Friday, Jul 30, 2021
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this is not the time to show ego and play politics aljwnt

यह समय ‘अहम दिखाने’ और ‘राजनीति खेलने का नहीं’

  • Updated on 6/1/2021

न तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) और न ही केन्द्र की मोदी सरकार एक-दूसरे पर आरोप मढ़ने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रही। पिछले सप्ताह अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए राज्य में चक्र्रवात से हुई बर्बादी की समीक्षा के लिए हुई बैठक से ममता बाहर रहीं।

प्रोटोकॉल की एक दुर्लभ अवहेलना में ममता ने मोदी को 30 मिनट तक इंतजार करवाया। उनसे छोटी मुलाकात की। विवेचना तथा क्षति के मूल्यांकन होने के बीच ममता ने बैठक को छोड़ दिया। इस तरह की गंदी राजनीति को खेलने के लिए भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा राजनाथ जैसे कुछ केन्द्रीय मंत्रियों ने ममता की आलोचना की।

चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों के बीच उपजती खटास को हम समझ सकते हैं। पश्चिम बंगाल में एक बड़ी जीत के बाद यहां तक कि चुनाव के बाद तक भी ङ्क्षहसा जारी रही और दोनों ओर से प्रतिशोध की राजनीति अभी भी चल रही है। चुनाव के नतीजों के बाद सी.बी.आई. ने तृणमूल कांग्रेस के 4 नेताओं को गिरफ्तार किया। सभी की भौंहें उस समय तन गईं जब केन्द्र ने पिछले सप्ताह प्रमुख सचिव को उस समय वापस बुला लिया जब उनकी सेवानिवृत्ति को एक माह का समय रहता था।

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जिस तरह से मोदी सरकार गैर-कांग्रेस मुख्यमंत्रियों के साथ कोविड समीक्षा की बैठकों में बर्ताव कर रही है इसको लेकर ममता ने आलोचना जारी रखी है। उनका कहना है कि ‘‘हमारी बेइज्जती और हमें शर्मसार किया गया है। तानाशाही चल रही है। प्रधानमंत्री मोदी अपने आपको इतने असुरक्षित महसूस करते हैं कि वह मुख्यमंत्रियों को सुनना तक पसंद नहीं करते। आखिर यह डर किस बात का है?’’

यदि हम पिछले इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि नेहरू युग में इस तरह का व्यवहार कभी नहीं झेला गया हालांकि ज्यादातर राज्यों में कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों का शासन था। उनका आपस में रिश्ता मैत्रीपूर्ण था। प्रधानमंत्री नेहरू निरंतर ही मुख्यमंत्रियों के सम्पर्क में रहते थे और उनको वर्तमान मामलों से निपटने के बारे में सूचित करते रहते थे।

नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने कुछ समय तक शासन किया और उन्होंने पाकिस्तान के साथ-साथ अन्य समस्याओं को भी झेला। कांग्रेस को झटका 1967 के चुनावों में मिली शर्मनाक हार के बाद लगा। इंदिरा गांधी ने शास्त्री के बाद देश की बागडोर संभाली और इसके बाद गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की गिनती बढ़नी शुरू हो गई।

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तमिलनाडु एक ऐसी मिसाल थी जहां मुख्यमंत्री करुणानिधि इंदिरा गांधी से भिड़ गए। करुणानिधि के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ भी अच्छे रिश्ते नहीं थे। अन्नाद्रमुक संस्थापक और मुख्यमंत्री एम.जी. रामचन्द्रन ने केन्द्र के दाईं ओर रहने का निश्चय किया। यहां तक कि मोरारजी देसाई सरकार के दौरान भी यही बात रही। उनके इंदिरा गांधी के साथ बड़े ही सुखद रिश्ते रहे।

एम.जी. रामचन्द्रन की उत्तराधिकारी जयललिता के इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के साथ सौहार्दपूर्ण रिश्ते रहे मगर वह पी.वी. नरसिम्हा राव तथा भाजपा के प्रथम प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भिड़ गईं। यहां तक कि उन्होंने वाजपेयी सरकार को 1998 में गिरा डाला, बावजूद इसके कि वह एन.डी.ए. की सहयोगी थी।

जयललिता ने उस समय प्रोटोकॉल तोड़ा जब वह 1999 में वाजपेयी की तमिलनाडु यात्रा के दौरान उनसे मिलने तक नहीं गईं। जयललिता ने जानबूझ कर चेन्नई छोड़ा।

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पी.वी. नरसिम्हा राव के समय डा. चेन्ना रैड्डी की बतौर तमिलनाडु के राज्यपाल की नियुक्ति को लेकर भी नाराज हो गई। दोनों अहंकारी नेताओं के मध्य शब्दों के बाण चले। जयललिता ने राज्यपाल की वापसी की मांग की मगर राव सहमत नहीं हुए।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव के इंदिरा गांधी के साथ सार्वजनिक तौर पर झगड़ा रहा और उन्होंने 1984 में उस समय अपने विधायकों को राष्ट्रपति के समक्ष खड़ा किया जब इंदिरा गांधी ने रामाराव की सरकार को बर्खास्त कर डाला और उन पर उन्हें पुनस्र्थापित करने का दबाव डाला गया।

मोदी के भी गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों के साथ सुखद रिश्ते नहीं हैं। पिछले माह कोविड समीक्षा की बैठक को लाइव दिखाने पर प्रधानमंत्री ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर आपत्ति की। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि यह हमारी परम्परा और प्रोटोकॉल के विरुद्ध है।

जहां मुसलमान वहां हिंसा क्यों

मुख्यमंत्रियों तथा राज्यपालों के बीच नोक-झोंक भी कोई नई बात नहीं। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, पुड्डुचेरी तथा दिल्ली कुछ ऐसी मिसालें हैं जहां पर मुख्यमंत्रियों तथा राज्यपालों के बीच युद्ध होना आम बात हो गई है।
मोदी सहकारिता संघवाद तथा प्रतियोगी संघवाद के बारे में बात करते हैं। इसके साथ-साथ वह ‘टीम इंडिया’ पर जोर देते हैं। सहकारी संघवाद एक ऐसा विचार है जहां पर केन्द्र और राज्यों के बीच रिश्ते एक साथ आने की बात करते हैं और आम समस्याओं को सुलझाना चाहते हैं।

पिछले वर्ष मोदी सफल थे जब उन्होंने कोविड रणनीति को लागू करने के लिए मुख्यमंत्रियों का सहयोग मांगा मगर 2021 में विधानसभा चुनावों के दौरान राजनीति इन सब मुद्दों पर भारी पड़ गई। गैर-भाजपा शासित प्रदेशों ने ऑक्सीजन तथा वैक्सीनेशन की कमी की शिकायत की और दिल्ली जैसी सरकार तो अदालत की शरण में चली गई।

मोदी जानते हैं कि उनकी सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय दल हैं। यह ऐसा समय है कि केन्द्र और राज्य एक साथ आएं और अपनी चुनावी मानसिकता से उठें। यह समय अहम दिखाने और राजनीति खेलने का नहीं।

- कल्याणी शंकर

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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