Friday, Nov 16, 2018

आप्रेशन ब्ल्यूू स्टार को टाला जा सकता था

  • Updated on 6/13/2018

भारत में ऐसी दुखद घटनाओं की भरमार है जिन्हें दोबारा याद करने पर यही लगेगा कि उन्हें टाला जा सकता था। आप्रेशन ब्ल्यू स्टार इन्हीं में से एक है। जरनैल सिंह भिंडरांवाला सिखों के शीर्ष स्थान अकाल तख्त में छिप गया था और राज्य के भीतर एक राज्य बना लिया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उसकी बंदूकों को शांत करने के लिए सेना भेज दी और हरमंदिर साहिब में टैंक भेज दिया। कोई कुछ भी कहे, सिखों के दिल में भिंडरांवाला के लिए इज्जत बरकरार है।

मुझे एक बार इसका अंदाजा हो चुका है, जब अनजाने में, मैंने उसका नाम एक आतंकवादी के रूप में लिया था। सिख इतिहासकार खुशवंत सिंह भिंडरांवाला को आतंकवादी बताकर भी बच निकले लेकिन मैं नहीं बच पाया। हालंाकि मैंने बताया कि यह एक बिना सोचे-समझे की गई टिप्पणी थी जिसका मतलब भिंडरांवाला की निंदा करना नहीं था, सिख समुदाय में गुस्सा था और मैंने जो माफी मांगी उसे माफी नहीं माना गया। मेरी आलोचना की गई कि मैंने सिखों का अपमान किया।

बेशक, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अकालियों को खत्म करना चाहती थीं और भिंडरांवाला को चुनौती देने से उन्हें यह मौका मिल गया। वास्तव में, जितना हम देख पा रहे हैं, यह उससे भी बढ़कर था। एक कहानी, जिसकी श्रीमती गांधी के निजी सचिव आर.के. धवन ने बाद में पुष्टि की, यह भी थी कि कुछ महीनों बाद होने वाले 1984 के चुनावों में वोट हासिल करने की योजना थी।

इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी, भतीजे अरुण नेहरू और राजीव गांधी के सलाहकार अरुण सिंह उस फैसले के पीछे थे जिसने श्रीमती गांधी को उग्रपंथी नेता और उसके सहयोगियों को निकालने के लिए सेना भेजने को मजबूर किया। 
धवन के इस कथन का उल्लेख है कि राजीव, अरुण नेहरू तथा अरुण सिंह का मानना था कि एक सफल सैन्य कार्रवाई उन्हें आसानी से चुनाव जिता सकती है। आप्रेशन ब्ल्यू स्टार श्रीमती गांधी का महज अंतिम युद्ध नहीं था, शायद राजीव गांधी की पहली और शायद सबसे विनाशकारी गलती थी। 

कारवां पत्रिका की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘‘धवन उस समय उनके साथ थे जब उन्होंने स्वर्ण मंदिर को हुई क्षति के फोटो पहली बार देखे थे। उनके मुताबिक, इंदिरा गांधी, जाहिर है जिन्होंने ब्ल्यू स्टार को काफी हिचक के बाद स्वीकृति दी थी, ने आप्रेेशन के तुरंत बाद इस पर अफसोस व्यक्त किया। गलती की भरपाई के लिए राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह स्वर्ण मंदिर जाना चाहते थे लेकिन उन्हें रोका गया। उन्होंने एक गैर-सरकारी विमान लिया और माफी मांगने के लिए स्वर्ण मंदिर गए।

उन्हें गहरी चोट तो तब लगी जब उन्हें आल इंडिया रेडियो पर आप्रेशन का बचाव करने के लिए कहा गया। बाद में, उन्होंने मुझसे कहा कि उन्होंने मना करना चाहा लेकिन उन्हें लगा कि इससे देश में संकट पैदा हो जाएगा कि राष्ट्रपति एक लाइन ले रहे हैं और सरकार दूसरी। वह आकाशवाणी आए और उन्होंने आप्रेेशन का बचाव किया। राष्ट्र को संबोधित करते समय वह सचमुच रो पड़े।

