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पंजाबः अधिकारियों की मिलीभगत से GST में हो रहा फ्रॉड! पकड़े जाने पर अपनाते हैं ये तरीके

  • Updated on 3/16/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल।  जी.एस.टी. के कानून में कई खामियां हैं जिनका फायदा अधिकारी और दो नंबर का कार्य करने वाले कारोबारी उठाकर बच निकल रहे हैं। मंडी गोबिंदगढ़ में 6 कम्पनियों द्वारा जो ई-बे बिल का फर्जीवाड़ा किया गया उसे पंजाब जी.एस.टी. विभाग के अधिकारियों ने अपंग हो चुके कानून का सहारा लेकर जुर्माना लगाकर छोड़ दिया जबकि केस में साफ  नजर आ रहा है कि किस तरह इन कम्पनियों ने फर्जी ई-बे बिल बनाकर सरकार को चूना लगाया।

पता चला है कि आज जी.एस.टी. विभाग के ए.ई.टी.सी. मगनेश सेठी ने फ्रॉड करने वाली कम्पनियों के मालिकों को बुलाया और उन्हें जुर्माना भरने के लिए कहकर छोड़ दिया। इस केस को ऐसे हैंडल किया गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

मजेदार बात यह है कि जब ए.ई.टी.सी. सेठी से पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि जुर्माना भरने के लिए कम्पनियां तैयार हैं लेकिन उनसे जब पूछा गया कि आपने क्रिमिनल केस क्यों नहीं इन पर दर्ज किया तो उन्होंने बात को घुमाते हुए कहा कि ये सारी कम्पनियां सैंट्रल जी.एस.टी. विभाग के पास रजिस्टर्ड हैं।

वह पहले जुर्माना लगाएंगे, उसके बाद छानबीन करेंगे कि कम्पनियों ने फ्रॉड किया है या नहीं। यानी सेठी साहिब को जाली नंबर डालने वाले सारे सबूत मिलने के बाद भी नहीं लगता कि इन कम्पनियों ने कोई फ्रॉड किया है। उनसे जब पूछा गया कि इस फ्रॉड की जानकारी क्या आपने सैंट्रल जी.एस.टी. विभाग को दी है तो आगे से जवाब मिलता है कि पहले जुर्माना ले लें फिर कोई जानकारी देंगे।

उक्त सभी जवाबों से साफ  हो गया है कि जी.एस.टी. में फ्रॉड करने वाले क्यों नहीं डरते। क्यों खुलेआम जी.एस.टी. के बोगस बिल बेचे जाते हैं। यही नहीं दो नंबर का काम करने वाले पासर भी धड़ल्ले से बिना बिल के ही गाड़ी शहर से बाहर कैसे निकलवाते हैं।

अधिकारी सेठी ने जी.एस.टी. के सैक्शन-122 का हवाला देते हुए कहा कि इसमें प्रोविजन है कि बिना बिल के माल या माल की कोई सप्लाई न हुई हो और बिल काट दिया हो, उसे जुर्माना लगाकर छोड़ा जा सकता है लेकिन वह सैक्शन-132 को भूल गए जिसमें जुर्माने के साथ-साथ सजा का भी प्रावधान है।

नकली ई-बे बिल तैयार कर ऐसे होता है फ्रॉड का खेल

जिस तरह 6 कम्पनियो ने एक ही गाड़ी के नंबर पर 7 घंटे में 6 बार नकली ई-बे बिल काटा और उनके साथ फर्जी बिल लगाए उन्हें दो नंबरियों द्वारा बाजार में बेचकर अच्छी-खासी कमाई होती है। यानी बिल किसी और के नाम का होता है और माल की सप्लाई किसी और को दिखाई जाती है जबकि जिस कम्पनी के नाम का बिल काटा होता है उसका बिल किसी और कम्पनी को बेच दिया जाता है। जैसे स्टील पर 18 प्रतिशत जी.एस.टी. है। फर्नेस और रोलिंग मिल्सइन बिलों को 2 से 5 प्रतिशत में खरीद लेती है और बाद में सरकार से इनपुट क्रैडिट क्लेम करती है।

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