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‘क्या पाकिस्तान कश्मीर चाहता है या नहीं’

  • Updated on 11/7/2020

स्पष्ट रूप से करने वाला पहला काम उड़ी एवं भारतीयों के बीच बंदिश लगाने के लिए किसी पुल को तबाह करना था इसके लिए कुछ धमाकापूर्ण सामग्री और कुछ लोगों की जरूरत थी। जिस दौरान इन चीजों को जमा किया जा रहा था मैंने उनके आदमियों को आगे लाने के लिए स्वात आदमी के राशद को एक संदेश भेजा ताकि अगली सवेरे वो बचाव की पोजीशन ले सके और फिर कबायली नेताओं से मैं मिल लूंगा। स्वातियों को किसी फौजी दस्ते के खिलाफ लड़ने का तजुर्बा पहली बार हुआ था और इसी कारण से उनसे ऐसा करने की आशा नहीं की जा सकती है जैसा करने की मसौदियों और अफरीदियों से की जा सकती है। परन्तु मेरे विचार में बचाव करने में वह काफी बढ़िया काम करेंगे। 

पाकिस्तान (Pakistan) के पूर्व मेजर जनरल अकबर खान आगे लिखते हैं कि कुछ समय बाद हम चलने को तैयार थे। वहां तबाही वाला कोई सामान, बारूद अथवा इस प्रकार की धमाकापूर्ण वस्तुएं नहीं थीं लेकिन कुछ पैट्रोल और कुछ कुदाल (कस्सी) पाई गई थीं, दर्जन के करीब रजाकार आए थे। खुशकिस्मती से उनमें सुरंग बनाने वाला एक पैंशन प्राप्त नायक था। एक लारी लेकर हम एक साथ बारामूला के लिए निकले। सारी निगाहें आगे कुछ फासले पर मौजूद सड़क पर टिकी हुई थीं ताकि हम अनजाने में दुश्मन की किसी चौकी पर न चले जाएं। तभी दुश्मन की ओर से एक गाड़ी दौड़ती हुई आई। यह भारतीय सेना का एक ट्रक था जिसे एक मसूद कबायली चला रहा था जो पीछे अकेला रह गया था। वह घात में था और खंजर से ड्राइवर को खामोश करने के बाद एक ट्रक छीन लाया। उसके अनुसार दुश्मन कोई गतिविधि नहीं कर रहे थे। इसका मतलब यह हुआ कि हमारे पास पुल को तबाह करने के लिए खासा वक्त है।’’ 

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‘‘बारामूला से कुछ फासले पर उपयुक्त पुल की तलाश में आदमी उस पर काम करने के लिए तैयार थे।  नाला यहां काफी गहरा नहीं था और इसका किनारा ढलवान वाला नहीं था। कुछ लोग इस जगह रह गए जो दुश्मन पर घात लगाए बैठे थे कि वे कब आएं, मुझे आशा थी कि उनके पास हमारे लिए कुछ घंटे होंगे। वापसी पर मैंने बचाव की पोजीशन के लिए एक अच्छी जगह को चुना। मेरा ख्याल था इसे स्वाती पसंद करेंगे। यहां मुझे अनुभव हुआ कि वो भारतीयों को कुछ दिनों के लिए रोके रखेंगे।’’ संदेश टैलीफोन द्वारा गया क्योंकि सड़क से लगकर पुरानी टैलीफोन लाइन अब भी मौजूद थी, फासला 40 किलोमीटर का था। मुझे आशा थी कि राशद किसी भी क्षण यहां पहुंच जाएंगेे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, राशद नहीं आए।’’ 

‘‘वापस उड़ी में अब कबायलियों और उनके नेताओं से मुलाकात का वक्त था। कर्नल ए.एस.बी. शाह, सैक्रेटरी फ्रंटियर्स, रीजन जिन्होंने मुझे जान-पहचान कराने का वचन दिया था, अब तक नहीं पहुंचा। इसलिए उसके साथ या उसके बगैर उन्हें सामना करना पड़ा। पठान होने के कारण मुझे कोई खास मुश्किल आने की आशा नहीं थी। मैं उनके लडऩे के ढंग से भी वाकिफ था क्योंकि दस साल पहले ब्रिटिश-भारतीय सेना में एक अधिकारी के रूप में कबायली इलाके में दो साल तक उनके विरुद्ध लड़ाई में व्यस्त रहा था लेकिन यहां उनमें से किसी को नहीं जानता था और वे लोग मुझे भी नहीं जानते थे वो बिल्कुल अजनबी लग रहे थे जिनसे मुझे मिलना था और जल्द ही उन्होंने प्रश्नों की बौछार कर दी।’’

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‘‘मैं कौन था? मैंने उन्हें अपने बारे में बताया। क्या पाकिस्तान की सरकार ने मुझे भेजा है?-नहीं। क्या कोई फौज मदद के लिए आ रही है? -नहीं। क्या मैं कोई हथियार या गोला-बारूद लेकर आया?-नहीं। क्या पाकिस्तान कश्मीर चाहता है या नहीं? -हां।’’ ‘‘तब उसने तोप और हवाई जहाका मोर्चे पर क्यों नहीं भेजे जैसा कि भारत ने भेजे थे और फौज वहां क्यों नहीं थी? जबकि इस काम के लिए पैसे भी अदा किए जा रहे थे।’’ 

‘मैंने कानूनी पोजीशन स्पष्ट करने की कोशिश की लेकिन यह इच्छा पूरी न हुई। मैंने उनसे इस संबंध में बात की कि कश्मीर का मसला मुसलमान और पाकिस्तानी होने के नाते हमारे लिए क्या अर्थ रखता है। फिर मैंने उन्हें बताया कि हम पठान क्या करने आए थे, मैं अपनी बातचीत से बड़ा खुश था। कुछ कबायली मेरी बात सुनकर सहमति में सिर हिला रहे थे।’’

- ओम प्रकाश खेमकरणी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

 

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