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The bitter truth of India China border aljwnt

भारत चीन सीमा का 'कड़वा सच' देश के सामने रखना जरूरी

  • Updated on 6/11/2020

चीन सीमा विवाद पर अखबारी सुॢखयां पढ़कर वह पुराना गीत याद आता है ‘पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ। पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा।’ पिछले एक महीने में सरकार की लाख कोशिश के बावजूद पर्दा कहीं-कहीं खिसकने लगा था, सच की झलक मिलने लगी थी। लेकिन अब जल्दी से पर्दा गिराया जा रहा है। सूत्रों के सहारे खबर लगा दी गई है कि सीमा पर तनाव खत्म होना शुरू हो गया है। खबर यह भी कहती है कि भारत और चीन दोनों की सेनाएं पीछे हट रही हैं। यानी कि सब चंगा सी।

लेकिन पर्दा हिलने से जो झलक मिली उसमें चार बड़े और कड़वे सच नजर आते हैं। पहला, चीन ने हमारे इलाके में योजनाबद्ध तरीके से एकतरफा हमला किया है। चीनी फौज ने मई के पहले सप्ताह में योजनाबद्ध तरीके से लद्दाख क्षेत्र में अब तक मान्य लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को कम से कम तीन जगह पार किया था। दूसरा कड़वा सच यह कि यह हमला कब्जे की नीयत से किया गया है। 

चीनी फौज ने सिर्फ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पार ही नहीं की है  बल्कि वहां टैंट-बंकर बनाकर  काबिज भी हो गई है। रक्षा विशेषज्ञों, सैटेलाइट तस्वीरों के विशेषज्ञों, पूर्व सेना अधिकारियों और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का अनुमान है कि चीनी फौज तीन क्षेत्रों में लगभग 30 से लेकर 60 वर्ग किलोमीटर के भारतीय इलाके पर कब्जा कर चुकी थी। 

अब तक संकेत यही हैं कि चीन दो इलाकों यानी गलवान घाटी और हॉट स्प्रिंग इलाके से हटने को राजी है, लेकिन चीनी फौज पैंगोंग झील इलाके के कब्जे को छोडऩे को तैयार नहीं है।  तीसरा कड़वा सच यह है कि गलती हमारी तरफ से हुई है। कारगिल की तरह  इस चीनी हमले का पूर्वानुमान लगाने और इसका तुरंत मुकाबला करने में भारतीय रक्षा व्यवस्था की ओर से भयंकर चूक हुई है। हर साल से हटकर इस साल गर्मी शुरू होने पर फौज को उन इलाकों में तैनात नहीं किया गया था जहां से चीन अंदर घुसा है। 

चौथा कड़वा सच यह है कि फिलहाल इस स्थिति को पलटने का कोई रास्ता भारत के सामने नहीं है। एक बार पैंगोंग झील जैसे सामरिक महत्व के इलाके पर कब्जा ले लेने के बाद चीनी फौज वहां से हटने वाली नहीं है। ‘पंचों की बात सर माथे, लेकिन परनाला यहीं गिरेगा’ वाली हरियाणवी कहावत से चीन का रुख समझा जा सकता है। चीन के खिलाफ जोर जबरदस्ती की नहीं जा सकती। 

सच यह है कि सामरिक और आॢथक ताकत के हिसाब से चीन भारत से इक्कीस है, और उससे कोई पंगा लेना भारी पड़ सकता है। कूटनीति के धरातल पर भी चीन के खिलाफ घेराबंदी करना आसान नहीं है क्योंकि पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने अपने तमाम पड़ोसियों से कुछ न कुछ झगड़ा मोल ले रखा है। नेपाल, श्रीलंका और बंगलादेश जैसे मित्र पड़ोसी भी आजकल नाराज चल रहे हैं। फिलहाल इस कड़वी खबर को पर्दे में रखने और जहर का घूंट पीने के सिवा कोई रास्ता नहीं है।

इसलिए सरकारी प्रवक्ता या तो चुप्पी साधे रखते हैं या फिर ऐसे गोल-मोल बयान देते हैं जिससे शक और भी गहरा हो जाता है। सरकार कहती है कि शांति वार्ता चल रही है, लेकिन यह नहीं बताती कि अचानक शांति वार्ता की जरूरत क्यों पड़ी?  

