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Pandemic after 100 years aljwnt

100 साल बाद फिर आई महामारी

  • Updated on 9/15/2020

सच है कि समूचा विश्व 21वीं सदी में है। यह भी सच है कि प्रगति के लिहाज से मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे स्वर्णिम काल है। सच तो यह भी है कि हर दूसरा दिन पहले से अलग होता है। साथ ही यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि आवश्यकताओं और विकास की संभावनाओं में होड़ की न कोई सीमा थी, न है और न रहेगी। ऐसे में कई बार इसे लेकर भ्रम हो जाता है कि क्या हम वाकई तरक्की कर चुके हैं और क्या तरक्की के मायने नित नए और पहले से आधुनिक होते शानदार कंक्रीट के जंगल, आलीशान शहर, यातायात के सुखदायी साधन, हवा में उड़कर दुनिया की सीमाओं को रौंदते हौसले और पंख लगती अर्थव्यवस्था ही है? इसका जवाब शायद उसी दुनिया को महामारियों से अच्छा किसी ने नहीं दिया है जिसने यह भ्रम पाल रखा है। 

कोरोना (Coronavirus) ने भी तमाम विकास और दावों, खासकर स्वास्थ्य को लेकर पूरी दुनिया की कलई खोल दी। इस वैश्विक महामारी ने फिर बतला दिया कि कहीं से कहीं पहुंच जाओ, चुनौतियां उससे भी तेज ऐसी मुंहबाय आ खड़ी होती हैं कि पूछिए मत। 21वीं सदी के इस युग में यह लाचारी और बेबसी नहीं तो और क्या है जो महज 0.85 एटोग्राम यानी 0.00000000000000000085 ग्राम के कोरोना के एक कण जिसे केवल इलैक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप विश्लेषण तकनीक से ही देखा जा सकता है, ने ऐसा तूफान मचाया कि पूरी की पूरी मानव सभ्यता पर भारी पड़ गया। बदहाल हो चुकी  दुनिया को इस बेहद अतिसूक्ष्म वायरस से कब मुक्ति मिलेगी, कोई नहीं जानता। 

एस. जय शंकर के तीन बोझ

अलबत्ता गणित के हिसाब से करोड़ों को गिरफ्त में लेने की जुगत वाले कोरोना के वजन की बात करें तो 3 मिलियन यानी 30 लाख लोगों में मौजूद वायरस का कुल वजन केवल 1.5 ग्राम होगा। इससे, इसकी भयावहता का केवल अंदाज लगाया जा सकता है। बेहद हल्के और अति सूक्ष्म इस वायरस से वैश्विक अर्थव्यवस्था को 5,800 अरब से 8,800 अरब डॉलर तक का नुक्सान होने की संभावना है। इस संबंध में एशियाई विकास बैंक के ताजे आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के साथ-साथ केवल दक्षिण एशिया के सकल घरेलू उत्पाद यानी जी.डी.पी. पर 142 अरब से 218 अरब डॉलर तक असर होगा। यह बेहद चिन्ताजनक स्थिति होगी जो झलक रही है। लेकिन सवाल फिर वही कि दुनिया के विकास के दावे कितने सच, कितने झूठ? इसमें कोई दो राय नहीं कि स्वास्थ्य को लेकर मानव सभ्यता 21वीं सदी में भी बहुत पीछे है। ले-देकर दवाई से ज्यादा बचाव का सदियों पुराना तरीका और दादी के नुस्खे कोरोना काल में भी कारगर होते दिख रहे हैं। मतलब स्वास्थ्य को लेकर दुनिया के सामने गंभीर चुनौतियां बरकरार हैं और इनसे बहुत कुछ सीखने, जानने और समझने के साथ यह भी शोध का विषय है कि आखिर हर 100 साल बाद ही महामारी नए रूप में क्यों आती है?

