Thursday, Feb 27, 2020
vikas purush kejriwal on the throne of delhi

दिल्ली के तख्त पर ‘विकास पुरुष’ केजरीवाल

  • Updated on 2/12/2020

7 वर्ष पूर्व किसने सोचा था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के तख्त पर तीसरी बार बैठेंगे। हालांकि ‘आप’ 2013 में एक विध्वंसकारक के तौर पर आई थी और इसे ‘कल का छोकरा’ कहकर शुरू में नकार दिया गया था। केजरीवाल ने लोगों का मूड भांप कर अपने आलोचकों को आश्चर्यचकित कर दिया। अपने रोलर कोस्टर के राजनीतिक झूले में अच्छा करने के लिए केजरीवाल बदलाव लाए। उनके आलोचकों ने उन्हें अराजकवादी करार दिया। वास्तव में दिल्ली उनकी महत्वाकांक्षा का अंतिम छोर नहीं था। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनौती दी और 400 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा, जिससे पता चलता है कि वह कितने महत्वाकांक्षी थे। इस बार भी जीतने के बाद ‘आप’ राष्ट्रीय निर्माण के बारे में बात कर रही है। जब केजरीवाल ने देखा कि उनके लिए गुंजाइश कम है तब उन्होंने अपना ट्रैक फिर से चेंज कर लिया।

मगर अब दिल्ली विधानसभा चुनावों में अपनी जोरदार जीत के साथ केजरीवाल संतुष्ट होंगे। यह दूसरी बार है कि मोदी मैजिक दिल्ली चुनावों में काम नहीं कर पाया। उल्लेखनीय है कि 2019 में भाजपा ने एक प्रभावशाली जीत दर्ज की थी। दिल्ली चुनावों में ‘आप’ और भाजपा आमने-सामने थीं। दिल्ली को फिर से हथियाने के लिए भाजपा ने अपना पूरा जोर लगा दिया। तीन दशकों से वह दिल्ली में जीत के लिए तरस रही है। इस बार उसने हाई प्रोफाइल नेताओं को काम में लगा रखा था।

मोदी को मोदी से ही दी शिकस्त
आखिर केजरीवाल के लिए इस बार किस चीज ने कार्य किया। केजरीवाल ने मोदी को मोदी से ही शिकस्त दी। मोदी ने 2014 का चुनाव विकास के मुद्दे पर जीता था तथा केजरीवाल ने मोदी के इस आइडिया को चुरा लिया तथा इसका इस्तेमाल दिल्ली चुनावों में किया। पांच साल के अपने रिकार्ड को लिए हुए केजरीवाल दिल्ली के मतदाताओं तक खाली हाथ नहीं गए। उनके तरकश में कल्याणकारी मुद्दे जैसे फ्री बिजली, पानी, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, बेहतर शिक्षा सहूलियतें, आम आदमी की चौखट तक सेवाओं की डिलीवरी, महिलाओं के लिए फ्री बस राइड, बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग, सी.सी.टी.वी. इत्यादि शामिल थे। उन्होंने सरकार की कारगुजारी पर ही वोट मांगे। हालांकि उनके आलोचक यह आरोप लगाते हैं कि करदाताओं के पैसे को उड़ाते रहे। गरीबों के लिए किए गए कार्य ही उनके हक में रहे। इसके अलावा केजरीवाल ने अपने आपको शाहीन बाग, सी.ए.ए. विरोधी प्रदर्शनों तथा घृणा जैसी राजनीति से दूर रखा। उनके मतदाताओं में मुसलमान भी एक हिस्सा थे।

