Saturday, May 15, 2021
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‘उत्तराखंड आपदा से मिलते चेतावनी के संकेत’

  • Updated on 2/19/2021

उत्तराखंड (Uttarakhand) में 2010 से 2013 के बीच आई आपदाएं तथा अब हालिया 7 फरवरी 2021 को ग्लेशियर टूटने की घटना ने अनिश्चितताओं, तैयारियों के अभाव, कमियों तथा आपदाओं ने जोखिमों को लेकर कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सबसे पहले यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि उत्तराखंड भारत के सर्वाधिक आपदा प्रवृत राज्यों में से एक है। एक अन्य बिंदू जिसे अवश्य दिमाग में रखा जाना चाहिए वह यह कि इस हिमालयी राज्य में अत्यंत आध्यात्मिक, धार्मिक तथा पर्यावरणीय समृद्धता तथा विभिन्नता है। इस परिप्रेक्ष्य में हमें आवश्यक तौर पर पारिस्थितिकीय तथा भौगोलिक प्रणालियों की नाजुक प्रवृत्ति की समीक्षा करनी चाहिए जो सीधे तौर पर लोगों तथा देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले तीर्थ यात्रियों के जीवन तथा स्वास्थ्य पर असर डालती है। 

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के विशेषज्ञों ने विकास परियोजनाओं की विस्तृत समीक्षा के साथ उत्तराखंड की नाजुक पारिस्थितिकीय प्रणाली का व्यापक अध्ययन किया है। यहां उल्लेखनीय है कि एकतरफा विकास गतिविधियों ने पारिस्थितिकीय आपदाओं की आवृत्ति तथा तीव्रता में वृद्धि की है। 

‘चुनाव घोषणा पत्र या मतदाताओं को लॉलीपॉप?’

उत्तराखंड आपदाओं की आवृत्ति तथा प्रवृत्ति आॢथक विकास तथा पर्वतों के संबंध में प्राकृतिक मुश्किलों के बीच गंभीर अंतराल को दर्शाती हैं जो गर्म जलवायु के प्रभाव के चलते निरंतर बदलाव की प्रक्रिया में रहती है। दरअसल इन्होंने पन-विद्युत बांधों की संख्या के चलते विनाश में अपनी भूमिका निभाई है। 7 फरवरी 2021 की घटना ने ऋषि गंगा विद्युत परियोजना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया तथा एक अन्य निर्माणाधीन तपोवन विष्णुगाद परियोजना को गंभीर नुक्सान पहुंचाया। इस कारण चमोली जिला में बाढ़ आ गई जिसमें सबसे अधिक योगदान ऋषि गंगा नदी, धौली गंगा नदी तथा अलकनंदा ने बड़ी भूमिका निभाई।

यह कोई रहस्य नहीं है कि विकास गतिविधियों के चलते बांधों के आसपास उभरे नए नगरों ने विनाशकारी परिणामों के लिए मार्ग प्रशस्त किया है। 2013 की आपदा के बाद सुप्रीमकोर्ट ने बाढ़ों के चलते ऊंचे पर्वतों में पनविद्युत परियोजनाओं के कारण बढ़ते जोखिमों की ओर इशारा किया था। इस प्रक्रिया में हजारों लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी तथा कम से कम 10 पनविद्युत परियोजनाओं को नुक्सान पहुंचा था। इसके बाद शीर्ष अदालत ने क्षेत्र में नई विद्युत परियोजनाओं के लिए परमिट्स पर प्रतिबंध लगा दिया था। यहां महत्वपूर्ण प्रश्र यह है कि सुप्रीमकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद क्यों विद्युत परियोजनाओं को इजाजत दी गई। जैसा कि 2021 की आपदा ने दिखाया है, सुरक्षा मानदंडों की स्पष्ट रूप से अनदेखी की गई। 

‘शहरी-नक्सली राष्ट्र के लिए एक नया खतरा’

सुरक्षित स्थानों पर नई पनविद्युत परियोजनाएं लगाने के लिए विश्वसनीय वैज्ञानिकों तथा नीति निर्माताओं के बीच करीबी तालमेल की जरूरत होगी क्योंकि ऐसी परियोजनाओं के लिए केवल कुछ स्थान सुरक्षित हो सकते हैं।

स्थानीय कार्यकत्र्ता धनसिंह राणा का कहना है कि क्षेत्र में बसने वाले समुदाय बड़े बांधों की बजाय छोटे स्तर की ‘लघु-पन’ परियोजनाओं को अधिमान देते हैं क्योंकि ऐसी छोटी परियोजनाएं पर्यावरण पर अधिक प्रभाव डाले बिना पर्वतीय समुदायों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होती हैं। मैं धन सिंह राणा के साथ पूरी तरह सहमत हूं।

‘लव जेहाद : अदालतों के फैसले से फिर जागी उम्मीद’

ज्यूरिख स्थित स्विस फैडरल इंस्टीच्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी के ग्लेशियर विज्ञानी फैबियन वाल्टर का कहना है कि आपदाएं आती हैं तथा हमेशा आती रहेंगी। जिस बात का एहसास नहीं किया जा रहा वह यह कि जलवायु परिवर्तन स्थिति को कहीं अधिक बदतर बना सकता है। 

एक भूस्खलन विशेषज्ञ का कहना है कि हिमालय में परमाफ्रॉस्ट तथा भीषण तूफानों के कारण बड़े पर्वतीय भूस्खलन सामान्य बन गए हैं। पर्यावरणविदों की ओर से चेतावनी संकेत स्पष्ट तथा तीखे हैं। जितनी जल्दी हम इन चेतावनियों पर कार्य करेंगे उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा। 

पर्यावरण की कीमत पर विकास नहीं हो सकता

नि:संदेह धौली गंगा, ऋषि गंगा तथा अलकनंदा नदियों में 7 फरवरी को आई बाढ़ ने काफी डर पैदा कर दिया है। यहां तक कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जी.एस.आई.) ने भी उत्तराखंड में 486 ग्लेशियल झीलों में से 13 को  अति संवेदनशील पाया है। किसी एक ग्लेशियल झील के टूटने से चमोली जैसी बाढ़ पैदा हो सकती है।

जून 2019 में जनरल साइंस एडवांस में प्रकाशित एक अध्ययन में इस चेतावनी को महत्व दिया गया है कि हिमालयी ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के कारण इस शताब्दी की शुरूआत से दोगुनी तेजी से पिघल रहे हैं। भारत, चीन, नेपाल तथा भूटान में उपग्रह सर्वेक्षणों के माध्यम से 40 वर्षों तक किए गए अध्ययन से संकेत मिलते हैं कि जलवायु परिवर्तन हिमालय के ग्लेशियरों को खा रहा है।  

दरअसल हमें गंगा तथा इसकी सहायक नदियों पर नई विद्युत परियोजनाएं नहीं बनानी चाहिएं। यह पूर्व जलस्रोत मंत्री उमा भारती की प्रशंसा में अवश्य कहा जाना चाहिए कि उन्होंने एक बार ऐसी परियोजनाओं के खिलाफ स्पष्ट तौर पर अपनी आवाज बुलंद की थी। मेरा मजबूती से मानना है कि केंद्रीय तथा राज्य अधिकारियों को ऐसे चेतावनी संकेतों को गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए। जरूरत है पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील पर्वतों में विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगाने के लिए तुरन्त कार्रवाई  की। अब गेंद मोदी सरकार के पाले में है। 

- हरि जयसिंह

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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