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बिहार में ‘युवा वोटरों’ को लुभातीं पार्टियां

  • Updated on 10/26/2020

बिहार विधानसभा चुनाव एक दिलचस्प मोड़ पर पहुंच रहे हैं। सभी राजनीतिक दल युवा वोटरों को लुभाने में लगे हुए हैं। पहले तो राजद-कांग्रेस गठजोड़ ने अपने घोषणा पत्र में युवा पीढ़ी को 10 लाख नौकरियां देने की घोषणा कर डाली। उसके बाद भाजपा जदयू गठबंधन ने 19 लाख नौकरियां देने की घोषणा कर डाली। मगर दुर्भाग्यवश यह बहस महत्वपूर्ण ढंग से अपनी महत्ता खो सकती है क्योंकि पहली बार 18 से 19 वर्ष की आयु के मतदाताओं की गिनती में बहुत बड़ी कमी देखी गई है। 

चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 30 वर्ष से नीचे के मतदाताओं की गिनती 12.4 प्रतिशत कम हो चुकी है। यह पिछले विधानसभा चुनावों में 2.04 करोड़ से कम होकर 1.79 करोड़  रह गई थी। यह गिरावट 18 से 19 वर्ष के वोटर वर्ग में तेजी से देखी गई। इस बार 11.17 लाख वोटरों ने अपना नाम रजिस्टर करवाया। 2015 में ऐसे वोटरों की गिनती 24.13 लाख थी। 

दूसरा दिलचस्प पहलू यह है कि लोजपा इस बात का प्रचार कर रही है कि उसने 95 उम्मीदवारों में से 30  उन लोगों को टिकट दिया है जिनकी आयु 40 वर्ष से कम है। भाजपा भी वोटरों को जुटाने में लगी हुई है और उनके संकल्प पत्र में नौकरियों पर बड़ा ध्यान केन्द्रित किया गया है। 19 लाख नौकरियों के मौकों को उत्पन्न करने का दावा करने के लिए 11 प्रतिबद्धताओं में से 4 इसी मुद्दे पर रखी गई हैं। 

राजद नेता मनोज झा मानते हैं कि उनकी पार्टी को युवा मतदाताओं की गिनती में बदलाव से कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। हालांकि राजद ने इस पहलू पर बहुत ज्यादा निवेश किया है। पटना में राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार 30 वर्षों के नीचे के मतदाताओं की कुल गिनती 74000 युवा मतदाताओं की है।

राजग गठजोड़ से किनारा कर रही हैं पार्टियां
भाजपा के नेतृत्व में किसी समय राजग  सरकार के दूसरे कार्यकाल में इसकी सहयोगी पाॢटयां राजग को अलविदा कह इससे किनारा कर रही हैं। शिवसेना, अकाली दल और लोजपा के बाद 11 वर्ष पुराने इसके सहयोगी दल गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (जी.जे.एम.एम.) ने घोषणा की है कि आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों को टी.एम.सी. के साथ लड़ेंगे। 
किसी समय टी.एम.सी. के कड़े प्रतिद्वंद्वी रहे बिमल गुरूंग (जी.जे.एम.एम.) 3 वर्षों के बाद जमीन पर लौट आए हैं तथा अब राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भरपूर प्रशंसा कर रहे हैं। राजग का एक अन्य सहयोगी दल यू.पी. में अपना दल है और उसकी पार्टी नेता अनुप्रिया पटेल किसी समय 2014 से लेकर 2019 में मोदी कैबिनेट में सबसे युवा सदस्य थीं। 

मगर मोदी के दूसरे कार्यकाल में उन्हें शामिल नहीं किया गया। मिर्जापुर के डी.एम. के स्थानांतरण के मुद्दे को लेकर अनुप्रिया ने यू.पी. सरकार की आलोचना की थी और गठबंधन को छोड़ा था। इसके नतीजे में राजग के पास केवल जदयू गठबंधन में बचा है और जदयू की किस्मत का फैसला बिहार चुनावों के बाद तय हो जाएगा।

बिहार चुनावों में भाजपा के मुख्य प्रचारक हैं राजनाथ सिंह
एक समय ऐसा भी था जब भाजपा के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य चुनावी प्रचारकों में से एक थे। मगर इस बार ऐसा प्रतीत होता है कि रक्षामंत्री राजनाथ सिंह भाजपा के लिए सबसे व्यस्ततम प्रचारक बन चुके हैं। चुनावी क्षेत्रों में राजनाथ सिंह को अधिक से अधिक समय देने के लिए कहा गया है। 

बिहार राज्य इकाई ने राजनाथ सिंह से और समय देने की मांग की है। वहीं भीतरी सूत्रों के अनुसार राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विश्वास जीत लिया है। मोदी ने भी उनसे चुनावों को लेकर विचार-विमर्श किया है। राजनाथ महत्वपूर्ण सरकारी कमेटियों पर भी ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। इस दौरान अमित शाह अपनी मीडिया इंटरव्यू के माध्यम से पार्टी के संचार को देख रहे हैं। वर्तमान में अमित शाह अपने गृह पर हैं और गुजरात उपचुनाव में भी वह किसी तरह के प्रचार में भाग नहीं ले रहे। 

मध्यप्रदेश उपचुनावों में कमलनाथ का कठिन कार्य
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ मध्यप्रदेश के उपचुनावों में कठिन कार्य करने में व्यस्त हैं और इससे उन्होंने अपनी पार्टी को भी आश्चर्यचकित कर रखा है। कमलनाथ खुद ही ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव को खत्म करने के लिए लगे हैं जिन्होंने भाजपा में शामिल होकर उनकी सरकार गिराई थी। हालांकि कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी करना बेहद मुश्किल है क्योंकि उसे इस जादुई आंकड़े को पाने के लिए सभी 28 सीटें जीतनी होंगी।

कमलनाथ आश्वस्त हैं कि भाजपा जिसे अपने दम पर बहुमत हासिल करने के लिए 9 सीटों की जरूरत है वह सफल न होगी। कमलनाथ का लक्ष्य 28 में से 20 सीटें जीतने का है। वह प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में जी-जान लगाकर प्रचार कर रहे हैं। उनके साथ उनके पूर्व कैबिनेट सहयोगी भी शामिल हैं। ग्वालियर-चम्बल क्षेत्र में उन्होंने कई बाहरी लोगों की ड्यूटी लगा रखी है ताकि कोई भी कमी न रह जाए। कांग्रेस ने कभी भी उपचुनावों को गंभीरतापूर्वक नहीं लड़ा है मगर नाथ यह जानते हैं कि उपचुनावों के नतीजों पर उनका राजनीतिक भविष्य दाव पर लगा है। 

 

रोहिल नोरा चोपड़ा

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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