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इक्कीसवीं सदी में धर्म जोड़ने का औजार बनेगा या कि तोड़ने का

  • Updated on 8/8/2020

इधर ऐतिहासिक नगरी अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन और शिलान्यास हुआ, उधर एक और ऐतिहासिक नगरी इस्तांबुल में विश्व प्रसिद्ध म्यूजियम हाईया सोफिया को मस्जिद में बदल दिया गया। इधर दावा हुआ कि सदियों का दर्द और इंतजार पूरा हुआ। उधर दावा हुआ कि एक मस्जिद को म्यूजियम बना देने के कुफ्र से अब निजात मिली। एक साथ लेकिन एक-दूसरे से हजारों किलोमीटर के फासले पर हुर्ईं यह दोनों घटनाएं धर्म और राजनीति के रिश्तों पर सवाल उठाती हैं। 21वीं सदी में धर्म जोडऩे का औजार बनेगा या कि तोडऩे का? यह हमारे वक्त का यक्ष प्रश्न है। 

अयोध्या के सवाल को इस्तांबुल के आईने में देखना शुरू में अटपटा लग सकता है, लेकिन दोनों घटनाक्रमों में अद्भुत साक्ष्य हैं। ज्ञान की यूनानी देवी सोफिया के नाम पर बनी हाईया सोफिया शुरू में कोई एक हजार साल तक प्रसिद्ध चर्च हुआ करती थी। जब 15वीं सदी में उस्मानी साम्राज्य कायम हुआ तब सुल्तान मोहम्मद द्वितीय ने हाईया सोफिया को मस्जिद में बदल दिया, उसी काल में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनी थी। बाबरी मस्जिद की तरह ही 20वीं सदी में हाईया सोफिया की तकदीर भी बदली। जवाहर लाल नेहरू की तरह पश्चिमी आधुनिकता के पुजारी तुर्की के नायक कमाल अतातुर्क ने 1934 में हाईया सोफिया में नमाज बंद करवा कर उसे एक म्यूजियम में बदल दिया। तुर्की के सांस्कृतिक वैविध्य का दर्पण बना यह म्यूजियम दुनिया के बड़े दर्शनीय स्थलों में एक माना जाता रहा है। लेकिन तुर्की के इस्लामी मिजाज वाले नेताओं और मौलवियों को यह हरकत बहुत नागवार गुजरी। 

संयोग देखिए कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस से एक साल पहले 1991 में इस्लामी ताकतों के दबाव में हाईया सोफिया में एक प्रार्थनाघर की इजाजत देनी पड़ी। ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ की तर्ज पर तुर्की में भी ‘वापस मस्जिद बनाएंगे’ की मुहिम तेज हो गई। इधर 2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने उधर इस्लामी कट्टरपंथी रेजेप ताइप एर्दोन 2003 में तुर्की के प्रधानमंत्री बने। संयोग यह भी है कि 2014 में ही एर्दोन ने तुर्की के राष्ट्रपति की कमान संभाल कर सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की। इस साल 10 जुलाई को तुर्की के सर्वोच्च न्यायालय ने हाईया सोफिया को म्यूजियम बनाने वाले आदेश को गैर-कानूनी घोषित कर दिया और राष्ट्रपति एर्दोन ने हाईया सोफिया को वापस मस्जिद घोषित कर 24 जुलाई को वहां जाकर नमाज पढ़ी। 

पिछले 6 साल में राष्ट्रपति एर्दोन नायक से अधिनायक बन चुके हैं। संवैधानिक तौर पर तुर्की में आज भी एक लोकतांत्रिक बहुदलीय व्यवस्था है। वैसे इस्तांबुल के मेयर विपक्षी पार्टी से भी हैं। लेकिन पिछले सालों में कई विपक्षी नेताओं को संसद से निकाला गया है, आतंकवाद के झूठे मुकद्दमों में फंसाया गया है। चुनाव आयोग और न्यायाधीश सरकार की मुठ्ठी में हैं, जो मीडिया सरकार के खिलाफ बोलता है उसे या तो खरीद लिया जाता है या बंद करवा दिया जाता है। मस्जिद के सवाल पर बहुसंख्यक मुस्लिम समाज को नाराज न करने के डर से विपक्ष के अधिकांश नेता चुप हैं। सिर्फ कुछ बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकत्र्ता बोल रहे हैं कि देश में बढ़ती बेरोजगारी से ध्यान बांटने के लिए एर्दोन ने मस्जिद वाला पत्ता खेला है। 

हाईया सोफिया वाले किस्से की रोशनी में अब हम अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के निहितार्थ समझ सकते हैं। तुर्की की तरह यहां भी असली सवाल कानूनी नहीं है। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से दी है, तो भला निर्माण में क्या एतराज हो सकता है? सवाल जनमत का भी नहीं है। कम से कम हिन्दू धर्मावलम्बियों का बड़ा बहुमत और देश के जनमत का स्पष्ट बहुमत मंदिर बनाने के पक्ष में होगा। न ही आस्था के सवाल पर कोई बहस है। करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मंदिर अयोध्या में बने, इस पर कोई एतराज नहीं हो सकता। 

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कानून, जनमत और आस्था से आगे बढ़कर कहा कि  यह भव्य राम मंदिर आधुनिक भारतीय संस्कृति का प्रतीक बनेगा। सवाल है कि अगर यह मंदिर रामजन्म भूमि आंदोलन की विजय का प्रतीक है तो यह मंदिर होगा या विजयस्तम्भ? सच यह है कि हाईया सोफिया में मस्जिद और अयोध्या में राम मंदिर बनाने का धर्म और अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। यह दोनों विशुद्ध राजनीतिक खेल हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ताधारियों को अपनी कुर्सी खतरे में दिखती है, तब-तब उन्होंने धर्म और राष्ट्र सम्मान के प्रतीकों का सहारा लिया है। राम मंदिर के भूमि पूजन के अवसर पर राजनीतिक सत्ता और धार्मिक सत्ता का घालमेल देश के लिए किसी अनिष्ट का इशारा करता है। 

धर्म और राजनीति के रिश्ते को परिभाषित करते हुए राममनोहर लोहिया ने कहा था : राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालिक राजनीति है। हाईया सोफिया और अयोध्या में राम मंदिर का किस्सा हमें इस उक्ति को पलटने के लिए आमंत्रित करता है। जब धर्म अल्पकालिक राजनीति का औजार बन जाए और राजनीति धर्म की दीर्घकालिक दिशा तय करने लगे तो समझ लीजिए कि मामला गड़बड़ है।

-योगेन्द्र यादव

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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