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आखिर मजदूरों के 'विश्वास' पर क्यों नहीं खरी उतरीं राज्य सरकारें

  • Updated on 5/19/2020

भारत में श्रमिकों का इतने बड़े पैमाने पर पलायन अभूतपूर्व है। सारा देश ही नहीं, पूरी दुनिया महापलायन का यह मंजर देख रही है। यह सचमुच दुखद स्थिति है। जो मजदूर, श्रमिक और भूमिहीन किसान अन्य राज्यों में जाकर काम कर रहे थे, अपनी रोजी-रोटी कमा रहे थे, विकास में योगदान कर रहे थे, कोरोना संकट के समय उन्हें संभाले रखना उन राज्य सरकारों की जिम्मेदारी थी जहां इन्होंने अपने पसीने से उस राज्य की जी.डी.पी. को बढ़ाने में योगदान दिया, उनको समृद्ध किया। 
उन राज्यों का भी कुछ कत्र्तव्य था। मगर ज्यादातर राज्य सरकारें अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वहन करने में विफल रहीं। वे मजदूरों को महापलायन से नहीं रोक सकीं। वे उन्हें इस बात के लिए सहमत नहीं कर पाईं कि यही इनकी कर्मभूमि है और यहीं पर वे अपने परिजनों की जन्मभूमि और भविष्य भूमि भी बना सकते हैं।

आश्चर्य की बात तो यह है कि जो राज्य विकसित कहे जाते हैं, संपन्न माने जाते हैं, वहां स्थिति अधिक दयनीय रही। वे इन मजदूरों को रोकने, संभालने में नाकाम रहे और उनकी दो जून की रोटी का बीड़ा दो महीने के लिए भी नहीं उठा सके। हम जानबूझकर किसी राज्य का नाम नहीं ले रहे, क्योंकि सब देख रहे हैं कि क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है। किसी से भी कुछ छुपा नहीं है। जो भी हो रहा है, वह खुली सड़कों पर है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु,  पंजाब से तस्वीरें मीडिया और सोशल मीडिया में छाई हैं।

दुनियाभर से प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। मजदूर सैंकड़ों हजारों मील का पैदल सफर कर अपने गांवों की आेर जा रहे हैं। भूखे-प्यासे, सिर पर गठरियां-थैले उठाए और पैरों में छाले लिए वे लगातार चल रहे हैं। वे जान खतरे में डाल कर, सीमेंट मिक्सरों में बंद होकर, ट्रक, ट्रालों में सवार होकर या साइकिल चला कर भी जा रहे हैं। घरों से पैसे मंगाकर साइकिल या ऑटो खरीदकर जा रहे हैं। चींटियों-सी यह कतार पूरे देश में दिखाई दे रही है। इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि इनमें से कई अनजाने ही कोरोना के वाहक भी हो गए होंगे। इससे संक्रमण और फैलने का खतरा है। इसी खतरे को कम करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर में लॉकडाऊन की घोषणा की थी। इसकी समयावधि को भी तीन चरणों में बढ़ाया। मगर सारे उपाय बौने साबित हो रहे हैं। इस विफलता के पीछे कई कारण हैं, राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकतीं।

दो कटोरी खिचड़ी पर्याप्त नहीं
न रोजगार है। न पर्याप्त खाना। श्रमिकों और उनके परिवारों के लिए लॉकडाऊन का यह समय यातना जैसा है। मजदूर जो दिन भर मेहनत करता है। रोज सुबह अपने कमरे से प्याज और नमक के साथ छह मोटी रोटी खाकर काम पर निकलता था। मगर अब उसे भोजन के नाम पर क्या दिया जा रहा है?

राज्य सरकारों ने किसी को भी भूखा न सोने देने के बड़े-बड़े वायदे किए मगर दिया क्या जा रहा है? मजदूर को भोजन के नाम पर दी जा रही थी दो कटोरी खिचड़ी। इसके लिए भी लंबी लाइन में लगना था। वह भी कभी नसीब होती और कभी उसका नंबर आने से पहले खत्म हो जाती। दो कटोरी खिचड़ी किसी मजदूर और उसके परिवार के लिए पर्याप्त भोजन नहीं था। मदद के नाम पर केले और बिस्कुट देकर फोटो ङ्क्षखचवाने वाले लोग भी थे, मगर इस सबसे मजदूर का पेट तो नहीं भरता। इसने लॉकडाऊन को उसके लिए और तकलीफदेह बना दिया। उसका धैर्य जवाब दे गया और वह पैदल पलायन को मजबूर हुआ। राज्य सरकारें पर्याप्त भोजन-पानी की व्यवस्था कर मजदूरों के इस महापलायन को रोक सकती थीं। मगर वे ऐसा करने में विफल रहीं।

