Wednesday, Oct 27, 2021
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पूर्वी दिल्ली दंगेः अखिर क्यों कठघरे में खड़ी है दिल्ली पुलिस, पढ़िए पूरी रिपोर्ट

  • Updated on 9/13/2021

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। दिल्ली दंगों के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की मौत के प्ररकण में जमानत देते समय और एक केस में 5 एफआईआर पर एडिशनल सेशन जज (एएसजे) विनोद यादव ने टिप्प्णी कि मैं खुद को यह देखने से रोक नहीं पा रहा हूं कि जब इतिहास दिल्ली में विभाजन के बाद के सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगों को पलटकर देखेगा, तो नवीनतम वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके उचित जांच करने में जांच एजेंसी (दिल्ली पुलिस)की विफलता निश्चित रूप से लोकतंत्र के प्रहरी को पीड़ा देगी। 

इस टिप्पणी ने सरकार सहित दिल्ली पुलिस को सोचने पर मजबूर कर दिया है,आखिर दंगों की जांच में वो क्या कमियां रह गई, आखिर दिल्ली पुलिस कहां चूक गई और आखिरकार वो बड़े कारण क्या है, जिनके चलते लगातार हर केस में उन्हें मात ही मिल रही है। इसी संबंध में गृह मंत्रालय के नेतृत्व में एक बैठक की गई, जिसमेंं दिल्ली दंगों की गठित एसआईटी समेत दिल्ली पुलिस आयुक्त मौजूद थे। इस बैठक में चर्चा की गई जब ठोस सबूतों और फोरेंसिक सहित वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर आरोपियों की पहचान कर गिरफ्तरियां की है तो आखिरकार क्यों उन्हें मात मिल रही है।

पुलिस आयुक्त राकेश अस्थाना ने इस संबंध में दंगों के केस को लड़ रहे वकीलों के पैनल सहित अपने शीर्ष अधिकारियों से बातचीत की, जिसमें पता चला कि अधिकांश केसों में ठीक से पैरवी नहीं की गई है, यही नहीं शुरुआत में तो जांच अधिकारियों ने काफी तेजी दिखाईऔर फोरेंसिक सबूतों को इकट्ठा किया लेकिन बाद में जब जांच रिपोर्ट और चार्जशीट तैयार की तो उसमें कई खामियां मिलीं, जिसका खामियाजा समय के साथ कोर्ट में देखने को मिल रहा है। इसी के चलते दिल्ली पुलिस अब दंगों के अधिकांश केसों में एक्सपर्ट और कानूनविदों की राय ले रही है, ताकि दंगों के गूनहगार किसी भी सूरत में न छूटे और पुलिस के दामन पर कोई दाग भी न लगे। 

अदालत की टिप्पणियां जिनसे साख पर उठे सवाल

करदाताओं की गाढ़ी कमाई की जा रही बर्बादः‘अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय तक इस मामले की जांच करने के बाद, पुलिस ने इस मामले में केवल 5 गवाह दिखाए हैं। इनमें एक पीड़ित है, दूसरा कॉन्स्टेबल ज्ञान सिंह, एक ड्यूटी अधिकारी, एक औपचारिक गवाह और जांच अधिकारी, यह करदाताओं की गाढ़ी कमाई की भारी बर्बादी है। जांच एजेंसी का इस मामले की जांच करने का कोई वास्तविक इरादा नहीं है।’

पुलिस ने की केवल आंखों पर पट्टी बांधने की कोशिशः ‘अदालत ने इस टिप्पणी के साथ आप पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम और दो अन्य आरोपियों काशिद सैफी व शादाब को चांद बाग इलाके में दंगों के दौरान एक दुकान में कथित लूटपाट और तोडफ़ोड़ से जुड़े केस में आरोपमुक्त कर दिया। अदालत ने कहा जिस तरह से पुलिस की तरफ से मामले की जांच की गई है उससे वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से निगरानी की कमी साफतौर पर दिखती है। मामले में जांच एजेंसी ने केवल अदालत की आंखों पर पट्टी बांधने की कोशिश की है और कुछ नहीं।’

