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भूखे, परेशान और थके हुए लोगों की कीमत पर सेंकी जा रही ‘राजनीतिक रोटियां’

  • Updated on 5/7/2020

तकलीफ़ में आदमी अपनी जमीन ढूंढता है। वहां वापस लौटना चाहता है। ख़ास तौर पर तब उसे बाहरी, कमज़ोर और ग़ैरज़रूरी समझ उस हाशिये से बाहर ढकेल दिया जाए, जहां वह पहले से ही ज़िंदा रहने का संघर्ष कर रहा था। तकलीफ़ में आदमी को बहुत सारी आश्वस्ति, गरिमा, मदद चाहिए होती है। 

गुजरात से अगर बीस लाख बाहरी मज़दूर लॉक डाउन के इतने दिन बाद भी अगर अपने अपने राज्य, गांव, घर लौटना चाहते हैं, तो यह साफ़ तौर पर उस विकास के गुजरात मॉडल पर न सिर्फ़ टिप्पणी है, बल्कि तगड़ा कटाक्ष भी। किसे पता होगा कि जिन नारों से मोहित होकर जनता ने अपनी सरकार चुनी थी, एक वाइरस का हमला उनके परखच्चे उड़ा कर रख देगा। आंखें बंद कर याद करिये एक-एक नारे को, और देखिये उनका हश्र।

घर वापसी की चाह रखने वाले ये वे लोग हैं जिनका हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे इन्फ्रास्ट्रक्चर, हमारे उद्योगों और वाणिज्य में योगदान है। इससे पता चलता है कि प्रवासी मज़दूरों के बिना जिस भी तरक़्क़ी की बात हम करते हैं, बेमानी है। भले ही हम न तो उनका ज़िक्र करते हैं, न ही उन्हें उनका हिस्सा दे पाते हैं। लॉक डाउन के बीच गांव लौटने की इच्छा रखना उन बहुत सारे ख़तरों को उठाने का फ़ैसला है, जो ज़ाहिर है मजबूरी में ही किया गया जाता है, ख़ुशी से नहीं। लौटने के बाद उनके राज्यों और गांवों में उनका बैंड बाजे और फूलों के साथ ख़ैरमक़दम नहीं किया जाने वाला है। वे जिन पुरानी मजबूरियों से बचने के लिए बाहर निकले थे, दरअसल अब इन नई मजबूरियों के सामने वहीं लौटने को कम तकलीफ़देह समझ रहे हैं। 

इस बीच टिकट या टिकट नहीं, खाना या खाना नहीं, ट्रेन या ट्रेन नहीं, पैसा या पैसा नहीं जैसे महत्वपूर्ण सवालों पर केन्द्र, राज्य, नेता जिस तरह से मुबाहिसा छेड़े हुए हैं, उससे उनका प्राथमिकताओं का साफ़ पता चल रहा है। जितने भी कन्फ्यूजन, अफ़रातफ़री, उठापटक हो सकती है, हो रही है। आरोप-प्रत्यारोप, वोट बैंक, साम्प्रदायिकता जो जैसी रोटी चाहे इन भूखे, परेशान, थके हुए लोगों की क़ीमत पर सेंक रहा है। ऐसे में सक्रिय नेतृत्व की ग़ैरमौजूदगी साफ़ दिखलाई दे रही है। बतौर देश हमने इन लोगों के साथ किया है, वह किस तरह धोखे से कम हैं। यानी अगर हम एक देश हैं, तो फिर लोग इतने परेशान क्यों है कि उन शहरों को अपना देश नहीं बना पाए, जहां वे अपने गांव छोड़कर आये थे? वे शहर उन्हें अपना क्यों नहीं बना पाए? कोरोना के दौरान कितनी सारी विभाजन रेखाएँ हमारे बीच भी उभर आई हैं।

