020

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), जो अभी तक जेहादी-वाम षड्यंत्रों, सैनिकों के अपमान तथा विवेकानंद मूर्ति ध्वंस (2019) के लिए जाना जाता था, वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) द्वारा स्वामी विवेकानंद की मूर्ति के उद्घाटन से एक नवीन राष्ट्रीयता के विजय युद्ध का नया पर्व जुड़ा है। यह राष्ट्र के विचारधन की रक्षा का नवीन अध्याय है। 

चुनाव की जीत का खुमार कुछ इस तेजी से राजनीतिक वर्ग पर चढ़ता है कि मौलिक तत्व उपेक्षित रह जाते हैं। बिहार, तेलंगाना, गुजरात, हरियाणा में मिली जीत का विश्लेषण हम करेंगे लेकिन याद दिलाना होगा कि ये तमाम जीतें अयोध्या राम मंदिर की विजय, कश्मीर में 370 के अंत और हिन्दू प्रतीकों तथा स्थानों का बढ़ा महत्व (वाराणसी-अक्षरधाम आदि में विश्व नेताओं का आगमन) सदियों के बाद संभव हो पाई हैं। यह सभ्यता का उत्कर्ष काल राजनीतिक जय-पराजय से बड़ा तथा स्थायी है। यदि इसे पंजाब के धर्म प्राण लोग नहीं समझेंगे तथा पंजाब जैसे प्रदेश में धर्मांतरण और नशा को चलने देंगे तो परिणाम भयानक हो सकते हैं जो चुनावी जीत को अर्थहीन बना देंगे। मोदी ने देश की सीमा, भाजपा की केसरिया विजय सुनिश्चित करने के साथ-साथ देश के विचार धन को बचाने के जो उपाय किए हैं वे अभूतपूर्व हैं। 

उपमुख्यमंत्री को लेकर बंट गई बिहार की राजनीति

1. पहली बार राष्ट्रीय पुरातात्विक महत्व के पांच स्थानों को 2020 के बजट में आइकोनिक दर्जा दिया। यानी वे राष्ट्रीय महत्व के प्रतिष्ठित स्थान घोषित हुए जिनके लिए अतिरिक्त बजट, योजना व रख-रखाव का प्रावधान होगा। ये पांचों स्थान जिनमें हरियाणा का राखी गढ़ी, असम का शिव सागर, तमिलनाडु का आदिलचन्नलूर, गुजरात का धौलावीरा व उ.प्र. में हस्तिनापुर है, सिंधु सरस्वती सभ्यता एवं राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े हैं।

2. दीपावली से प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय विचारधन यानी सभ्यता मूलक धरोहर की रक्षा का जन आंदोलन शुरू करने का आह्वान किया है। 

यदि हम ‘अमरीका के दोस्त’ हैं तो ‘हमें उसे यकीन दिलाना होगा’

3. अपने व्याख्यानों व अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलनों में राष्ट्रीय धरोहर प्रतिबिंबित कर रहे हैं, कब्रिस्तान नहीं।
बिहार परिणामों ने राष्ट्रवादी केसरिया विकास नीतियों और कार्यक्रमों को जो स्वीकृति दी उसकी दमक म.प्र., हरियाणा, गुजरात और उ.प्र. में भी प्रतिभाषित हो रही है। सामान्य गरीब जनता, किसान, मजदूर और उनमें सबसे बढ़कर सामान्य गृह लक्ष्मियों ने भाजपा के नेतृत्व को अपने व देश के लिए सुरक्षित माना, यह इस दशक नहीं, इस शताब्दी के नवीन परिवर्तन का द्योतक है जिसके नायक चक्रवर्ती नरेंद्र मोदी और चाणक्य अमित शाह हैं। बिहार ने लुटियन मीडिया की लुटिया डुबो दी जिसने दो दिन पूर्व मोदी को असफल, नीतीश को नकारा और शाह को प्रभावहीन घोषित कर तेजस्वी को मुख्यमंत्री बना ही दिया था। वैचारिक अस्पृश्यता और घृणा पत्रकारिता का पर्याय नहीं हो सकती। यह बिहार ने सिद्ध किया। बिहार में महिलाओं की बढ़ती चुनावी सक्रियता ने नरेंद्र मोदी के ‘डबल इंजन’  को अपनी सुरक्षा, समृद्धि और भरोसेमंद विकास के लिए चुना। 

