Tuesday, Jan 25, 2022
-->
outcomes of coronavirus covid19 aljwnt

ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो

  • Updated on 4/15/2020

बशीर बद्र उर्दू के सबसे मशहूर शायरों में से एक हैं और उनका यह शेर कोरोना के संदर्भ में बहुत ही मौजूं हैं-

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले लगोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो

कोरोना का आना और चले जाना सिर्फ़ चुनौती नहीं, एक अवसर भी है और ख़तरा भी। कोरोना हमारे पास बहुत सारे सवाल छोड़ कर जाने वाला है।जिनके जवाब अगर हमने समय रहते नहीं ढूंढे, तो वह या उसी की तरह कोई दूसरा वायरस हम पर पलट कर हमला कर सकता है।ये सवाल हमारे जीवन, रहन-सहन, हमारे न्याय-कानून, हमारी आजीविकाओं, हमारे आपसी संबंधों, मुहल्ले-पास-पड़ोस, हमारी सेहत और स्वास्थ्य सुविधाएं, हमारे सूचना-संवाद तंत्र, हमारी टैक्नोलॉजी, अर्थव्यवस्था, वाणिज्य और बाक़ी दुनिया से हमारे संबंधों के बारे में भी होंगे।कुछ सवाल कोरोना ईश्वर और हमारे बीच के सम्बंधों के बारे में भी छोड़ जाएगा।कुछ हमारी अपनी मनुष्यता के लिए भी।

सवाल जो कोरोना छोड़े जा रहा है
हमें इन सवालों का बहुत गहरे में जाकर चिंतन, मनन, मंथन करना होगा। बहुत ईमानदारी, जवाबदेही, पारदर्शिता, तार्किकता और युक्ति-पूर्णता के साथ।अगर हम ऐसा नहीं कर पाएंगे, तो इसका मतलब यही होगा कि इतने बड़े ख़तरे के टलने के बाद भी कोई सबक़ नहीं सीखे गये हैं।ये सवाल कुछ इस तरह के हैं-

1. ऐसा क्यों है कि हमारे खाद्य निगम के गोदाम भरे हुए हैं और लोगों तक खाना नहीं पहुँच पा रहा?
2. ऐसा कैसे हुआ कि दाम सही न मिलने पर किसान को अपनी सब्जी खेत में ही फेंक देनी पड़ी?
3. ऐसा क्यों है कि गांवों से शहर आने वाले लोगों के पास शहरों में कोई सेफ़्टी नेट नहीं है? न रहने का, न खाने का।
4. ऐसा क्यों है कि अस्पताल कम हैं, और स्वास्थ्य कर्मियों के पास न ढंग के मास्क हैं, न सेफ़्टी किट?
5. ऐसा क्यों है कि इतने सारे खाते खुलवाने के बाद भी पैसा या तो नहीं पहुंच रहा या देर से पहुंचा?
6. ऐसा क्यों है कि फँसे (और छिपे) हुए लोगों को सही जगह पहुँचा पाने का कोई मैकेनिज्म विकसित नहीं हो पाया?
7. ऐसा कैसे हुआ कि इतनी बड़ी बीमारी से लड़ने की बजाय, उसे हिंदु- मुस्लिम बखेड़े में बदल दिया गया?
8. ऐसा कैसे हुआ कि लोग अपने अड़ोस-पड़ोस के डॉक्टरों पर ही हमले बोलने लगे?
9. ऐसा कैसे हुआ कि आवश्यक दवाओं का निर्यात रोकने के बाद उसे अमेरिकी दबाव में आकर खोलना पड़ा और देश की दवा दुकानों से हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन ग़ायब कर दी गई?
10.  ऐसा कैसे हुआ कि सरकार ने सवालों का सामना करना बंद कर दिया और जवाब देने की प्रथा सीमित हो गई?
11.  ऐसा कैसे हुआ कि सरकारी मशीनरी और पुलिस का इस्तेमाल लोगों पर दबाव बनाने के लिए किया गया? जिन भी सरकारी कर्मियों ने ज़्यादतियाँ की, उन पर क्या कार्रवाई की गई?
12. बिना तस्दीक़ के कैसे आयुष और दूसरी जगहों से वैकल्पिक इलाज के तरीक़ों को अमल में लाने की बात कही गई? इनमें एक मंत्री भी शामिल था.
13. ऐसा कैसे हुआ कि लोगों को भरोसे में लिये और वक़्त दिये बिना लॉक डाउन और दूसरे फ़ैसले लाद दिये गये?
14. कोरोना के चक्कर में अस्पतालों में भर्ती उन मरीज़ों से बिस्तर क्यों ख़ाली करवा लिये गये, जो किसी और गंभीर बीमारी से ग्रस्त थे?
15. पीएमकेयर फंड में औद्योगिक घराने और कारोबारी सीएसआर का पैसा दे सकते हैं, पर मुख्यमंत्रियों के राहतकोष में नहीं?

