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कोरोना : 'मांसाहार' से क्यों न बचें

  • Updated on 5/11/2020

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) के भोजन-सुरक्षा विशेषज्ञ पीटर एंवारेक ने कहा है कि मांसाहार से कोरोना के फैलने का खतरा जरूर है लेकिन हम लोगों को यह कैसे कहें कि आप मांस, मछली, अंडे मत खाइए? चीन के वुहान शहर में कोरोना विषाणु को फैलाने में इन मांसाहारी वस्तुओं की भूमिका पर सभी इशारा कर रहे हैं लेकिन दुनिया के करोड़ों लोगों का खाना और रोजगार मांसाहार के दम पर ही चल रहा है।

एंवारेक का यह तर्क दक्षिण एशिया के देशों के साथ-साथ सारे संसार के संपन्न देशों पर लागू होता है, खास तौर से यूरोप और अमरीका के देशों पर, क्योंकि इन देशों की बहुत कम जनता आजकल खेती पर निर्भर रहती है। वहां खेती का काफी हद तक यंत्रीकरण हो गया है लेकिन भारत-जैसे दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी देशों में अभी भी करोड़ों लोग खेती और बागवानी पर निर्भर हैं।

यदि संपन्न देशों के लोग मांसाहार बंद कर दें तो वहां तुरंत आॢथक संकट खड़ा हो सकता है। तात्कालिक दृष्टि से तो यही होगा लेकिन यदि हम थोड़ा गहरे में उतरें और अर्थशास्त्र के छात्र की तरह थोड़ी जोड़-तोड़ करें और थोड़ा गुणा-भाग करें तो उसके नतीजे एकदम चमत्कारी होंगे। इस मामले में हम क्या करेंगे?

हमसे कहीं ज्यादा खोज-पड़ताल अमरीकी और ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने कर रखी है। उनका कहना है कि यदि दुनिया के लोग मांसाहार बंद कर दें तो सारी दुनिया हर साल 20 से 30 ट्रिलियन डॉलर (20 लाख से 30 लाख करोड़ रुपए) बचा सकती है। उनके अनुसार एक किलो मांस पैदा करने में जितना खर्च होता है, उतने पैसे में 10 किलो अनाज पैदा होता है। एक किलो गेहूं के लिए 1500 लीटर पानी लगता है और उतने ही गौमांस के लिए दस गुना ज्यादा याने 15000 लीटर पानी खर्च होता है। अमरीका में मांसाहार के कारण लगभग 3 लाख 20 हजार लोगों की मौत हर साल होती है।

मोटापा, मधुमेह, हृदयरोग आदि बीमारियों को मांसाहार से बढ़ावा मिलता है। मांस के कारण गंदी गैस और बदबू भी बड़ा नुक्सान करती है। यदि अमरीकी लोग सिर्फ गोमांस खाना बंद कर दें तो अमरीका की 42 प्रतिशत जमीन खेती के लिए बच सकती है। पेड़-पौधों से फसलें तो कई बार ली जाती हैं लेकिन पशुओं का मांस तो सिर्फ एक बार ही हाथ लगता है, जबकि उन्हें महीनों-वर्षों खिलाते रहना पड़ता है।

शाकाहार मनुष्य का स्वाभाविक भोजन है, यह उसके दांत और आंत से पता चलता है। दुनिया के किसी भी धर्मशास्त्र- वेद, जिंदावस्ता, त्रिपिटक, बाइबल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब आदि में कहीं भी नहीं लिखा है कि मांस खाए बिना मुक्ति नहीं मिलेगी और मांसाहार यदि हमें कोरोना के कराल गाल में ठूंसता है तो हम इससे क्यों न बचें?

- डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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