इस अधपके से लोकतंत्र, थके हुए देश और प्रशासनिक मतिभ्रम की अवस्था में जहां मज़दूर परेशान हैं, उद्यमी भी उतने ही परेशान हैं। बीस लाख लोग गुजरात से लौट जाएंगे, तो लॉक डाउन ख़त्म होने पर काम वापस कैसे शुरू होगा। किस वायदे, किस भरोसे, किस क़ीमत, किस गारंटी से उन्हें वापस बुलाया जाएगा। और बुलाने पर भी क्या वापस आएंगे। नई परियोजनाओं की बात तो दूर की है, जो चल रही थीं, उन्हीं को वापस पटरी पर लाना मुश्किल हो जाएगा। यही बात मुम्बई पर लागू होगी और दिल्ली, हरियाणा, तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे हर उस जगह पर, जहां से भारतीय अर्थव्यवस्था के इंजन चलते हैं। हम भयानक अनिश्चितताओं की तरफ़ बढ़ रहे हैं, और उनमें से बहुत से ऐसी हैं जिनसे बचा जा सकता था और है।

अब किसी बात की कोई गारंटी साफ़ नहीं दिखलाई देती। ख़ास तौर पर उस भारत के लिए जो शाइनिंग इंडिया के सपने को साकार करने निकला था। लॉक डाउन करने और उसकी मियाद बढ़ाने का फ़ैसला जितना मुश्किल था, उससे ज़्यादा मुश्किल भारत की उत्पादकता, अर्थव्यवस्था, उद्योग, रोज़गार को वापस पटरी पर लाना होगा। 

दूसरी तरफ़ इस बात की भी कोई गारंटी नहीं कि वापस जाने के बाद उनके गांव या आसपास रहने खाने लायक़ काम होगा। वहां की ग़ुरबत और तकलीफ़ पहले से कम हो चुकी है, ऐसा नहीं है। तनाव, अराजकता और संघर्ष जिस भी तरह के हो सकते हैं, बढ़ेंगे। वर्तमान नेतृत्व चाहे केन्द्र में हो या राज्यों में, राजनीति में हो या नौकरशाही में - इन चुनौतियों के बीच इस देश की उस जनता को ऐसी तसल्ली नहीं दे पाया है जो हाशिये पर खड़े हैं। जो आर्थिक अवसरों के बीच और अपनी मेहनत से अपनी गर्दन ग़रीबी रेखा के ऊपर ला पाए थे। जितना उन्हें मिला था, उससे ज़्यादा उन्होंने दिया ही होगा। 

छोटी छोटी सी गारंटियों से जानें बच सकती थीं। लोग रूक सकते थे। रास्ते निकाले जा सकते हैं। उनकी कराह को सुना जा सकता था। लाठियों और गालियों का इस्तेमाल किये बिना भी। उन्हें छत, खाना, काम दिया जा सकता था। उन्हें बताया जा सकता था कि उनकी ज़रूरत है और आगे भी रहेगी। इतना ही तो करना था। आख़िर वे आलसी, अहसान फ़रामोश, बीमार लोग नहीं हैं। वे गैरतमंद, मेहनती लोग हैं, जो उम्मीद लेकर घर से बाहर निकले थे। 

कल हम फिर एक तस्वीर देखेंगे जिसमें एक भूख से परेशान, नाउम्मीद हो चुका, थके हुए मनुष्य पर कोई ख़ाकी वर्दी पहनकर धकिया रहा होगा। 

अगर और जब आँकड़े आएंगे, तो ये देखना दिलचस्प होगा कि कोरोना काल में लोगों ने ज़्यादा प्रवास किया या 1947 के विभाजन के दौरान। आज़ादी के 70 साल बाद सरकार अपने नागरिकों के साथ कैसे पेश आ रही है, ये उसकी मिसाल क़ायम करेगा। हम शायद इस बात को छाती पीटकर कह सकें कि भारत में भले ही भूख, थकान, बीमारी, ख़राब स्वास्थ्य सेवाओं, घर लौटते वक़्त, बेरोज़गारी से 2020 में ज़्यादा लोग मर गये, पर कोरोना से मरने वालों की तादाद कम रही। भले ही इसलिए कि हमने टेस्ट ही कम किये और वह भी ख़राब किट से, जिसे ख़रीदने में देर और भ्रष्टाचार दोनों हुआ।

फ़ौजी जहाज़ों की पुष्प वर्षा से ज़्यादा हम इस भयावह अहसास को ज़्यादा याद रखेंगे, जो हमने अपनी हड्डियों में महसूस किया। और 2020 वह साल रहेगा।

- निधीश त्यागी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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