स्वर्ण मंदिर की तस्वीरें देखकर श्रीमती इंदिरा गांधी भी सदमे में थीं। तस्वीरें अरुण सिंह लाए थे। अरुण नेहरू ने बताया कि उनकी फूफी (इंदिरा गांधी) अंतिम क्षण तक आप्रेशन क्रियान्वित करने के लिए राजी नहीं थीं लेकिन सेना प्रमुख तथा आप्रेशन ब्ल्यू स्टार कराने वाली तिकड़ी, जो आप्रेशन का मार्गदर्शन कर रही थी, ने आखिरकार उनका मन बदल दिया। यह मुख्य तौर पर इसलिए हुआ कि राजीव गांधी ने पंजाब मामलों को सीधे देखना शुरू किया था जो कुछ समय पहले तक उनके भाई संजय गांधी देखते थे।

यह अलग बात है कि श्रीमती गांधी को स्वर्ण मंदिर के हमले की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी जब उनके सुरक्षा गार्डों ने ही गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। राजीव गांधी मां की हत्या के बाद भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश (544 में से 421 सीटें जीतकर) लेकर सत्ता में आए।

मैं उस टीम का सदस्य था जो जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा, एयर मार्शल अर्जन सिंह तथा इंद्र कुमार गुजराल को लेकर इस बात की पड़ताल के लिए बनी थी कि एक ओर अकाली तथा सरकार व दूसरी ओर, सिखों और हिंदुओं के बीच कितनी दूरी है। हमारा निष्कर्ष यही था कि आप्रेशन जरूरी नहीं था और भिंडरांवाला से अन्य तरीकों से भी निपटा जा सकता था। यह हमने पंजाबी ग्रुप को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा, जिसने हमें श्रीमती गांधी की हत्या के बाद हुए हिंदू-सिख दंगों की जांच की जिम्मेदारी सौंपी थी।

तत्कालीन गृह मंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने गोलमोल ढंग से बात की थी, जब सरकारी कार्रवाई के बारे में जानने के लिए हमारी टीम उनसे मिली। प्रत्यक्षदॢशयों समेत सभी ने जो कहा, उससे यही बात सिद्ध होती थी कि सरकारी कार्रवाई जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया थी। दिल्ली और आसपास के इलाकों में सिख विरोधी दंगे तुरंत रोके जा सकते थे लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जान-बूझकर न तो पुलिस और न ही सेना से हस्तक्षेप के लिए कहा।

हा जाता है कि उन्होंने कहा कि दंगे स्वत:स्फूर्त थे। उन्होंने यह प्रतिक्रिया भी व्यक्त की कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है।स्वर्ण मंदिर में सेना के प्रवेश के 34 वर्ष बाद सार्वजनिक हुए ब्रिटिश दस्तावेज दिखाते हैं कि सिखों के ऐतिहासिक स्थान को फिर से कब्जे में लेने के लिए ब्रिटिश सेना ने भारत को सलाह दी थी। इसने लंदन तथा नई दिल्ली दोनों जगह में राजनीतिक तूफान पैदा कर दिया है। ब्रिटिश सरकार ने इन खुलासों की जांच का आदेश दे दिया है और भाजपा ने इस बारे में उत्तर की मांग की है।

यह खुलासा ब्रिटेन में राष्ट्रीय अभिलेखागार की ओर से 30 साल तक गोपनीयता का पालन करने के नियम के तहत सार्वजनिक किए गए पत्रों की शृंखला से होता है। एक सरकारी पत्र-व्यवहार, जिसकी तारीख 23 फरवरी, 1984 है और जिसका शीर्षक ‘सिख समुदाय’ है, में विदेश मंत्रालय के एक कर्मचारी ने गृह मंत्रालय के निजी सचिव से कहा है कि विदेश मंत्री उस पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी देना चाहते हैं जिससे देश के सिख समुदाय के बीच प्रतिक्रिया होने की संभावना हो सकती है।

उसने पत्र में आगे कहा है कि अगर ब्रिटेन की सलाह सार्वजनिक होती है तो इससे भारतीय समुदाय में तनाव बढ़ सकता है। हालांकि, इस बारे में कोई पत्र-व्यवहार नहीं दिखाई देता है कि ब्रिटिश योजना का जून 1984 के आप्रेशन में इस्तेमाल हुआ।
जब मैं 1990 में ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त था, तो मैंने पाया कि दूतावास में सिख समुदाय के प्रवेश को लेकर एक पूर्वाग्रह था और मेरे शुरू के कुछ कदमों में से एक यह था कि सभी के लिए दरवाजे खोल दिए जाएं। उच्चायोग में प्रवेश के लिए सिर्फ सिखों की जो तलाशी होती थी वह बंद कर दी गई। (लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये विचार उनके निजी हैं, जिन्हें ज्यों का त्यों प्रकाशित किया गया है)  ----कुलदीप नैय्यर
 

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