Tuesday, Oct 26, 2021
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शहरों के नाम बदलने के पीछे सिर्फ वोट बैंक की राजनीति

  • Updated on 8/18/2021

उत्तर प्रदेश के 2 जिलों अलीगढ़ और मैनपुरी के नीति नियंताओं ने अपने जिले का नाम बदलने की चाहत जताई है। दोनों जिलों की जिला पंचायतों ने इसके लिए बाकायदा प्रस्ताव पारित कर अपना काम कर दिया है। अलीगढ़ के नाम को लेकर पहले से भी चर्चाएं होती रही हैं, जबकि मैनपुरी के नाम को लेकर ऐसी बहुत ज्यादा बातें नहीं थीं। अलीगढ़ का नाम अब हरिगढ़ जबकि मैनपुरी का नाम एक मयन  ऋषि के नाम पर करने की कोशिश की जा रही है। मैनपुरी का नाम बदलने को लेकर थोड़ा विरोध भी हुआ लेकिन बहुमत की राजनीति वहां भारी पड़ी और नाम बदलने का प्रस्ताव पारित हो गया।

यूं राज्यों या जिलों का नाम बदलने की प्रक्रिया आसान नहीं है। पहले जिला स्तर पर, चाहे पंचायत हो या नगर निगम, प्रस्ताव पारित होता है और उसके बाद राज्य सरकार में जाता है। राज्य विधानसभा से होते हुए सरकार की सहमति के बाद केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के  पास यह प्रस्ताव जाता है और वह अन्य एजैंसियों, जैसे रेल मंत्रालय, डाक विभाग, सर्वेक्षण विभाग से रिपोर्ट मंगाता है और तब केंद्र इस पर अपनी मोहर लगाता है। केंद्र की सहमति के बिना यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती। 

राज्यों के नाम बदलने के लिए प्रक्रिया थोड़ी लंबी है। राज्य या संसद इस मामले में विधेयक लाती है और इसके लिए भी राष्ट्रपति की सहमति जरूरी होती है। पुन: यह बिल संसद में लाया जाता है और तब राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। केंद्र सरकार के पास 50 से अधिक ऐसे प्रस्ताव अभी विचाराधीन हैं। 2018 में नाम परिवर्तन के लगभग 25 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई थी लेकिन अभी तक पश्चिम बंगाल का नाम बांग्ला करने की मंजूरी बकाया है। ममता सरकार इसके लिए काफी दबाव डालती रही है।

आजादी के बाद जिलों, शहरों, राज्यों के नाम या उनकी वर्तनी बदलने की शृंखला काफी चली। आजादी के तत्काल बाद त्रावणकोर कोचीन राज्य का नाम केरल हो गया था। आपको यह भी याद होगा उड़ीसा कैसे ओडिशा हो गया और इसी तरीके से पांडिचेरी का नाम पुड्डुचेरी हो गया। बाम्बे को मुंबई और कलकत्ता को कोलकाता  होते हुए हम सबने देखा है। लगभग 20 साल पहले बने उत्तरांचल का नाम भी बाद में बदलकर उत्तराखंड हुआ।

शहरों के नाम की वर्तनी बदलने का भी अपना एक अलग इतिहास है। बंगलौर अब बेंगलुरू है। गुडग़ांव का नाम गुरुग्राम, नए रायपुर का नाम अटल नगर होते हुए हम सब ने देखा है। नाम बदलने की राजनीति में दक्षिण के राज्य काफी आगे रहे हैं। सिर्फ आंध्र प्रदेश में ही लगभग 6 दर्जन से ज्यादा जिलों और शहरों का नाम बदल दिया गया। कर्नाटक में यह संख्या डेढ़ दर्जन के आसपास है और केरल में लगभग 3 दर्जन।

महाराष्ट्र ने भी इस काम को करने में बहुत संकोच नहीं किया लेकिन अब उत्तर प्रदेश भी इस काम को तेजी से बढ़ाने के मूड में लगता है। योगी शासन के दौरान  मुगलसराय का नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर और इलाहाबाद का नाम प्रयागराज हो चुका है। इसके अलावा फैजाबाद जिला नहीं रहा, उसे अयोध्या कहा जाने लगा है। इससे पहले कानपुर देहात का नाम भी रमाबाई नगर रखा गया था। बनारस तो काफी पहले ही वाराणसी हो चुका है।

अब जब से राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार का नाम ध्यानचंद के नाम पर किया गया है, भारतीय जनता पार्टी के नेता और विधायक कुछ ज्यादा ही उत्साहित दिख रहे हैं। फिरोजाबाद  जिला पंचायत ने भी अपने जिले का नाम चंदन नगर रखने का प्रस्ताव रख दिया है। इसके अलावा संभल का नाम पृथ्वीराज नगर  रखने की बात हो रही है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले का नाम भगवान राम के बेटे कुश के नाम पर कुशभाव नगर रखने की बात है। सबसे संवेदनशील प्रक्रिया सहारनपुर में होने की बात है।

यहां मुस्लिम समुदाय में काफी चॢचत नाम  देवबंद का नाम भी बदलने की कोशिशें की गईं। इसी तरीके से शाहजहांपुर का नाम भामाशाह के नाम पर रखने की मांग हुई है। मुजफ्फरनगर का नाम लक्ष्मी नगर रखने की बात है जबकि गाजीपुर जिले का नाम महर्षि विश्वामित्र के पिता राजा गाधि के नाम पर गाधिपुरी करने की मांग हुई है।

दरअसल जिलों, शहरों या राज्यों का नाम बदलने के पीछे सिर्फ एक रणनीति काम करती है और वह है वोट की राजनीति। मायावती ने भी जिलों के गठन और उनके नाम बदलने का सिलसिला इसी आधार पर किया था। यह बात दूसरी है कि बाद में अखिलेश यादव की सरकार ने कई पुराने नाम बहाल कर दिए थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने  वोट आधार को मजबूत करने के लिए यह सिलसिला शुरू किया और विवाद की हद तक आगे गए।

उन्होंने यह सभी नाम महान हस्तियों, जाति प्रतीक पुरुषों के नाम पर रखने का सिलसिला 2019 के चुनाव से पूर्व शुरू किया था और अब फिर आगे बढ़ रहा है। खास तौर से वे नाम बदले जा रहे हैं जो मुगल काल में रखे गए थे। योगी आदित्यनाथ का तो यहां तक मानना था कि नाम मेें बहुत कुछ है। आखिर लोग अपने बच्चों के नाम रावण और दुर्योधन क्यों नहीं रखते। दूसरी तरफ यह भी तर्क दिया जाता है कि मुगल काल के दौरान भी इलाहाबाद में कुंभ होता रहा या किसी मुगल शासक ने काशी या बनारस का नाम बदलने की कोशिश नहीं की। 

दरअसल ऐसे बहुत सारे परिवर्तन सिर्फ वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए किए जाते हैं। यह बात दूसरी है कि बहुत सारी ऐसी कोशिशें परवान नहीं चढ़तीं। केंद्र सरकार भी इन बातों को समझती है।

अकु श्रीवास्तव

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