ये सारे सवाल दरअसल ये बताते हैं कि हम किस तरह के लोग हैं, किस तरह का लोकतंत्र है, किस तरह के समाज हैं और किस तरह की हमारी सरकार है, कितना भाईचारा रखते हैं और कितना नहीं, हमारे लिए अपनी जान कितनी क़ीमती है, और देशी की कितनी और देश के बाक़ी नागरिकों की कितनी। हमारी प्राथमिकताएं किस तरह की हैं? हम अपनी चुनौतियों से निपटने के लिए कितने तत्पर और तैयार हैं. 

भगवान भरोसे तो हैं पर क्या वाक़ई?
अगर इन सवालों के हमारे पास ठीक और तसल्लीबख्श जवाब नहीं हैं, तो फिर तो भगवान ही मालिक है हमारा और हमारे मुल्क़ का।नहीं दरअसल भगवान मालिक नहीं है, क्योंकि जहां जहां वह है, वहां बीमारी फैलने और फैलाने का ठीकठाक इंतज़ाम है। इसलिए जहां हम ईश्वर की जगह मानकर जाते रहे हैं, वे ख़ाली करवा ली गई हैं।इस इतवार ईसाइयों का त्यौहार ईस्टर था, और पोप अपना संदेश एक ख़ाली इमारत से पढ़ कर सुना रहे थे। होली आकर निकल गई, नवरात्रि और रामनवमी, बैसाखी भी, और लॉक डाउन है कि जारी है।बहुत सी मस्जिदों के बाहर तख्ती लग चुकी है नमाज़ अपने घर में पढ़ी जा सकती है।कई जगह अपने अपने ईश्वरों के क़रीब होने के चक्कर में कई अंध-श्रद्धालुओं ने बहुत सारे लोगों की जान और सेहत को ख़तरे में डाल दिया है। 

ईश्वर को हम जिस तरह से जानते रहे हैं, हमारे काम नहीं आ रहा है।जिस तरह की प्रार्थना, सत्संग, सामुदायिकता की दुहाई और निर्देश दिये गये थे, हमारे काम नहीं आ रहे।वे दूसरे काम आ रहे हैं।चाहे सियासत के लिए या फिर एक दूसरे के ख़िलाफ़ व्हाट्सएप पर तलवार भांजने के लिए। भारत और दूसरे देश ख़ुद को एक जंग के सामने खड़ा हुआ देख रहे हैं और लोगों से चंदा माँग रहे हैं।बहुत सारा चढ़ावा देश के धर्मस्थलों में जमा पड़ा है, पर जब जनता के लिए ज़रूरत का वक़्त आया, तो काम नहीं आ रहा है।

हमारे समाज, सरकार, लोकतंत्र, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के साथ साथ कोरोना उस समीकरण को भी शायद बदलेगा जो हमारा अपने अपने ईश्वर के साथ है. उम्मीद है कि ये बदलाव अच्छे के लिए हो।

लेखक- निधीश त्यागी वरिष्ठ पत्रकार हैं

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।

comments

.
.
.
.
.