मजदूरों का विश्वास टूटा
मजदूर जिन राज्यों में अपने श्रम का योगदान कर विकास का पहिया दौड़ा रहे थे, वे राज्य मजदूरों का भरोसा कायम रखने में विफल रहे। रोजी की बात तो छोडि़ए राज्य सरकारों ने उनकी रोटी का भी कोई सही इंतजाम नहीं किया। श्रमिक ये विश्वास नहीं कर सके कि वे अगर रुके रहे तो क्या जिंदा बचेंगेे या नहीं।

मजदूरों ने जब भी छोटे-छोटे समूहों में एकजुट होकर कुछ मांगने की कोशिश की उन्हें दुत्कार दिया गया। प्रदर्शन करने पर उन्हें लाठियों से खदेड़ा गया। एेसे में भरोसा टूटने पर मजदूरों को सिर्फ अपने गांव की राह ही दिखाई दी। उन्हें रोक पाना मुश्किल हो गया। घर जाने की उनकी यह राह भी आसान नहीं रही।

 प्रवासियों की बड़ी संख्या
2011 की जनसंख्या के अनुसार देशभर में 45$36 करोड़ लोग एेसे हैं जो रोजी-रोटी की वजह से अपने घरों से दूर रह रहे हैं। यह देश की कुल आबादी का 47 प्रतिशत है। इनमें अन्य राज्यों तथा अपने ही राज्य में अन्य जिलों में रह रहे लोग शामिल हैं। बाहरी राज्यों के लोगों को लेकर कोई अलग से आधिकारिक डाटा उपलब्ध नहीं है।

2019 में अजीम प्रेमजी यूनिवॢसटी के एक शोध में कहा गया था कि देश के बड़े शहरों में 29 फीसदी आबादी दिहाड़ीदारों की है। इनमें रेहड़ी वाले और फेरीवाले भी शामिल हैं। एक अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश के करीब 40 से 46 लाख मजदूर, बिहार के 18 से 28 लाख, राजस्थान के दस लाख और मध्यप्रदेश के 9 लाख मजदूर अन्य राज्यों में रह कर रोजी-रोटी कमा रहे थे। यही लोग अब अपने घरों को लौटने को आतुर थे।

सबका पेट भरना आसान नहीं
रोटी, सब्जी और दाल की खुराक भी तैयार की जाए तो लागत 15 से 20 रुपए के बीच रहेगी। एक अनुमान के अनुसार सिर्फ एक लाख मजदूरों को रोज दो समय का भोजन देने के लिए ही 30 से 40 लाख रुपए की जरूरत पड़ती है। जिन बड़े शहरों में दिहाड़ीदारों, श्रमिकों, फेरी, रिक्शावालों की आबादी 29 फीसदी तक है, वहां के दैनिक खर्च और लंबे लॉकडाऊन के बोझ का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। इतना बड़ा बोझ उठाने की हिम्मत संपन्न राज्य भी नहीं उठा सके।

एेसा नहीं हंै कि सब जगह एक-सी तस्वीर है। कुछ बड़े राज्यों से मजदूरों के भूख और पलायन की तस्वीरें उतनी देखने को नहीं मिलीं, जितनी की कई संपन्न राज्यों से आईं। इसलिए एक बार फिर से वही बात दोहराना चाहूंगा कि इसमें शक नहीं कि समस्या विकट है मगर सच्चाई यह है कि इस विकट समस्या का समाधान खोजने का कोई प्रयास करते संपन्न राज्य नहीं दिखाई दिए। उलटे उन्होंने पल्ला झाड़ने की कोशिश की। मजदूरों को अपनी सीमाओं से दूसरे राज्यों में धकेल कर छुटकारा पाने की कोशिश करते भी नजर आए।

समाज की भी विफलता
मजदूरों के इस महापलायन को न रोक पाना सिर्फ सरकारों की विफलता ही नहीं है, यह इस समाज की भी विफलता है। एक तरफ जहां बहुत बड़े पैमाने पर कोविड-19 से लड़ाई लड़ी जा रही है पूरा समाज इससे लड़ रहा है। पूरी तरह सकारात्मक होकर इससे लड़ा जा रहा है, उसी के बीच मजदूरों के महापलायन के ये दृश्य पूरे समाज पर बड़ा धब्बा हैं। यह त्रासदी एक दुखद अध्याय को जन्म देती है।

यह सिर्फ एक मालिक और मजदूर के रिश्ते की बात नहीं है। यह भी सच है कि समाज उन्हें सड़कों पर निकलने से नहीं रोक पाया। उन्हें बड़ी ही अपमानजनक स्थिति में अपने घरों की आेर लौटना पड़ा। अब वे वापस  भी अगर मजबूरी में आ गए तो वो विश्वास नहीं होगा जो अतीत में कभी था।

- अकु श्रीवास्तव

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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