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एस. जय शंकर के तीन बोझ

  • Updated on 9/14/2020

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर (Subrahmanyam Jaishankar) का संबंध विद्वानों के परिवार से है। उनके पिता के. सुब्रमण्यम दिल्ली में प्रसिद्ध थिंक टैंक आई.डी.एस.ए. के संस्थापक थे तथा उन्होंने भारत की दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) को भी परामर्श दिया था। भारत के परमाणु कार्यक्रम के हथियारीकरण तथा बंगलादेश में सैन्य हस्तक्षेप में सुब्रमण्यम का ही हाथ था। 

सुब्रमण्यम के बेटे तथा एस. जयशंकर के भाई विश्व के मध्यकालीन भारत के सबसे प्रसिद्ध विद्वानों में से एक हैं। उन्होंने सूरत (मेरे गृह नगर) में वाणिज्य पर किताबें लिखीं तथा इसके अलावा उन्होंने दक्षिण भारत के साथ-साथ वास्को डी गामा पर भी किताबें लिखीं। 

मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि डाक्टर एस. जयशंकर (वह पी.एच.डी. भी हैं) की पृष्ठभूमि हमारे अन्य मंत्रियों के जैसी नहीं। जयशंकर ने कुछ दिन पूर्व एक किताब जारी की जिसमें उन 3 बातों का उल्लेख किया जिन्होंने नकारात्मक तौर पर भारतीय विदेश नीति को प्रभावित किया। 

यू.पी. में कानून ‘सत्ता’ का, ‘सत्ता’ के लिए और ‘सत्ता’ द्वारा

पहली बात भारत के विभाजन की  है जिसने देश के आकार को कम कर दिया तथा चीन को ज्यादा महत्ता दे दी। दूसरा 1991 के आॢथक सुधारों में देरी के बारे में है, जो शायद पहले हो जाने चाहिएं थे। इसके चलते भारत और सम्पदा वाला एक राष्ट्र बन जाता है जिसके लिए अभी भारत को इंतजार करना पड़ेगा। तीसरी बात एटमी हथियारों को बनाने में देरी के बारे में है। जयशंकर ने इन तीन बातों को बोझ बताया। जैसा जयशंकर कह रहे हैं कि उस पर हमने कार्य क्यों नहीं किया? इसके लिए हमें 2 अलग चीजों की जांच करनी होगी। पहला यह कि हमें उस गहराई तक जाना होगा जिसके बारे में जयशंकर का कहना है कि यह सत्य है।  

भारत के विभाजन ने नि:संदेह देश के आकार को कम कर दिया था। यदि भारत का विभाजन न हुआ होता, तब भौगोलिक तौर पर पूरा राष्ट्र बहुत बड़ा होता जो बर्मा से ईरान तक फैला होता और इसकी जनसंख्या 1.7 बिलियन लोगों की होती। 
विशेष तौर पर अर्थव्यवस्था, प्रति व्यक्ति आय तथा उत्पादकता के मामले में यह अलग राष्ट्र न होता। दक्षिण एशिया सामूहिक तौर पर विकसित होता। ब्रिटिश इंडिया के हिस्से के तौर पर 3 देशों में से कोई भी एक विकसित देश नहीं बना और न ही दूसरी ओर कम से कम विकास कर पाया है। पाकिस्तान तथा बंगलादेश की यात्रा ने खुलासा किया है कि वे भारत के ज्यादातर हिस्सों से अलग नहीं हैं। 

दूसरा मुद्दा आॢथक सुधारों में देरी होने का है। यह जयशंकर का विषय नहीं क्योंकि वह कोई अर्थशास्त्री नहीं हैं इसलिए हमें सचेत रहना होगा जब हम यह स्वीकार कर लें कि जो वह कह रहे हैं वह सत्य ही कह रहे हैं।  

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पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय की भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ क्षमता थी। तत्व के तौर पर सरकारी पूंजी की आवश्यकता थी, विशेषकर भारी उद्योग के मामले में। बिना सरकार के ऐसे संस्थान जैसे उच्च शिक्षा में प्रगति न होती। निजीकरण के बारे में हम जैसे मर्जी भजन गुनगुना लें मगर एक बात तय है कि भारत में यहां तक कि आज तक आई.आई.टी. और आई.आई.एम. की बराबरी वाला कोई भी प्राइवेट संस्थान नहीं है।  

