Monday, Aug 08, 2022
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no banda nor was there any nawaz

न कोई ‘बंदा’ रहा न कोई बंदा नवाज

  • Updated on 2/6/2020

‘एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज, न कोई बंदा रहा न कोई बंदा नवाज...’

मुसलमानों के बीच इस शे’र को गाहे-बगाहे तब याद किया जाता है जब मुस्लिम समाज में जाति, वर्ण और ऊंच-नीच जैसी किसी व्यवस्था पर चोट करने की बात आती है लेकिन क्या यह पूर्ण सत्य है कि इस्लाम में जाति-वर्ण जैसी व्यवस्था नहीं है? कहने को सही इस्लाम की शिक्षा तो यही कहती है कि इस्लाम में ऊंच-नीच, भेदभाव नहीं है। इस्लाम के मानने वाले जहां पर भी हैं, एक साथ में बैठ कर यहां तक कि एक थाली में भी खाना खा लेते हैं। ऐसे ही दूसरे कामों में भी एक साथ खड़े हो जाते हैं। लेकिन यह कहने में बिल्कुल संकोच नहीं है कि हिन्दुस्तान में मुसलमानों में जातियां हैं और यहां के लोग अलग-अलग जातियों में बंटे हुए भी हैं। 

आज के दौर के मुसलमान तो शादी-ब्याह में भी एक-दूसरे से संबंध स्थापित करने में कुछ सामाजिक और जातीय नियमों का पालन करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि शादी-ब्याह सहित कई सामाजिक कार्यक्रमों को लेकर भी मुसलमान पूर्ण स्वतंत्र नहीं हैं और कहीं न कहीं जाति व्यवस्था की जकड़ में खुद को कैद किए हुए हैं। यह तो सिर्फ जातियों का मामला है, फिरकों के नाम पर भी जबरदस्त बंटवारा किया जा चुका है। बात जब फिरकों की आ जाए तो शादियां करना तो दूर की बात है, ये किसी की शादी-ब्याह के समारोह तक में नहीं शामिल होते हैं। और तो और किसी की मौत पर कब्रिस्तान तक जाने से गुरेज करते हैं, नमाज-ए-जनाजा पढ़ने से भी कतराते हैं। न जाने ऐसे लोग किस इस्लाम के अनुयायी हैं।
मुसलमान कई श्रेणियों में बंटे हैं

भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमान कई श्रेणियों में बंटे हैं। इनमें सबसे पहले तो अशरफ मुस्लिम आते हैं। जो लोग अशरफ मुस्लिम में आते हैं उन्हें सैयद, शेख, पश्तून और मुगल कहा जाता है। मुसलमानों में सैयद उन्हें कहा जाता है जिनके लिए ऐसी मान्यता है कि उनका शिजरा पैगम्बर मोहम्मद साहब से मिलता है। इन्हें ‘आले मोहम्मद’ भी कहा जाता है। इसके बाद अशरफ मुस्लिम में शेख आते हैं। ये ऐसे मुस्लिम हैं जो अरब और ईरान से हिन्दुस्तान में आए। इनमें कुछ ऐसे भी मुस्लिम हैं जो पहले राजपूत थे लेकिन धर्मांतरण कर मुस्लिम हो गए।

उसके बाद पशतून आते हैं। इन्हें पठान कहा जाता है। ये लोग अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पहाड़ी इलाकों से हिन्दुस्तान में आए थे। इनके बाद मुगलों का नम्बर आता है। ये लोग तुर्की, ईराक और उसके आस-पास के देशों के रहने वाले हैं, जो हिन्दुस्तान आए और यहीं के होकर रह गए। इन कथित अशरफ मुस्लिम के अलावा एक अन्य किस्म भी मुसलमानों में पाई जाती है, जिसमें वे तमाम मुस्लिम शामिल हैं जो अशरफ मुसलमानों की नजर में कम महत्व रखते हैं, जैसे बुनकर, धुनिया, दर्जी, धोबी, चूड़ी फरोश, नट, कसाब वगैरह। इसके अलावा जो भी मुसलमानों में जाति व्यवस्था बनाई गई है वह सब इसी 5वीं किस्म में आते हैं।

