Wednesday, Aug 10, 2022
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 दिल्ली हाई कोर्ट ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने के मामले पर सुनाया खंडित फैसला 

  • Updated on 5/11/2022

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। दिल्ली उच्च न्यायालय ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने के मामले में याचिकाओं पर सुनवाई करते हुये बुधवार को खंडित निर्णय सुनाया। इन याचिकाओं में कानून के उस अपवाद को चुनौती दी गई थी जिसके तहत पत्नियों के साथ बिना सहमति के शारीरिक संबंध बनाने के लिए मुकदमे से पतियों को छूट है। अदालत के एक न्यायाधीश ने इस प्रावधान को समाप्त करने का समर्थन किया, जबकि दूसरे न्यायाधीश ने कहा कि यह असंवैधानिक नहीं है। खंडपीठ ने पक्षकारों को उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करने की छूट दी। 

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खंडपीठ की अगुवाई कर रहे न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने वैवाहिक बलात्कार के अपवाद को समाप्त करने का समर्थन किया और कहा कि भारतीय दंड संहिता लागू होने के ‘‘162 साल बाद भी एक विवाहित महिला की न्याय की मांग नहीं सुनी जाती है तो दुखद है’’, जबकि न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत प्रदत्त ‘‘यह अपवाद असंवैधानिक नहीं हैं और संबंधित अंतर सरलता से समझ में आने वाला है।’’ याचिकाकर्ताओं ने आईपीसी की धारा 375 (बलात्कार) के तहत वैवाहिक बलात्कार के अपवाद की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी थी कि यह अपवाद उन विवाहित महिलाओं के साथ भेदभाव करता है, जिनका उनके पतियों द्वारा यौन उत्पीडऩ किया जाता है। 

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 इस अपवाद के अनुसार, यदि पत्नी नाबालिग नहीं है, तो उसके पति का उसके साथ यौन संबंध बनाना या यौन कृत्य करना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता है ।      पीठ ने इस मामले में 393 पन्नों का खंडित फैसला सुनाया। इनमें से 192 पन्ने न्यायमूर्ति शकधर ने लिखे हैं। न्यायमूर्ति शकधर ने निर्णय सुनाते हुए कहा, ‘‘जहां तक मेरी बात है, तो विवादित प्रावधान--धारा 375 का अपवाद दो-- संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), 15 (धर्म, नस्ल, जाति, ङ्क्षलग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध), 19 (1) (ए) (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन हैं और इसलिए इन्हें समाप्त किया जाता है।’’ 

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न्यायमूर्ति शकधर ने कहा कि उनकी घोषणा निर्णय सुनाए जाने की तारीख से प्रभावी होगी।  बहरहाल, न्यायमूर्ति शंकर ने कहा, ‘‘मैं अपने विद्वान भाई से सहमत नहीं हो पा रहा हूं।’’ उन्होंने कहा कि ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) (ए) और 21 का उल्लंघन नहीं करते। उन्होंने कहा कि अदालतें लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित विधायिका के ²ष्टिकोण के स्थान पर अपने व्यक्तिपरक निर्णय को प्रतिस्थापित नहीं कर सकतीं और यह अपवाद आसानी से समझ में आने वाले संबंधित अंतर पर आधारित है।  उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा इन प्रावधानों को दी गई चुनौती को बरकरार नहीं रखा जा सकता।  कुछ महिला कार्यकर्ताओं ने इस फैसले को ‘‘निराशाजनक’’ बताते हुए उम्मीद जतायी कि उच्चतम न्यायालय इस मामले में ‘‘अधिक समझदारी’’ दिखाएगा। 

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दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने कहा कि वैवाहिक बलात्कार एक वास्तविकता है और इसके खिलाफ कार्रवाई का समय आ गया है। उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘पता नहीं अभी कितने साल तक हमें ब्रिटिश राज के कानून को बदलने के लिए इंतजार करना होगा। वैवाहिक बलात्कार एक वास्तविकता है और अब उचित समय है कि हम इसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें।’’ ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमंस एसोसिएशन की सदस्य कविता कृष्णन ने कहा, 'उच्च न्यायालय का फैसला निराशाजनक और परेशान करने वाला है। कानूनी मुद्दा काफी स्पष्ट है और यह बलात्कार पीड़ितों की एक श्रेणी - पत्नियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण है। मुझे उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय इस शर्मनाक कानून को हटाने के लिए जरूरी साहस और स्पष्टता दिखाएगा।’’ उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ने यह मामला उच्चतम न्यायालय के पाले में डाल दिया है। 

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अदालत का फैसला गैर सरकारी संगठनों आरआईटी फाउंडेशन, ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन्स एसोसिएशन, एक पुरुष और एक महिला द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर आया, जिसमें बलात्कार कानून के तहत पतियों को अपवाद माने जाने को खत्म करने का अनुरोध किया गया। केंद्र ने 2017 के अपने हलफनामे में दलीलों का विरोध करते हुए कहा था कि वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है क्योंकि यह एक ऐसी घटना बन सकती है जो विवाह की संस्था को अस्थिर कर सकती है और पतियों को परेशान करने का एक आसान साधन बन सकती है।      हालांकि, केंद्र ने जनवरी में अदालत से कहा कि वह याचिकाओं पर अपने पहले के रुख पर ‘‘फिर से विचार’’ कर रहा है क्योंकि उसे कई साल पहले दायर हलफनामे में रिकॉर्ड में लाया गया था। केंद्र ने इस मामले में अपना रुख स्पष्ट करने के लिए अदालत से फरवरी में और समय देने का आग्रह किया था, जिसे पीठ ने इस आधार पर खारिज कर दिया था कि मौजूदा मामले को अंतहीन रूप से स्थगित करना संभव नहीं है।      

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