Tuesday, Jan 25, 2022
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the bodoland agreement paves the way for assams integrity

बोडोलैंड समझौते से असम की ‘अखंडता’ का रास्ता साफ

  • Updated on 1/31/2020

अर्थव्यवस्था की दिन-ब-दिन बिगड़ती हालत तथा नागरिकता संशोधन कानून से उपजे विवाद के कारण देश भर के हालात बेहद गम्भीर हो चुके हैं। मगर इस बीच देश के पूर्वोत्तर से एक अच्छा समाचार भी आया है। असम में बोडो जनजातीय से समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। इस समझौते के बारे में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि इससे दशकों पुराने मुद्दे का अंतिम और व्यापक समाधान निकला है। इससे असम की अखंडता का रास्ता साफ हो गया।

बोडो प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा से 4000 से अधिक मौतें हुई थीं। इसके अलावा सरकारी तथा निजी सम्पत्ति को भारी नुक्सान उठाना पड़ा था। मैंने 1980 के अंत में इस क्षेत्र से रिपोॄटग की थी जब आल बोडो स्टूडैंट्स यूनियन (ए.बी.एस.यू.) ने उपेन्द्र नाथ ब्रह्मा के नेतृत्व में पृथक बोडो जनजातीय राज्य की मांग को लेकर एक विशाल आंदोलन छेड़ा था। इसके साथ-साथ बोडो के हथियारबंद विंग ने बंगलादेश की सीमा के आसपास से मिले समर्थन के साथ बोडोलैंड की आजादी की मांग रखी थी। ऐसे भी समाचार थे कि चीन बोडो आतंकियों को हथियार तथा गोला-बारूद की आपूॢत कर रहा था।

कोकराझार के केन्द्र बिन्दू के साथ फैले विस्तृत क्षेत्र में बोडो ने ङ्क्षहसा फैलाई थी। बोडो संगठनों ने लगातार पब्लिक कफ्र्यू लगाने तथा हिंसा फैलाने जैसी बातों को अंजाम दिया था। इसके अलावा पूरे देश को पूर्वोत्तर के साथ जोडऩे वाले रेल ट्रैफिक को भी अवरुद्ध किया था। असम जोकि वर्तमान में सी.ए.ए. के विरुद्ध विशाल प्रदर्शन को देख रहा है, देश में सबसे जटिल राज्यों में से एक है। यह विभिन्न जनजातीय तथा जातीय समूह के साथ विविध जनसंख्या वाला राज्य है। वर्तमान आंदोलन मुसलमानों को बाहर निकालने के विरुद्ध नहीं बल्कि यह तो अन्य धार्मिक समूहों को शामिल करने के बारे में है, जिन्हें नागरिकता मिल सकती है। असमी लोगों का कहना है कि वे तो पहले ही विदेशियों की बाढ़ को झेल रहे हैं जिसमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हैं। इससे ज्यादा और लोगों का स्वागत नहीं किया जा सकता। पूरा असम आंदोलन राज्य में गैर-असमियों के प्रवेश के खिलाफ है। इससे असमी लोग कम होकर अल्पसंख्यकों में बदल जाएंगे। यह खतरा उनके सिर पर मंडरा रहा है।

राज्य की जनसंख्या के 15 प्रतिशत हिस्से वाले जनजातीय लोग अपनी संस्कृति तथा पहचान को कायम रखने की कोशिश में हैं। कार्बी आंगलांग तथा नार्थ कछार हिल्स से संबंध रखने वाले जनजातीय स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं। इन समूहों में सबसे अहम बोडो जनजातीय लोग हैं जोकि राज्य में सभी जनजातीय लोगों का 60 प्रतिशत हैं। वे केवल राज्य की जनसंख्या का 10 प्रतिशत तथा बोडो द्वारा प्रभावित असम में कुल क्षेत्र का 11 प्रतिशत हिस्सा बनते हैं। वे भी गैर-बोडो की घुसपैठ के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका तो यह भी पक्ष है कि असमी लोग भी उनके लिए बाहर के लोग थे। इसी कारण हाल ही का समझौता बेहद अहम है। यह समझौता केन्द्र के प्रतिनिधियों, असम सरकार तथा नैशनल डैमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एन.डी.एफ.बी.) के आतंकियों के 4 गुटों के प्रतिनिधियों के साथ हुआ है। इस समझौते में स्थानीय शक्तियों, भाषा, क्षेत्र तथा उनके नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामलों की वापसी से संबंधित विभिन्न मांगें शामिल हैं।

संयोगवश बोडो के साथ यह तीसरा समझौता है। पहला 1993 में कायम हुआ था, जिसके अनुसार बोडो अधिकार वाले क्षेत्रों को स्वायत्त कौंसिल घोषित किया गया था। दूसरे समझौते पर 2003 में हस्ताक्षर हुए थे मगर दुर्भाग्यवश दोनों ही समझौते किसी नतीजे को कायम नहीं कर सके। इससे कोई समाधान नहीं निकला क्योंकि बोडो के बीच गहरी गुटबाजी व्याप्त थी। वास्तव में इसके संस्थापक नेता उपेन्द्र नाथ ब्रह्मा की मौत युवावस्था में कैंसर के कारण हो गई। उसके बाद कई बोडो जनजातीय के छोटे-छोटे समूह पैदा हो गए, जो एक-दूसरे को एक आंख नहीं भाते थे।

नवीनतम समझौते में सभी गुट शामिल हैं तथा यह प्रावधान है कि बोडो द्वारा दावा किए गए क्षेत्र को जिले की तुलना में एक क्षेत्र माना जाएगा। ऐसा भी माना जा रहा है कि 3 दशकों से चली लम्बी ङ्क्षहसा ने लोगों को कमजोर तथा क्षीण कर दिया है। अब ये लोग क्षेत्र में सामान्य स्थिति चाहते हैं। अब यह एक ही पार्टी द्वारा संचालित केन्द्र तथा राज्य सरकार के ऊपर निर्भर है कि वह जनजातीय क्षेत्र में शांति तथा अखंडता स्थापित करने के लिए ईमानदारी से काम करे। यहां तक कि बोडो ट्राइबल कौंसिल भाजपा में निष्ठा रखने वाले एक नेता द्वारा संचालित है। ऐसे प्रयास होने चाहिएं कि सभी समूहों संग ईमानदारी के साथ समन्वय बनाकर चला जाए। लम्बे समय से अशांति झेल रहे इस क्षेत्र को अब शांति तथा तरक्की दरकार है।

- विपिन पब्बी

 

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