बेवजह जेल में बंद हैं आरोपीः ‘अदालत ने यह भी कहा कि बड़ी संख्या में ऐसे आरोपी हैं जो पिछले डेढ़ साल से जेल में केवल इस वजह से बंद हैं कि उनके मामलों में सुनवाई शुरू नहीं हो रही है। ऐसा लगता है कि पुलिस अभी भी सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करने में व्यस्त है। इस अदालत का कीमती न्यायिक समय उन मामलों में तारीखें देकर बर्बाद किया जा रहा है।’

किसी ने दंगाइयों की इतनी बड़ी भीड़ को नहीं देखाः ‘जांच पर सवाल उठाते हुए अदालत ने कहा, यह बात समझ में नहीं आती है कि किसी ने दंगाइयों की इतनी बड़ी भीड़ को नहीं देखा जब वे बर्बरता, लूटपाट और आगजनी को अंजाम दे रहे थे। शिकायत की पूरी संवेदनशीलता और कुशलता के साथ जांच की जानी थी लेकिन इस जांच में वह गायब है। अदालत ने कहा कि पुलिस ने चश्मदीद गवाहों, वास्तविक आरोपियों और तकनीकी सबूतों का पता लगाने का प्रयास नहीं किया। पुलिस ने केवल चार्जशीट दाखिल करने से ही मामला सुलझा हुआ मान लिया।’

हाईकोर्ट ने कहा कि विरोध का अधिकार, मौलिक अधिकार हैः ‘उच्च न्यायालय ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे के एक मामले में जेएनयू की छात्रा देवांगना कालिता को जमानत प्रदान करते हुए टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि विरोध का अधिकार, मौलिक अधिकार है और इसे आतंकी गतिविधि करार नहीं दिया जा सकता। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने कलिता के खिलाफ यूएपीए लगाने के मामले में विचार-विमर्श के बाद 83 पन्नों के फैसले में कहा, अगर इस तरह का धुंधलापन जोर पकड़ता है, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।

मौजूदा हालातों में क्या है स्थिति दिल्ली दंगों पर 

- पिछले साल फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सांप्रदायिक दंगों 53 लोगों में से 38 लोगों के ही अभी तक दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट फाइल की हैं। वहीं अभी तक सिर्फ 37 मामलों में ही कोर्ट में बहस शुरू 
हो पाई। 
 51 दंगा पीड़ितों से बात करने के बाद पता चला है कि 44 केस में ही मुआवजा दिया गया है, जबकि करीब 12 परिवारों ने इस घटना के बाद अपना निवास स्थान बदल दिया।
दिल्ली दगों को लेकर कुल 755 केस दर्ज किए गए थे, जिसमें से 400 मामलों का निपटारा किया जा चुका है। अब तक 1753 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिसमें 933 मुस्लिम और 820 हिंदू हैं।
62 मामले, जिसमें 53 मर्डर शामिल हैं, क्राइम बांच की तीन विशेष टीम द्वारा जांच किए जा रहे हैं। पुलिस का दावा है कि इसमें से 46 मामलों का निपटारा किया जा चुका है।
दंगों की जांच के लिए बनी तीन एसआईटी ने 390 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसमें 178 हिंदू और 212 मुस्लिम हैं। बड़े षड्यंत्र का जांच कर रही एसआईटी ने 21 लोगों को गिरफ्तार किया है, इसमें 19 मुस्लिम और दो हिंदू हैं।
गिरफ्तार किए गए 1753 लोगों में से 1204 लोग न्यायिक हिरासत में हैं और करीब 544 लोगों को जमानत मिल चुकी है। कुल 1553 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की जा चुकी है और 200 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर करनी बाकी है।

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