अंसारी, मोमिन, मंसूरी, सलमानी, कुरैशी जैसे उपनामों से उन्हें जाना जाता है। उपनामों से सहज अंदाजा लगा लिया जाता है कि फलां शख्स किस जाति का है जबकि इस्लाम की परिभाषा में यह कहीं नहीं बैठता। पैगम्बर मोहम्मद साहब के जमाने में भी मुसलमान इन तमाम पेशों से संबंधित थे, जिनके नाम पर आज बिरादरियां वजूद में आ गई हैं लेकिन उस दौर में न कोई धोबी था, न तेली, न बुनकर था, न रंगरेज, न सैफी था, न सलमानी, न राइन था, न कुरैशी, न कुम्हार था, न मनिहार, न घोंसी था,  न सक्का। उस वक्त जो भी थे तो सिर्फ मुसलमान थे। मगर आज यही बात दावे से नहीं कही जा सकती।

हिन्दुस्तान मुस्लिम समाज के बीच भी जाति-बिरादरियां बनीं
हिन्दुस्तान में मुस्लिम समाज के बीच जितनी भी जाति-बिरादरियां बनी या बनाई गई हैं उनकी अपनी-अपनी अलग अंजुमनें और कमेटियां हैं। इन अंजुमन और कमेटियों को किसी न किसी सियासी पार्टी का वरदहस्त प्राप्त होता है। कमोबेश ये सभी अंजुमन और कमेटियां अपनी-अपनी बिरादरी की तरक्की के लिए अलग-अलग कार्यक्रमों या फिर अनेक तरह के प्रदर्शन करते हुए धन दौलत भी खर्च करती हैं। इसके लिए बाकायदा चंदा भी इक_ा किया जाता है। मकसद एक ही होता है, अपनी बिरादरी की खुशहाली और तरक्की। ‘उम्मते मुसलेमा’ अर्थात सभी मुसलमानों की तरक्की की बात पीछे छूट जाती है। 

मुस्लिम समाज के कितने ही कन्वैंशन, सैमीनार, कांफ्रैंस सालाना होते रहते हैं जिसमें हर बिरादरी अपने आप को पिछड़ा साबित करने की भरपूर कोशिश करती है। ऐसा करने के पीछे का मकसद होता है, सत्तासीन पार्टी को अपनी ताकत का एहसास कराना और थोड़ी-बहुत रियायतें हासिल करना। जबकि ऐसा करने वाले लोगों को कभी एहसास नहीं होता कि ऐसा करने से इंसानियत में बिखराव आ जाता है।

आम मुसलमानों के पिछड़ेपन और तरक्की की दौड़ में पीछे रह जाने पर गौर-ओ-फिक्र करने की भला यहां किसे फुर्सत है? और यह एकतरफा नहीं है, जब कोई सियासी पार्टी भी कोई प्रोग्राम करती है या संगठनों में प्रतिनिधित्व देने की बात आती है तो उसमें भी उन्हीं बिरादरियों को प्राधान्य मिलता है जहां जिसकी ज्यादा ताकत हो। यह प्रतिनिधित्व बिरादरी को मिलता है, उम्मत को नहीं। 

हुकूमत में शामिल कोई नेता अगर इत्तेफाक से मुसलमानों के हुकूक की बात करता भी है तो उस पर भी बिरादरीवाद ही छाया रहता है। इस बात में कड़वी सच्चाई है और इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इस्लाम इंसानी समाज में 
सुधार के लिए आया था। इस्लाम तो अपनी जगह वैसे ही रहा लेकिन मुस्लिम समाज का चारित्रिक पतन होता रहा।

मुसलमानों की सामाजिक संरचना इस्लाम और कुरान के निर्देशों पर आधारित है। सही इस्लाम जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता है। सही इस्लाम के मुताबिक जन्म, वंश और स्थान के आधार पर सभी मुसलमान एक समान हैं लेकिन मुसलमानों को व्यवहार की दृष्टि से अगर देखें तो निश्चित ही ऐसा देखने को नहीं मिलेगा। न जाने किस आधार पर मुस्लिम समाज में इस्लाम के विरुद्ध जाति व्यवस्था की जड़ें गहरे तक अपना प्रभाव बना चुकी हैं। मुस्लिम एकता की बात तो होती है, लेकिन मुसलमान खुद को एक नहीं मानते हैं।     

- सैयद सलमान 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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