शायद सरकारों ने भी नहीं सोचा होगा कि पूरी दुनिया में कभी अचानक ऐसे हालात भी बन सकते हैं! इसके लिए कोई भी तैयार नहीं था। कहते हैं इतिहास अपने आपको दोहराता है। कुछ इसी तर्ज पर पूरी की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्थाएं पुरानी महामारियों के दौर जैसी ही हैं। इलाज का सही तरीका न तब था और न अब है। न पहले मालूम था कि मर्ज की सही दवा क्या है, न अब। शायद इसीलिए कई महीनों के बाद लोगों में कोरोना का डर खत्म हो रहा है और एक-दूसरे से कहने लगे हैं कि या तो कोरोना कुछ भी नहीं या बहुत कुछ! वाकई यही चिन्ता की बात है। लॉकडाऊन ने दुनिया के अर्थतंत्र की कमर तोड़ दी। दोबारा लॉकडाऊन से अव्यवस्थाओं की महामारी का सिलसिला चल पड़ेगा। ऐसे में कोरोना के साथ भी जीना है, कोरोना के बाद भी जीना है।

शिक्षा में ‘क्रांति’ का तरीका

महामारी भी मानव सभ्यता के साथ शुरू हुई। इस पर सबसे ज्यादा ध्यान 14वीं सदी के 5वें और 6ठे दशक में फैले प्लेग के बाद ङ्क्षखचना शुरू हुआ। इसे ब्लैक डैथ यानी क्यूबोनिक प्लेग भी कहा गया। यूरोप में मौत की वो तबाही मची कि एक-तिहाई आबादी काल के गाल में समा गई। तब भी दवाओं की जानकारी के अभाव में जबरदस्त मौतें हुईं। प्लेग लंबे वक्त तक रहा। 

1720 में माॢसले प्लेग कहलाया जिससे फ्रांस के एक छोटे से शहर माॢसले में ही सवा लाख से ज्यादा लोगों की जान चली गई और यही पूरी दुनिया में फैल वैश्विक महामारी बना। भारत में यह 1817 के आस-पास ब्रिटिश सेना से फैलकर बंगाल तक पहुंचा और यहां से ब्रिटेन। इससे पहले प्राचीन युग में किसी भी महामारी को प्लेग कह बैठते थे। ईसा पूर्व के दौर की 41 महामारियों के प्रमाण हैं जबकि ईसा के समय से सन् 1500 तक 109 महामारियां हुईं। 1820 में एशियाई देशों में कॉलरा यानी हैजा ने दूसरी महामारी का रूप लिया। इसने जापान, अरब मुल्कों सहित भारत, बैंकॉक, मनीला, जावा, चीन और मॉरीशस तक को अपनी जकड़ में ले लिया। यह जहां-जहां फैला, लाखों मौतें हुईं। दवाओं की जानकारी की कमी और इलाज न पता होने से कॉलरा के कई-कई दौर चले। 1920 में महामारी का एक नया रूप स्पैनिश फ्लू बनकर आया। यहां भी बीमारी नई थी। न इलाज था, न कोई दवा थी, इससे संक्रमित होकर दुनिया में लगभग 2 से 5 करोड़ लोगों की जान चली गई। 

सम्पूर्ण साक्षरता ‘स्वप्न या संकल्प’

अब उसी तर्ज पर 2020 में महामारी का यह दौर फिर सामने है। अकेले भारत में 50 लाख लोग अब तक संक्रमित हो चुके हैं। रोज आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। लगभग 80 हजार ज्ञात मौतें हो चुकी हैं। हफ्ते भर से रोजाना लगभग एक लाख पहुंचते नए मरीजों की संख्या डराने वाली है। यहां भी बीमारी की तासीर का पक्का इलाज नहीं होने से महज बचाव और साधारण नुस्खों से जूझने की मजबूरी है। 

हर 100 साल की तरह इतिहास ने खुद को क्या दोहराया, कोरोना नई महामारी बनकर सामने आया। हालात सैंकड़ों बरस पहले जैसे हैं। न तो बीमारी की सही तासीर मालूम, न ही दुनिया के पास कोई वैक्सीन या ठोस इलाज ही है। ऐसे में कोरोना के इलाज से ज्यादा उससे बचाव पर ध्यान केन्द्रित करना स्वाभाविक है। भारत में भी कोरोना राजनीति का, खासकर जहां चुनाव या उपचुनाव होने हैं, अखाड़ा बनता जा रहा है। इस बीच भारत में तेजी से बढ़ते संक्रमण ने चिन्ता बढ़ा दी।

- ऋतुपर्ण दवे

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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