Friday, May 20, 2022
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west bengal moves towards a tension musrnt

और तनातनी की ओर बढ़ता पश्चिम बंगाल

  • Updated on 5/29/2021

कभी- कभी राष्ट्रीय मीडिया में राज्यों की बड़ी खबरें छिप जाती हैं और जब वे अपने बड़े रूप में सामने आती हैं तो फिर लगता है कि कितना कुछ महत्वपूर्ण छूट गया है। लगातार तीन बार से सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत बनाती ममता बनर्जी का नया कदम कुछ ऐसा ही है। पश्चिम बंगाल सरकार की कैबिनेट ने हाल ही में पश्चिम बंगाल में फिर से विधान परिषद के गठन के लिए प्रस्ताव पारित कर दिया है। यूं तो कहा जा सकता है कि ममता ने अपने घोषणा पत्र में यह वायदा किया था और उन्होंने वायदा निभाने में पहल की है। लेकिन यह सब उतना आसान नहीं है जितना सामने से दिखता है।

तय है कि ममता के पास दो-तिहाई से ज्यादा का बहुमत है और वह विधानसभा से यह प्रस्ताव आसानी से पारित भी करा लेंगी। विधान परिषद बनने का सबसे बड़ा फायदा भी उन्हीं को होगा। लेकिन यह सवाल भी बहुत वाजिब है कि क्या 36 का आंकड़ा रखने वाली ममता  के प्रस्ताव को केंद्र कितनी तवज्जो देगा। या यह प्रस्ताव सिर्फ एक खानापूॢत बन कर रह जाएगा। या इस प्रस्ताव के बहाने ममता राष्ट्रीय स्तर पर विरोध की राजनीति और तेज करेंगी और कहेंगी कि केंद्र राज्य की जनता की भावनाओं की अनदेखी कर रहा है।

ऐसा नहीं है कि ममता के पश्चिम बंगाल में पहले विधान परिषद नहीं  थी और अगर अब नहीं है तो फिर से उसके गठन की जरूरत क्या आन पड़ी है। लगभग 50 साल पहले कई राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी विधान परिषद थी। उस समय वामपंथियों के नेतृत्व में संयुक्त मिली -जुली सरकार हुआ करती थी।

वह एक दौर था जब विभिन्न राज्यों की सरकारों ने खर्चों की कटौती के नाम पर विधान परिषदों  को भंग कर दिया था। उसका एक और लाभ था कि राज्यों को कानून बनाने में आसानी होती थी और विधान परिषद के पास नहीं जाना पड़ता था। खासतौर से संविद सरकारों के लिए यह राजनीतिक रूप में बड़े लाभ वाला कदम माना गया। 

लेकिन ममता के पास ऐसी मजबूरी तो है नहीं। दो-तिहाई बहुमत की सरकार है जो चाहे कर सकने में पूरी तरह से समर्थ। यह भी देखा गया है कि निचले सदन (लोकसभा या विधान सभा)  में अगर पर्याप्त बहुमत है तो राज्य सभा या विधान परिषद कोई खास अड़ंगा नहीं लगा पाता है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के पास दो तिहाई बहुमत नहीं भी है लेकिन तब भी राज्य सभा से अब (पहले था) कोई बहुत संकट सामने नहीं दिखता। वह भी तब जब राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी के पास सात साल की सत्ता के बाद भी बहुमत नहीं है लेकिन लाइक माइंडेड नेताओं के कारण यह बाधा भी नहीं आई।

वैसे राज्यों में दो विधान सदनों का अपना इतिहास है। यह भी एक इत्तेफाक है कि देश में यह सिलसिला अंग्रेजों के शासन काल में ही एक सुधार के तहत पश्चिम बंगाल से ही 1937 से शुरू हुआ था। विधान परिषद के गठन के पीछे भी वही मंशा थी कि निचले सदन से जल्दबाजी में लोकप्रियता के चक्कर में कोई कानून पास न हो और उस पर ठीक से विचार-विमर्श हो सके। 

यही नीयत राज्यसभा के गठन के लिए भी थी। परन्तु इसके बावजूद आजाद भारत में हर राज्य इससे सहमत नजर नहीं आया। ज्यादातर राज्यों ने इसे राजकीय कोष पर बोझ ही माना। 1969 में पश्चिम बंगाल में खिचड़ी सरकार ने बीते 8 महीने की अन्य सरकार और विधान परिषद की अड़ंगेबाजी से सबक सीखा और नई सरकार ने आते ही विधान परिषद भंग दी।
धीरे-धीरे कई राज्यों, जिसमें पंजाब भी शामिल है, विधान परिषदें भंग कर दी गईं। भारत में  इस समय देश में मात्र छह राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश , महाराष्ट्र , तेलंगाना , आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के पास अपनी विधान परिषदें हैं।

दरअसल विधान परिषदों का गठन या विघटन संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत होता है। इसके अंतर्गत विधान सभा को इसका प्रस्ताव पारित करने का हक है। यह दो तिहाई से होना चाहिए। इसके बाद इस प्रस्ताव को संसद (लोकसभा और राज्यसभा) से पारित होना होता है। राज्यसभा की तरह ही विधान परिषद के सदस्यों का कार्यकाल भी छह साल का होता है। 
ममता दीदी ने तो अपना काम कर दिया पर अब तय है कि केंद्र इतनी आसानी से तो मानेगा नहीं। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा (एन.डी.ए.) की सरकार यह मानेगी नहीं क्योंकि उसे पता है कि इससे ममता की ताकत बढ़ेगी। वह यह क्यों चाहेगी कि उसका सिरदर्द बढ़ाने के लिए सौ और विधायक आ जाएं।

हाल का जो वातावरण है, उससे साफ लगता है कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक तनाव औऱ बढ़ेगा। पांच साल पुराने मामले में  दो मंत्रियों समेत कई टी.एम.सी. नेताओं की गिरफ्तारी और फिर मुख्यमंत्री ममता का सी.बी.आई. दफ्तर जाकर प्रदर्शन करना इस तनाव को औऱ बढ़ाता ही है। उधर राज्यपाल जगदीप धनखड़ की सक्रियता ममता दीदी को भा नहीं रही है।
धनखड़ राज्य की कानून व्यवस्था को बर्बादी के कगार पर बता रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने राज्य के सभी भाजपा विधायकों की सुरक्षा केंद्रीय सुरक्षा बलों के हवाले कर दी है। विपक्ष के नेता शुभेन्दु अधिकारी ही नहीं, उनके पिता और भाई को भी यह सुरक्षा दी गई है। 

विभिन्न पार्टियों के आई.टी. सैल प्रदेश में कुछ और खौफ फैलाने में भी लगे हैं। एक यह भी खबर फैलाई जा रही है कि केंद्र हालात को देखते हुए राज्य के तीन टुकड़े कर सकता है लेकिन फिलहाल उसका कोई सिर -पैर नजर नहीं आ रहा है।
ऐसी किसी कोशिश को बंग अस्मिता के खिलाफ माना जाएगा। साफ है कि पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार में तनातनी बढ़ेगी। 
अकु श्रीवास्तव

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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