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the 1962 china attack was an insult to nehru and the 2020 china attack disgraced pm modi aljwnt

1962 का हमला नेहरू का ‘अपमान’ था, 2020 के हमले ने मोदी को किया ‘बदनाम’

  • Updated on 6/24/2020

मानव प्रवृत्ति का दोगलापन या भू-रणनीतिक नीतियां जिनमें मानवीय भावनाओं का कोई स्थान नहीं होता है और जब कोई राष्ट्र अपनी योजना, रणनीति बनाता है तो वह इन बातों का ध्यान रखता है। भारत और चीन दोनों यही कर रहे हैं और दोनों का संदेश है मेरे मामले में हस्तक्षेप मत करो। 

15-16 जून की रात को गलवान घाटी में निर्मम हमले में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए। यह 1967 में नाथूला में दोनों सेनाओं के बीच हुए सबसे बड़े टकराव के बाद का सबसे बड़ा संघर्ष है और इससे भारत और चीन दोनों युद्ध के कगार पर पहुंच गए हैं। यह तब हुआ जब 5 मई को दोनों देशों के बीच चीनी अतिक्रमण को लेकर समझौता हो गया था और यह हमला पूर्व नियोजित था और इसमें चीन के वरिष्ठ नेतृत्व की सांठ-गांठ भी थी। जिसके बाद भारत ने अपनी सीमा पर शांति बनाए रखने की सीमा प्रबंधन नीति में निर्णायक बदलाव किया। 

दोनों देशों के बीच 3488 किमी लम्बी वास्तविक नियंत्रण रेखा है। भारत और चीन दोनों एक-दूसरे पर वास्तविक नियंत्रण रेखा के अतिक्रमण का आरोप लगा रहे हैं किंतु दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा विवादास्पद है और यह निर्धारित नहीं है। किंतु इसे भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा की तरह संघर्ष का केन्द्र नहीं माना जाता था और अब तक दोनों देश ऐसी स्थिति से बचते रहे हैं जिससे सशस्त्र टकराव न हो। गलवान संघर्ष से दोनों देशों के बीच संबंधों में असहजता पैदा हुई है। भारत नें पैगोंग  झील, ट्रिग हाईट्स, बु्रटसे और डोलेटांगो क्षेत्र में भी चीनी अतिक्रमण की शिकायत की है। 

प्रश्र उठता है कि क्या यह खुफिया तंत्र की विफलता थी। क्या पैगोंग झील में चीन द्वारा ङ्क्षफगर 4 से 8 के बीच कब्जा करने को रोका जा सकता था? भारत के पास क्या विकल्प है और वर्तमान में चीन की वर्चस्ववादी सोच को देखते हुए लगता है कि भविष्य में इसके आक्रामक परिणाम निकलेंगे।

रणनीतिकारों का कहना है कि वर्तमान गतिरोध का कारण भारत द्वारा सीमा पर अवसंरचना का निर्माण है जिसमें श्योक होकर धारचुक, दौलतबेग ओल्डी सड़क का निर्माण भी शामिल है जिसमें 130जे  विमानों को उतारा जा सकता है और इससे रणनीतिक एयरलिफ्ट क्षमता बढ़ जाएगी। भारत को इस समस्या को विवेकपूर्वक हल करना होगा। गलवान संघर्ष बताता है कि चीन भारत-चीन सीमा को अपने लाभ के अनुकूल निर्धारित करना चाहता है। किंतु वह स्थिति को अस्पष्ट रखना चाहता है ताकि वह अपनी सलामी स्लाइसिंग योजना के अंतर्गत भारतीय भू-भाग पर कब्जा करता रहे। पहले कदम के रूप में भारत ने आॢथक हमला कर दिया है। 