इसको कहने का मतलब यह नहीं कि इंदिरा गांधी का लाइसैंस राज एक अच्छी बात थी, ऐसा नहीं था। जयशंकर का बयान जोकि सुधारों में देरी के बारे में है वह योग्यता भरा है मगर उस पर हम पूरी मोहर नहीं लगा सकते।

तीसरी बात जो जयशंकर ने अपनी किताब में लिखी है वह परमाणु विकल्प की प्रक्रिया के बारे में है जो 1974 में घटी। एटम बम को पाने में भारत ने एक बड़ी डील की। यह कोई बड़ी डील न थी। दक्षिण अमरीका, यूरोप, एशिया तथा अफ्रीका के कई राष्ट्रों के पास एटम बम बनाने की क्षमता है मगर वह ऐसी बात का चुनाव नहीं करते। दूसरी बात यह है कि बम बनाने में भारत ने अपनी विदेशी प्रतिबद्धताओं की उल्लंघना की। बमों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को उत्पन्न करने वाले रिएक्टर कनाडा से आते हैं जिससे हमने यह वायदा किया है कि हम केवल शांति प्रिय मकसद के लिए परमाणु तकनीक का इस्तेमाल करेंगे (यही कारण है कि इंदिरा गांधी ने दावा किया कि 1974  एक शांतिमय धमाका था।)

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हमारे पास ऐसे हथियार 45 वर्षों से हैं। आखिर इन्होंने हमारी किस तरह मदद की? हम इसका इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ नहीं कर सकते जिसके बारे में हमने 30 वर्षों से उस पर आतंक फैलाने का आरोप लगाया है। न ही हम इनका इस्तेमाल चीन के खिलाफ कर सकते हैं जोकि आज हमारी सीमाओं के भीतर आ चुका है। यह एक बहस का विषय है कि  हमारे कार्यक्रम के तहत पहले से ही  हत्यारीकरण कर लेना हमारे लिए किसी प्रकार की कोई मदद नहीं कर सका। 
जयशंकर इन तीन बातों को बोझ बताते हैं तथा इनको कांग्रेस के दरवाजे के समक्ष रख देते हैं। आइए हम सब देखें कि उनकी पार्टी ने क्या किया है और क्या कर रही है। भारत का विभाजन हुआ है मगर यह पाकिस्तान और बंगलादेश हैं जो हमारे बाद खड़े हैं। उन्होंने कोई अफ्रीका में अपना स्थान नहीं बदल लिया है। ट्रेड तथा ट्रैवल के माध्यम से उपमहाद्वीप के एकीकरण करने से भारत को कौन रोक सकता है? यह हमारा राष्ट्रवाद है। हम बिना वीजा लिए नेपाल में  स्वतंत्र रूप से गतिविधि कर सकते हैं मगर बंगलादेश के साथ ऐसा संभव नहीं। आखिर क्यों? हम फ्री वीजा ट्रैवल तथा ट्रेड के दक्षिण एशिया का एकीकरण कर सकते हैं, यदि हम यह विकल्प चुन लें। भाजपा ऐसा नहीं चाहती।

भाजपा के नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि जनवरी 2018 से ढलान पर है। यह भाजपा के अपने आंकड़े हैं। सरकार के 6 वर्षों के कार्यकाल में यह ढलान के कुल अढ़ाई साल हैं। ऐसा समाजवाद तथा लाइसैंस राज के दौरान नहीं हुआ। 
इस वर्ष हम अर्थव्यवस्था का संकुचन देखेंगे। उदारीकरण करना ही मात्र आॢथक वृद्धि नहीं है। अपनी तीन बातों में जिसका जिक्र जयशंकर करते हैं वह आसान और साधारण है।  पूर्व की बातें ज्यादा महत्व नहीं रखतीं।  यदि जयशंकर का मूल्यांकन सही है तो आज इसे ठीक करने में उनको कौन रोकता है? उनकी किताब इसके बारे में नहीं कहती। शायद यह बातें उनकी अगली किताब में पढऩे को मिल जाएं।

- आकार पटेल

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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