एंग्री यंगमैन की छवि में किया बदलाव
दूसरी बात यह है कि केजरीवाल कुछ भी न होते यदि वह जल्दी से सीखते नहीं। उन्होंने अपनी गलतियों से सीखा और 2017 में दिल्ली म्यूनीसिपल कार्पोरेशन चुनावों में ‘आप’ की शर्मनाक हार के बाद अपनी कार्यशैली के स्टाइल को बदल दिया। मगर असली बदलाव 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद मिली हार से आया। इस कारण केजरीवाल ने अपनी छवि को सुधारना जारी रखा। 2012 में एंग्री यंगमैन की छवि दिखाने के बाद उन्होंने अपने आपको 
विकास पुरुष के तौर पर प्रस्तुत किया। मफलरमैन केजरीवाल ने अपना मफलर हटा कर अपने आपको एक पारिवारिक व्यक्ति के तौर पर प्रोजैक्ट किया। जीतने की लालसा में उन्होंने अपना ध्यान दिल्ली पर केन्द्रित करते हुए ब्रैड एंड बटर जैसे मुद्दे उठाए। भाजपा पर यही मुद्दा भारी पड़ा। 

पी.एम. तथा सी.एम. में एक बेहतर रिश्ता पनपा
तीसरी बात यह है कि बदले की राजनीति पर विराम लगाकर ‘आप’ ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने के विवादास्पद विधेयक का राज्यसभा में समर्थन किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के राम मंदिर पर दिए गए फैसले का भी स्वागत किया। इसके नतीजे में पी.एम. तथा सी.एम. में एक बेहतर रिश्ता पनपा। जब केजरीवाल 51 वर्ष के हुए तो मोदी ने उनको हैप्पी बर्थडे संदेश भेजा।

चौथी बात यह है कि चुनावों के दौरान उन्होंने स्थानीय मुद्दों की कहानी लिखी। इसके विपरीत भाजपा राष्ट्रीय मुद्दे उठाती रही। उन्होंने सोशल मीडिया तथा रेडियो पर अपने विज्ञापनों की झड़ी लगा दी। केजरीवाल के आलोचकों का दावा है कि उन्होंने अपने ऊपर तथा पार्टी प्रचार पर 500 करोड़ रुपया खर्च किया।

पांचवां यह कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश कि उपराज्यपाल मंत्रिमंडल के परामर्श तथा सहायता के साथ कार्य करेंगे, केजरीवाल ने दिल्ली के उपराज्यपाल के साथ निरंतर लड़ाई को त्याग दिया। अदालत में चल रही लड़ाई भी खत्म हो गई। 
छठी बात और भी महत्वपूर्ण है कि न तो कांग्रेस और न ही भाजपा के पास केजरीवाल जैसा कद्दावर नेता है। भाजपा तो मोदी मैजिक पर ही शर्त लगाती है और जबकि कांग्रेस शीला दीक्षित के 3 कार्यकालों का गुणगान करती रही।

संक्षेप में केजरीवाल की जीत 4 मुख्य कारणों के कारण सम्भव हुई। पहला यह कि केजरीवाल लोगों को विश्वास दिलाने में सफल हुए कि उनके दूसरे कार्यकाल को लोगों ने सराहा। दूसरी बात, लोगों ने उन्हें उनकी पुरानी राजनीतिक नौसिखिए की इमेज के विपरीत उन्हें एक अच्छा नेता माना। तीसरी बात कांग्रेस का अस्तित्व खत्म हुआ और भाजपा के पास कोई योग्य नेता नहीं था। चौथी बात यह है कि वह गरीब निर्वाचन क्षेत्र का पोषण करने में सफल रहे। उन्होंने अवैध कालोनियों को नियमित करने का श्रेय लिया। ध्रुवीकरण की राजनीति से केजरीवाल ने अपने आपको दूर रखा। यहां पर यह भी खतरा है कि केजरीवाल की हैट्रिक उन्हें कहीं निरंकुश न बना डाले। उनके आलोचक पहले से ही कहते हैं कि  केजरीवाल अपने इर्द-गिर्द व्यक्तित्व पंथ बना रहे हैं। ‘आप’ तथा इसके प्रमुख को याद रखना चाहिए कि उनके समक्ष बहुत सी चुनौतियां हैं। 
- कल्याणी शंकर

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