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लॉकडाउन की सफलता का ‘पैमाना’ क्या है

  • Updated on 6/10/2020

कोरोना महामारी के इस मौसम में मैं दो सच्चाई आपके सामने रख रही हूं। पहली कल कभी नहीं आता और दूसरा जैसा कि अर्थशास्त्री जान किंग्स ने कहा था : दीर्घावधि में हम सभी मर जाएंगे। आज लगता है भारत अंधेरे में है क्योंकि यहां पर कोरोना महामारी के बाद लॉकडाऊन को खोलने से स्थिति बद से बदतर होती जा रही है जिससे प्रश्न उठता है कि क्या हम कोरोना महामारी से मुकाबले में हार की ओर बढ़ रहे हैं।

अनेक खबरें आ रही हैं कि लोग अस्पतालों में बिस्तर न मिलने के कारण मर रहे हैं। एक ही बिस्तर पर तीन मरीज रखे जा रहे हैं, अस्पताल के गलियारों में भीड़भाड़ है जिससे संक्रमण बढऩे का खतरा पैदा हो रहा है। शव बिस्तरों पर ही पड़े हुए हैं। इस बीच यह भी खबर मिली है कि एक 80 वर्षीय व्यक्ति अस्पताल में भर्ती होने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा था। उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजा गया और अंत में वह अपनी कार में अस्पताल में बिस्तर की प्रतीक्षा करते हुए ही मर गया।

यही नहीं डाक्टरों और नर्सों को खराब पी.पी.ई. किट पहनने के लिए बाध्य किया जा रहा है जिनसे वे संक्रमित होकर मर सकते हैं। मास्क, दस्ताने और चिकित्सा उपकरणों की कमी है। आक्सीजन मशीनों सहित 70 प्रतिशत मशीनें खराब हैं। ग्लोबल एंटी बायोटिक रेसिस्टैंस पार्टनरशिप-इंडिया वर्किंग गुु्रप के अनुसार अस्पताल के वार्डों और आई.सी.यू. में संक्रमण दर विश्व औसत से 5 गुना अधिक है। लॉकडाऊन को अढ़ाई महीने से अधिक हो गया है और लगता है इस बीच कुछ नहीं बदला है। कोरोना मामले बढ़ते जा रहे हैं और अब इनकी संख्या प्रतिदिन 10 हजार से ऊपर पहुंच गई है और लगता है कि हमारे पास इससे निपटने की कोई रणनीति नहीं है।

प्रश्न यह भी उठता है कि लॉकडाऊन का उद्देश्य क्या था। क्या यह सफल रहा? इसकी सफलता का पैमाना क्या है? इससे कोरोना के प्रसार पर अंकुश लगा और हमें स्वास्थ्य सुविधाआें में सुधार के लिए समय मिला, साथ ही लोगों को इस महामारी के खतरे के बारे में जागरूक करने का भी समय मिला। किंतु लॉकडाऊन के खुलते ही यह स्पष्ट हो गया है कि हम इस महामारी के संक्रमण को रोकने में सफल नहीं हुए जबकि हमारे यहां कम परीक्षण किए जा रहे हैं और आंकड़ों में भी हेरा-फेरी की जा रही है। भारत में सबसे कम प्रति 10 लाख पर 2198 परीक्षण किए जा रहे हैं।

वस्तुत: आज देश विश्व के पहले 10 संक्रमित देशों की सूची में है और शीघ्र ही यह शीर्ष पांच देशों की श्रेणी में आ जाएगा। इस महामारी के कारण अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ा है। सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट आई है। प्रवासी श्रमिकों, दिहाड़ी मजदूरोंं, व्यवसायियों, पुलिस-स्वास्थ्य कर्मियों, वेतन भोगी लोग और गृहिणी सभी इससे प्रभावित हुए हैं। सैंटर फोर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनोमी के आंकलन के अनुसार बेरोजगारी दर बढ़कर 36 प्रतिशत हो गई है और 36 करोड़ लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।

देश में 6 लाख डाक्टरों और 20 लाख नर्सों की कमी है। शहरों में जो अपने को डॉक्टर कहते हैं उनमें से केवल 58 प्रतिशत के पास और ग्रामीण क्षेत्रों में 19 प्रतिशत के पास मैडीकल डिग्री है। जिला अस्पतालों में नर्सों और डाक्टरों के पास इस संकट से निपटने के लिए क्षमता नहीं है। अस्पतालों में कोरोना रोगियों की भीड़ लगी हुई है। क्वारंटाइन केन्द्रों से रोगी भाग रहे हैं क्योंकि इनकी स्थिति दयनीय है। उनमें शौचालय और पानी की कमी है और बाबू कहते हैं कि ‘‘तो क्या करें।’’
विश्व स्वास्थ्य संगठन बार-बार कह रहा है कि इस संकट का समाधान केवल परीक्षण है। सरकार को इस सलाह को मानते हुए युद्ध स्तर पर परीक्षण कराना चाहिए। 130 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले देश में प्रतिदिन कम से कम 1 लाख से अधिक परीक्षण होने चाहिए थे, किन्तु परीक्षण के अभाव में लगता है यह महामारी बढ़ती ही जा रही है। भारत चीन की तरह 10 दिन में अस्पताल का निर्माण भी नहीं कर सकता है किंतु वह अस्पतालों को लालफीताशाही से मुक्त कर सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यय बढ़ा सकता है और सुविधाआें में सुधार कर सकता है।

लॉकडाऊन समाप्त करने से इस महामारी पर अंकुश नहीं लगेगा। विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समय पर यह महामारी बढ़ेगी। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में प्रति 100 परीक्षणों पर संक्रमण की दर राष्ट्रीय औसत से तीन गुना अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस महामारी पर अंकुश के लिए बहुस्तरीय छोटी-छोटी रणनीतियां बनाई जाएं। कुछ लोगों का यह भी मत है कि आयु के अनुसार कुछ काम करने की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि यदि युवा लोग इससे संक्रमित होंगे तो उनमें प्रतिरोधक क्षमता पैदा होगी। इसके लिए हमें स्कूल और कालेजों को खोलना होगा और इससे हम कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या में कमी कर सकेंगे।

सरकार को प्लान-बी, प्लान-सी बनाने होंगे। साथ ही सरकारी स्वास्थ्य अवसंरचना को इस तरह तैयार करना होगा कि वह 130 करोड़ लोगों की आवश्यकताओं को पूरा कर सके ताकि कोरोना पर नियंत्रण लग सके अन्यथा हम उस लाभ को खो देंगे जो हमने अब तक प्राप्त किया है।

- पूनम आई. कौशिश

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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