Thursday, Apr 09, 2020
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देश की पहली फांसी से निर्भया की फांसी तक जुड़ा है बिहार कनेक्शन, जानिए कैसे

  • Updated on 3/20/2020

नई दिल्ली/प्रियंका। भारत के इतिहास में 20 मार्च का दिन याद रखा जायेगा क्योंकि इस दिन 7 साल बाद निर्भया (Nirbhaya) को इंसाफ मिला। आज यानी शुक्रवार सुबह 5:30 बजे निर्भया के चारों दोषियों को फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया गया। इससे पहले देश में चार बार फांसी की सजा दी जा चुकी है। हालांकि ये सभी मामले अलग-अलग थे लेकिन इनके बीच एक कॉमन बात थी, इन फांसियों का बिहार से कनेक्शन (Connection) होना। 

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क्या है फांसी कनेक्शन
एक रिपोर्ट की माने तो देश में दी गई सभी फांसियों में जिस रस्सी का इस्तेमाल किया जाता है वो रस्सी 'मनीला रस्सी' के नाम से जानी जाती है जो खास तौर पर बिहार से मंगाई जाती है। बताया जाता है कि इस मनीला रस्सी का निर्माण बिहार के बक्सहर सेंट्रल जेल में हुआ था। निर्भया के दोषियों को भी इसी रस्सी से लटका कर फांसी दी गई थी।

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आखिर क्यों बक्सर जेल को चुना गया  
इस रस्सी की सबसे बड़ी यही खासियत है कि इसे बक्सर सेंट्रल जेल के अलावा कहीं नहीं बनाया जा सकता। दरअसल, भारतीय कारखाना अधिनियम (Factories Act, 1948) के अनुसार बक्सर सेंट्रल जेल को छोड़ किसी अन्य जगह फांसी की रस्सी बनाने पर प्रतिबंध लगाया गया है। स्वतंत्रता के पहले से ही इस जेल में रस्सी को बनाने की मशीन मौजूद है। 

बक्सर में रस्सी बनाने का एक कारण यह भी है कि बक्सर में मौसम इस रस्सी के अनुकूल होता है। दरअसल, यह रस्सी बहुत मुलायम बनाई जाती है। रस्सीे को मुलायम बनाने के लिए इसमें प्रयुक्त सूत को अधिक नमी की जरूरत होती है और इसलिए अंग्रेजों ने गंगा के किनारे के इस जेल में फांसी की रस्सी की मशीन लगाई थी। 

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इस रस्सी का है इतिहास 
बताया जाता है कि अंग्रेजों ने बक्सर जेल में साल 1844 में फांसी की रस्सी बनाने वाली मशीन लगाई थी। इससे पहले फांसी के लिए रस्सी फिलीपींस की राजधानी मनीला के जेल में बनती थी और इसलिए इस रस्सी का नाम मनीला रस्सी पड़ा था। ये फांसी 18 फीट लंबी तैयार की जाती है। उस वक्त इसकी कीमत काफी कम होती थी लेकिन आज के समय में इस रस्सी की कीमत 2000 से ज्यादा बताई जाती है।

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मनीला रस्सी की खासियत
इस रस्सी का इस्तेमाल सिर्फ फांसी के लिए ही नहीं बल्कि पुलों को बनाने, भारी बोझों को ढोने और भारी वजन को लटकाने आदि में भी किया जाता है। ये रस्सी खास गड़ारीदार रस्सी है। इस पर पानी का कोई असर नहीं पड़ता बल्कि ये पानी को सोख लेती है। इससे लगाई गई गांठ बेहद दमदार होती है। इस रस्सी को बनाने में मोम, सूत का धागा, फेविकोल, पीतल का बुश, पैराशूट रोप आदि का भी इस्तेमाल किया जाता है। एक अनुमान के अनुसार इसके एक फंदे में 72 सौ धागों का इस्तेमाल होता है। ये रस्सी 80 किलो वजन वाले शख्स को आसानी से लटका सकती है।

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