हमें संबंधों को सामान्य बनाने के साथ-साथ राष्ट्रीय हितों को भी ध्यान में रखना होगा और इसके लिए हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि वास्तविकता बदल गई है। चीन आज उसी भाषा का प्रयोग कर रहा है जिसका प्रयोग वह 1962 में किया करता था। 1962 का हमला नेहरू का अपमान था। 2020 के हमले ने मोदी को बदनाम किया है। चीन की आदत है कि वह सीमा पर तनाव बनाए रखता है और अनिश्चितता की स्थिति बनाए रखता है जिससे दोनों पक्षों को यह पता नहीं है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा कहां है और इस बारे में दोनों की अलग- अलग धारणाएं हैं। किंतु गलवान की घटना ने बता दिया है कि अब भारत पर 1962 जैसी दादागिरी नहीं की जा सकती है। 

भारत सरकार गलवान घटना को नजरंदाज भी कर दे किंतु चीन का यह कदम भारत के प्रति उसकी चाल को दर्शाता है। इसलिए यह देखना होगा कि क्या यह हमला 2013 के डेपसांग, 2014 के चुमूर और 2017 के डोकलाम की तरह नहीं होगा  क्योंकि इन हमलों से भारत-चीन संबंध अस्थायी रूप से प्रभावित हुए थे। आज अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है। चीन का मुकाबला करने के लिए भारत को कूटनयिक, आॢथक और सैनिक प्रतिरोधक क्षमता अर्जित करनी होगी। पिछले सात दशकों से जिस सीमा का निर्धारण नहीं हुआ उसके बारे में कदम उठाने होंगे। 

वर्तमान में भारत के पास अधिक विकल्प नहीं हैं। एक विकल्प यह है कि सीमा विवाद का समाधान किया जाए जिसकी फिलहाल कोई संभावना नहीं है। चीनी सेना भारत को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से पीछे धकेलना चाहती है ताकि इस क्षेत्र में उसका वर्चस्व बना रहे। भारत को संतुलन बनाकर चीन को उसी के खेल में हराना होगा और उसके लिए हमें समुचित प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण करना होगा। भारत को  आक्रामक रुख अपनाना होगा। जब चीन को प्रतिरोध का भय होगा तो फिर वह एेसी हरकतें नहीं करेगा। 

अतीत में भारतीय सेना को धमकाने की आदी हो चुकी चीनी सेना उस समय चकित रह गई होगी कि 2020 का भारत 1962 का भारत नहींं है और वह तुरंत तथा दृढ़ता से उसका मुकाबला कर सकता है। हमें अपनी क्षमता को बढ़ाना होगा। आज भारत-चीन संबंध ठंडे पड़ गए हैं। दोनों देशों में अविश्वास है। फिर भी दोनों ने वार्ता को नहीं छोड़ा है हालांकि दोनों अपने-अपने रुख पर कायम हैं। भारत राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक हितों को नजरअंदाज नहीं कर सकता है। मोदी जानते हैं कि आज की भू-रणनीतिक, राजनीतिक वास्तविकता राष्ट्रीय राजनीति को निर्देशित करते हैं। 

भारत को व्यापक और बहुकोणीय रणनीति अपनानी होगी। हालांकि भारत चीन के साथ स्थायी शांति चाहता है किंतु केवल वह इसकी गारंटी नहीं दे सकता है। भारत के नए रुख के लिए विवेक, परिपक्वता और संयम की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित हो कि चीन-भारत संबंध भारत के नियंत्रण में रहें। इस शून्य काटा के खेल में तब तक बल का प्रदर्शन होता रहेगा जब तक दोनों देशों के बीच विश्वास कायम नहीं होता है। 

दीर्घकाल में भारत-चीन संबंध भारत के क्षेत्रीय और वैश्विक रणनीतिक लक्ष्यों और उद्देश्यों द्वारा निर्धारित होंगे। चीन एेसी हरकतों को नया नियम बनाना चाहता है हालांकि इन हरकतों के विरुद्ध प्रतिक्रिया और लक्ष्मण रेखा इस उपमहाद्वीप में शांति की गारंटी होगी। खेल के नियम बदलकर भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि ताली एक हाथ से नहीं बजाई जाती है।

- पूनम आई. कौशिश

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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