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चीन के हितों के लिए जल्द ही पाकिस्तान की 'मृत्यु' हो सकती है

  • Updated on 5/14/2020

हाल के वर्षों में अमरीका तथा पाकिस्तान के रिश्ते बेहद खराब हो चुके हैं,  इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान लम्बे समय से अमरीकी शीत युद्ध का सहयोगी रहा था। अमरीकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने शुरू में भारत के साथ गठबंधन की मांग की थी। भारत न केवल एक लोकतंत्र देश था बल्कि यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी का घर भी था।  हिंद महासागर पर हावी होने की इसकी क्षमता ने  इसकी राजनीतिक महत्ता को बढ़ा दिया था।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने ट्रूमैन के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था, जो गुटनिरपेक्ष  की तलाश में थे। अमरीका के साथ काम करने के लिए पाकिस्तान के पास बहुत कम विकल्प थे। गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल होना उसके लिए भारतीय अधीनस्थता स्वीकार करने जैसा था क्योंकि गुटनिरपेक्ष आंदोलन रूसी प्रभाव की ओर झुक गया था। पाकिस्तान भी अपने हितों की रक्षा करने के लिए मास्को पर भरोसा नहीं कर सकता था क्योंकि मास्को हमेशा ही राजनीतिक कारणों के चलते दिल्ली की ओर झुका हुआ था।

शुरू में अमरीका तथा पाकिस्तान  दोनों ही अपनी शिकायतों को एक तरफ रखने के लिए तैयार थे। पाकिस्तान  सैंट्रल ट्रीटी आर्गेनाइजेशन (सी.ई.एन.पी.ओ.) संगठन जिससे ‘बगदाद संधि’ का नाम भी दिया गया था, का एक चार्टर सदस्य बन गया। 
 आपसी रक्षा की धारणा को उस  समय झटका लगा जब भारत-पाक में पहली बार 1965 में युद्ध छिड़ गया और उसके बाद 1971 में दोनों देशों  के बीच फिर लड़ाई हुई। पाकिस्तान ने भारत का आक्रामक रुख देखते हुए कहा कि अमरीका उसकी सहायता के लिए अवश्य आएगा।

अमरीकी अधिकारियों ने पाकिस्तान की सहायता करने के लिए इंकार कर दिया और संघर्ष शुरू करने के लिए पाकिस्तान पर आरोप मढ़ दिया। पाकिस्तान दोनों युद्ध हार गया और उसके मन में वाशिंगटन के कथित विश्वासघात के लिए एक गहरी सोच बैठ गई। पाकिस्तान के दृष्टिकोण से  अमरीका ने एक निष्पक्ष मित्र के तौर पर काम किया। 1970 के दशक की शुरूआत में अमरीकी कांग्रेस ने अपनी परमाणु गतिविधियों तथा हथियारों के जखीरे के लिए पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगा दिए। जब कभी वाशिंगटन को इस्लामाबाद की सहायता की जरूरत पड़ी तब अमरीकी सरकार ने विरोध करने के लिए लगाए गए प्रतिबंधों को माफ कर दिया।

अमरीका और पाकिस्तान के बीच खटास के इस लम्बे दौर के साथ चीन की ओर पाकिस्तान का रुख करना आश्चर्य करने वाला है। पाकिस्तानी  नेता चीन में रणनीतिक गहराई देखते हैं। वह चीन को ऐसा सहयोगी मानते हैं जो नियंत्रण रेखा के पार भारतीय प्रतिशोध का विरोध करने में सक्षम है।

चीन पाकिस्तान का एक ऐसा साथी है जो पाकिस्तानी भ्रष्टाचार, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खराब उपचार और उसके आंतरिक मानवाधिकार हनन के रिकार्ड की कभी आलोचना नहीं करता। चीन के लिए, पाकिस्तान एक  प्रमुख बाजार हो सकता है जो पश्चिम एशिया में एक जमीनी लिंक और ग्वादर में रणनीतिक बंदरगाह उसे प्रदान कर सकता है।

चीन के लिए पाकिस्तान एक प्रमुख बाजार हो सकता है
पाकिस्तानियों को जल्द ही इस बात का एहसास हो जाएगा यदि उन्होंने पहले से ही न किया हो कि उनके देश में एक शैतान से सौदा कर लिया है। चीन में, पाकिस्तान ने अपने आप को ऐसे देश के साथ जोड़ लिया है, जो पूरी तरह से अपने धर्म के आधार पर 10 लाख मुसलमानों के एकाग्रता शिविरों में उत्पीडऩ के लिए जिम्मेदार हैं।

पाकिस्तान ने एक ऐसे देश के साथ भागीदारी की है जो पाकिस्तान को मारने और पाकिस्तान को अपमानित करने के अलावा कभी कुछ नहीं सोचता। अब यह भी स्पष्ट रूप से साफ हो गया है कि चीन-पाकिस्तान आॢथक गलियारा पाकिस्तान में प्रसारण के लिए एक प्रमुख सड़क बन सकता है। जहां पर कोरोना वायरस विस्फोट हुआ वहां पर पाकिस्तान को हॉटस्पॉट्स को बंद करने में मध्यम सफलता मिली है और उसने संघर्ष किया है।

इस्लामाबाद में पाकिस्तानी प्राधिकारी अधिकारी चीनी आश्वासन स्वीकार कर सकते हैं। वह कभी भी यह मानने को तैयार नहीं कि इस महामारी को पहले स्थान पर फैलाने में चीन की जिम्मेदारी है। पाकिस्तानी नागरिकों के लिए अमरीकी विरोध और वास्तविक शिकायतों की कल्पना करना आसान हो गया है ताकि वह अपने कार्यों के लिए जिम्मेदारी से बच सकें और इस्लामाबाद-वाशिंगटन के बीच एक अभियान चला सकें। चीन ने एक साथ पाकिस्तान का साथ दिया क्योंकि इस्लामाबाद नए सहयोगियों की तलाश में था।

पाकिस्तानी जल्द ही यह पहचान कर सकते हैं कि चीन एक सांझीदार नहीं बल्कि एक उपनिवेशक जागीरदार चाहता है जो नागरिकों की मौत को पूरी तरह से अप्रासंगिक मानता है। चीन के हितों के लिए जल्द ही पाकिस्कतान की मृत्यु हो सकती है और पाकिस्तानी सरकार  इसे होने दे सकती है। इस मुद्दे की प्रकृति यह है कि पाकिस्तान के नेताओं ने अपने गठबंधन सहयोगियों को अमरीका से चीन में स्थानांतरित कर दिया है।

- माइकल रोबिन

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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