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नई शिक्षा नीति क्या वास्तव में ‘एक गेम चेंजर’ है

  • Updated on 8/1/2020

29 जुलाई को भारत सरकार की कैबिनेट कमेटी ने नई शिक्षा नीति को स्वीकृति दे दी जिससे दिनांकित शिक्षा प्रणाली को भरने का प्रयास किया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पहली बार 1986 में संशोधित किया गया था और 1992 में इसका मेक ओवर किया गया। मैंने शिक्षा को अपने जीवन के 40 वर्ष समॢपत किए हैं। पंजाब तथा दिल्ली की उच्च यूनिवॢसटीज में अध्यापन किया। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में मैंने कट्टरपंथी सुधारों के लिए जोर दिया। इस घोषणा पर मेरी प्रतिक्रिया कुछ हद तक मौन है। सैद्धांतिक रूप से यह एक शानदार दस्तावेज है जिसे सावधानीपूर्वक तैयार किया गया है। 

भारत के वैज्ञानिक सोच वाले डा. के. कस्तूरीरंगम द्वारा इसे तैयार किया गया है। यह मसौदा प्रस्ताव 484 पृष्ठों वाला है जिसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय को 15 दिसम्बर 2018 को प्रस्तुत किया गया था। इस पर विभिन्न प्लेटफार्मों पर एक वर्ष से ज्यादा समय तक चर्चाएं की गईं। इस तथ्य की भी प्रशंसा करनी चाहिए कि यह एक समग्र परिप्रेक्ष्य है। इसे 22 भाषाओं में अनुवादित किया गया और हित धारकों के साथ साझा किया गया। इसके अलावा इसे जनता से केंद्रीय सरकार के पोर्टल पर साझा किया गया। इसके बहु बिंदुओं पर कई प्रयास किए गए। 

पूरे दस्तावेज की समीक्षा करने के लिए जोकि भारत की नकारा शिक्षा प्रणाली के लिए एक गेम चेंजर माना जा रहा है, इसे एक आलेख में संक्षिप्त करना मुश्किल है। मैं कुछ महत्वपूर्ण विचारों पर ही बात करूंगी जिनसे हमें अनुसंधान तथा नवाचार के दृष्टिकोण में अभूतपूर्व बदलाव लाने की उम्मीद है। यह राष्ट्रीय रिसर्च फाऊंडेशन के निर्माण से संबंधित है जिसे नैशनल साइंस फाऊंडेशन (एन.एस.एफ.), यू.एस.ए. के पदचिन्हों पर चलने की कोशिश की गई है। 

भारत में अनुसंधान के लिए हम एक नींव रखने की तैयारी कर रहे हैं जिसे एन.एस.एफ. की रेखाओं पर रखा जाएगा। डा. सेथूरमन पंचनाथन इसके 15वें निदेशक हैं। उनका जन्म चेन्नई में हुआ था और गूगल के सुंदर पिचाई के जैसे ही वह स्थानीय स्कूल और कालेज में गए। एन.एस.एफ. की नींव पुरानी स्कूल प्रणाली में पोषित थी मगर अमरीका में बुद्धि का विकास हुआ।

1950 में एन.एस.एफ. को स्थापित किया गया जो साइंस तथा सोशल साइंस में पारदर्शिक रूप से शोध में प्रोत्साहित करने की विरासत रखती है। 1996 में नैशनल साइंस फाऊंडेशन के यू.एस.ए. से इसे फंडिंग मुहैया करवाई गई। इसे यू.जी.सी. तथा आई.सी.एस.एस.आर. से भी फंडिंग होने का अनुभव है। मैं इसलिए आश्चर्यचकित हूं कि एन.आर.एफ. कैसे नौकरशाही प्रणाली को चुनौती देगी। हमें शोध को प्रोत्साहित करने के लिए न केवल नई कौंसिल की जरूरत है बल्कि हमें सामाजिक तथा शैक्षिक वातावरण को बदलने की भी जरूरत है जो शोध को प्रोत्साहित करता है। 

एन.एस.एफ. का ध्यान शोध कौशल को प्रमोट करने का है क्योंकि हमारी ज्यादातर रिसर्च फंङ्क्षडग एजैंसियां शोधकत्र्ताओं से यह उम्मीद करती हैं कि वे अपना ज्यादातर समय फंड मैनेजमैंट पर लगाएं। मेरी अन्य ङ्क्षचता यह है कि हम प्रारूप को बदल देंगे मगर डिलीवरी सिस्टम के साथ निपटने वाले लोग पुराने हो चुके सिस्टम का उत्पाद है। तब हम कैसे उनके दिमाग को बदलने की उम्मीद रख सकते हैं। मौजूदा प्रणाली में अनुसंधान के लिए तर्क गुणवत्ता की जरूरत नहीं। हमारी यूनिवर्सिटियां दशकों से टीचिंग तथा रिसर्च स्थितियों का पोषण कर रही हैं। दुर्भाग्यवश यह हमेशा गुण नहीं होते जो शैक्षिक क्षेत्र में मैंटर के व्यक्तिगत स्थान हासिल करते हैं। नई शिक्षा प्रणाली व्यक्तिगत सोच को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें किस तरह मोटिवेट करेगी। 

एन.आर.एफ. के मुख्य उद्देश्यों में से एक निगरानी के लिए एक तंत्र बनाना और मिड कोर्स सुधार लाना है इसके अलावा हित धारकों के बीच तालमेल बिठाना भी है। स्टाफ कालेजों  और मानव संसाधन विकास केंद्रों का पीछा किया जा रहा है। दशकों से इन कार्यक्रमों में एक मैंटर की भूमिका निभाने के दौरान मेरा अपना विचार है कि सभी प्रतिभागियों के 10 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।  वह तो सिर्फ एक प्रतिभागी के रूप में इसमें शामिल होते रहे। अगले स्तर की प्रमोशन के लिए सर्टीफिकेट अनिवार्य है जो उनके कौशल और ज्ञान में सहायक सिद्ध नहीं होते। 

हालांकि मैं नई शिक्षा नीति का एक काल्पनिक दस्तावेज के तौर पर स्वागत करती हूं। वर्षों से मुझे एक सवाल चितित करता रहा है, वह शिक्षा के प्रकार के बारे में नहीं है जिसे कि हम भारतीय प्राप्त करते हैं बल्कि यह तो शैक्षिक और सामाजिक माहौल के बारे में है जो हमारी शैक्षिक संस्कृति प्रशासन करती है। स्कूल तथा कालेज में शिक्षा लेने के बाद आखिर भारतीय पश्चिम की ओर पलायन क्यों करते हैं? जबकि उनके समकालीन भारत में वैसा ही स्तर हासिल करने में असमर्थ हैं। उम्मीद है हमारी नई शिक्षा नीति प्रफुल्लित होगी।

-शालीना मेहता, लेखिका मानव जाति विज्ञान की प्रोफैसर हैं (रिटायर्ड पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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