लालू-कांग्रेस-वामपंथियों का शोर पूर्णत: नकारात्मक और अपशब्दों से भरा हुआ था, जिसमें घर परिवार की बात नहीं बल्कि शत्रुतापूर्ण राजनीतिक शब्द ङ्क्षहसा का आतंक था। बिहार ने गड्ढों में सड़कें, तीन  घंटा बिजली, जातिगत नरसंहार, कम्युनिस्टों की अराजकता, फिरौती के अपहरण, कालेजों का सर्वनाश, व्यापार-उद्योग का भयादोहन और सड़कों पर मंडराते निरंकुश माफिया का लालू राज देखा था। नीतीश ने जोखिम उठाया-नशाबंदी की, कालेजों में कक्षाएं शुरू हुईं, गुंडों में भय व्यापा, अपहरण-नरसंहार फुलस्टॉप हुए, कम्युनिस्टों को नाथा, मोदी-शाह का साथ और विश्वास लिया-और इसके लिए देश की सैकुलर मीडिया का विरोध सहा। 

‘क्या पाकिस्तान कश्मीर चाहता है या नहीं’

सैकुलर क्या बोले? नीतीश तो प्राइम मिनिस्टर मैटीरियल हैं-भाजपा के साथ व्यर्थ गए। लालू का साथ छोड़ना बहुत बड़ी गलती थी-प्रवासी श्रमिकों के लिए क्या-क्या न कहा लेकिन बिहार ने मोदी-शाह की शक्तिपूर्ण सज्जनता और नीतीश की बेहद शालीन भद्रता का भरोसा किया। मोदी के ‘डबल इंजन’ ने कमाल का समां बांधा-सीधे बात दिल में उतर गई-डबल-युवराज- घरेलू झंझट से बिहार दूर हुआ।  एक और बात। केंद्र में मोदी हर वायदे की पक्की गारंटी का प्रतिरूप बन गए हैं। वैचारिक विरोधी भी मोदी पर अविश्वास नहीं कर सकता। मोदी भरोसे का दूसरा नाम तो नीतीश राजनीति में भद्रता, सज्जनता का ऐसा चेहरा जो किसी विपक्ष में दिखता नहीं। विकास होता है तो आंखों से दिखता है-मुंगेर-भागलपुर राजमार्ग (971 करोड़ लागत) तो नवीनतम था लेकिन इससे पहले नितिन गडकरी 6943 करोड़ के 16 राजमार्ग करवा गए तो आम नागरिक समझ नहीं पाया, वह बिहार में है या हरियाणा-गुजरात में। 

बंगाल में तृणमूल के लिए ये चुनाव जीवन-मरण का प्रश्र है। ममता बनर्जी के निरंकुश कार्यकत्र्ता हर कीमत पर भाजपा को सत्ता से दूर रखेंगे। बंगाल में भाजपा के सारथी कैलाश विजयवर्गीय के अनुसार अब तक 130 भाजपा कार्यकत्र्ता तृणमूल हिंसा का शिकार हो चुके हैं। यहां देश का सबसे हिंसक चुनावी अभियान हो रहा है। बंगाल बंकिम के आनंदमठ, जिसमें वंदे मातरम् की सृजना हुई, बिपिन चंद्र पाल, श्री अरविंद, रामकृष्ण, विवेकानंद, सुभाष, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अनगिनत राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों का प्रदेश है। तृणमूल कार्यकत्र्ताओं ने कवि रबींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन तक में ङ्क्षहसा व तोडफ़ोड़ की। आने वाला समय केसरिया एजैंडे का है-अब इसमें संदेह नहीं।

-तरुण विजय

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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