सरकारी प्रवक्ता चीन से लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल का सम्मान करने की अपील करते हैं, लेकिन यह मानने को तैयार नहीं होते कि चीन ने इस लाइन को पार किया है। रक्षा मंत्री अमूर्त आश्वासन देते हैं कि देश की सीमा की रक्षा की जाएगी, लेकिन जब चीन के अतिक्रमण के बारे में पूछा जाता है तो उनके मुंह में दही जम जाता है। पिछले प्रधानमंत्री को ‘मौनी बाबा’ बताने वाले वर्तमान प्रधानमंत्री खुद मौन हैं।

उधर सरकार समर्थक या तो इस सच पर पर्दा डालने में या फिर इससे ध्यान बंटाने में व्यस्त हैं। कल तक टी.वी. स्टूडियो में उछल-उछल कर पाकिस्तान से युद्ध करवाने में व्यस्त राष्ट्रवादी चैनलों को मानो लकवा मार गया है। अगर कोई टी.वी. बहस में इतना भी पूछ ले कि क्या चीनी फौज हमारे इलाके पर कब्जा कर बैठी हुई है, तो पलट कर उसी को राष्ट्र विरोधी बताया जाता है। अगर इस कसौटी पर कसा जाए तो कारगिल में पाकिस्तान की घुसपैठ की सूचना देने वाले देशद्रोही थे। इस हिसाब से क्या चीनी आक्रमण के बारे में नेहरू से कड़े सवाल पूछने वाले राममनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी की गिनती भी देशद्रोहियों में होगी?

असली सवाल से ध्यान बांटने के लिए चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का नारा भी चलाने की कोशिश हुई थी। अगर सीमा पर चीनी अतिक्रमण के विरुद्ध समग्र राष्ट्रीय संकल्प के हिस्से के रूप में आॢथक बहिष्कार होता है तब इसका एक सांकेतिक महत्व बनता। लेकिन  इसके लिए सबसे पहले रक्षा मंत्री को सीमा की रक्षा की हिम्मत दिखानी होती, वित्त मंत्री को चीनी कम्पनियों की पूंजी का मोह छोडऩा होता, वाणिज्य मंत्री को चीनी आयात के साथ-साथ निर्यात छोडऩे का मन बनाना होता, और देश को सोचना होता कि राष्ट्रीय एकता की प्रतीक सरदार पटेल की मूॢत बनाने का ठेका चीन की कम्पनी को क्यों दिया गया था। इतनी राष्ट्रीय हिम्मत जुटाए बिना सिर्फ आम जनता से चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की बात करना कायरता का लक्षण है।

विपक्ष भला ऐसे मौके को क्यों छोड़ दे? जैसे-जैसे लद्दाख का सच जग-जाहिर होता गया, वैसे-वैसे विपक्ष के स्वर तीखे होते गए हैं। राहुल गांधी सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। संभव है कि बिहार के चुनाव का बिगुल बजने के साथ यह सवाल और तेजी से उठेगा। लेकिन स्वास्थ्य और आॢथक संकट के मोर्चे पर कठिन लड़ाई लड़ रही सरकार को इस तीसरे मोर्चे पर घेरना देश के हित में नहीं है। इससे सरकार का ध्यान इन दोनों चुनौतियों से तो हटेगा ही, साथ ही सरकार चीन के मोर्चे पर जल्दबाजी में कुछ गलत कदम उठा सकती है। उसकी कीमत बहुत बड़ी हो सकती है।

चीन के दीर्घकालिक इरादों और उसकी ताकत को देखते हुए समझदारी इसी में है कि पहले भारत अपनी कूटनीतिक और सामरिक स्थिति मजबूत करे। फिर ठीक अवसर और ठीक जगह पर समुचित जवाब दिया जाए। इस रणनीति पर राष्ट्रीय सहमति बनाने के लिए प्रधानमंत्री को पहल करनी होगी। सब कुछ चंगा सी के पीछे छुपने की बजाय उन्हें लद्दाख सीमा का पूरा सच कम से कम कुछ विपक्षी नेताओं को बताना होगा। यह स्वीकार करना होगा कि चीनी राष्ट्रपति शी के साथ झूला कूटनीति फेल हो गई है। तब विपक्ष की भी जिम्मेवारी बनेगी कि वह सरकार को घेरने की बजाय विदेश और सुरक्षा नीति में राष्ट्रीय सहमति की परंपरा को बनाए रखे।

- योगेन्द्र यादव

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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