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मुजफ्फरपुर कांड: TISS परियोजना को पीड़ितों से बात की इ्जाजज मिली

  • Updated on 7/18/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। उच्चतम न्यायालय ने टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) की कार्य परियोजना ‘कोशिश’ को मुजफ्फरपुर आश्रय गृह यौन हिंसा मामले की पीड़ितों और उनके परिजनों से बातचीत करने की बृहस्पतिवार को अनुमति प्रदान कर दी ताकि वह उनके पुनर्वास की योजना तैयार कर सके। टीआईएसएस की रिपोर्ट से ही बिहार के मुजफ्फरपुर में एक गैर सरकारी संगठन द्वारा संचालित आश्रय गृह में अनेक लड़कियों के यौन शोषण का मामला सुॢखयों में आया था। 

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शीर्ष अदालत को केन्द्र ने सूचित किया कि वह बच्चों के यौन शोषण की घटनाओं पर अंकुश लगाने के इरादे से चार से छह महीने के भीतर ही बाल संरक्षण नीति को अंतिम रूप दे देगा। न्यायमूॢत एन वी रमण, न्यायमूॢत एम एम शांतनगौडर और न्यायमूॢत अजय रस्तोगी की पीठ की अध्यक्षता वाली पीठ ने बिहार सरकार के एक आवेदन पर सुनवाई के दौरान टिस को यह अनुमति प्रदान की। राज्य सरकार मुजफ्फरपुर आश्रय गृह के 44 बच्चों को उनके परिवारों को सौंपने की अनुमति चाहती है।

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पीठ ने इस तरह का आवेदन दायर करने पर राज्य सरकार से सवाल किये और टिप्पणी की कि ‘‘रोजाना हम बिहार की समस्या से रूबरू हो रहे हैं। क्या हर समस्या का (बिहार की) समाधान न्यायालय को ही करना होगा?’’ बिहार सरकार के वकील ने कहा कि मुजफ्फरपुर आश्रय गृह के बच्चों को इस समय अलग-अलग बाल देखरेख संस्थाओं में रखा गया है और इनमें से कुछ के व्यवहार में आक्रामकता नजर आ रही है और वे खुद का अहित करने में संलिप्त हो रहे हैं।      वकील ने कहा, ‘‘वे (कुछ बच्चे) महसूस करते हैं कि वे बंधक हैं और उन्हें ज्यादा संरक्षण वाले माहौल में रखा गया है। उन्होंने इन संस्थाओं से भागने के भी प्रयास किये हैं।’’

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इस मामले में न्याय मित्र अधिवक्ता अपर्णा भट ने पीठ को सूचित किया कि मुजफ्फरपुर कांड के मुकदमे की सुनवाई चल रही है और इस प्रकरण में हत्या के पहलू की जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस साल जून में शीर्ष अदालत ने जांच ब्यूरो को संदिग्ध हत्याओं सहित सारे मामले में अपनी जांच पूरी करने के लिये तीन महीने का वक्त दिया था। न्यायालय ने जांच ब्यूरो को इस अपराध में ‘बाहरी व्यक्तियों’ की भूमिका की संलिप्तता का पता लगाने के लिये अपनी जांच का दायरा बढ़ाने का भी निर्देश दिया था। 

भट ने कहा कि इन बच्चों का पुनर्वास करना होगा लेकिन उन्हें उनके परिवारों पास भेजना उनके लिये अच्छा नहीं होगा। उन्होंने कहा कि इन बच्चों को देखभाल और सहयोग की जरूरत है। इन बच्चों को उनके परिवार को सौंपने से कुछ नहीं होगा। मुजफ्फरपुर प्रकरण के आरोपी प्रभावशाली लोग हैं और वे मुकदमे की सुनवाई होने तक उनके परिवारों तक पहुंच सकते हैं।

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टीआईएसएस की ओर से अधिवक्ता वृन्दा ग्रोवर ने कहा कि अप्रैल महीने में यूनिसेफ के सदस्यों के साथ राज्य सरकार के समाज कल्याण विभाग, कोशिश और अन्य की बैठक में पुनर्वास योजना पर चर्चा हुयी थी। उन्होंने कहा कि पुनर्वास योजना तैयार नहीं हो सकी क्योंकि इसके लिये प्रत्येक बच्चे और उनके परिवार के साथ चर्चा करने की आवश्यकता है। ग्रोवर ने कहा कि इन 44 बच्चों में से अनेक मुजफ्फरपुर प्रकरण में गवाह हैं लेकिन इस समय मुख्य काम तो इनकी भलाई की ओर ध्यान देने का है।

इस पर पीठ ने कहा, ‘‘सवाल यह है कि इसका रास्ता क्या है? हमें इसका समाधान कैसे करना चाहिए।’’ पीठ ने साथ ही यह भी जानना चाहा कि हत्याओं के बारे में क्या हुआ और कितनी हत्यायें हुयीं थीं। भट ने कहा कि लड़कियों के बयानों के अनुसार आश्रय गृह में तीन लड़कियों की हत्या की गयी थी और जांच ब्यूरो को जांच में अस्थियां मिली हैं। पीठ ने कहा कि वह ‘कोशिश’ को बच्चों और उनके परिजनों के साथ मिलने और बातचीत करने की अनुमति देगी और वह चार सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। 

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ग्रोवर ने कहा कि बच्चों और उनके परिजनों से बातचीत के बाद वे प्रत्येक के लिये पुनर्वास योजना तैयार कर सकते हैं। केन्द्र की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल पिंकी आनंद ने कहा कि बाल संरक्षण नीति के मसौदे पर उन्हें करीब 250 सुझाव मिले हैं और चार से छह महीने में इसे अंतिम रूप दिया जायेगा। पीठ ने पिंकी आनंद को इस मामले में तीन सप्ताह बाद प्रगति रिपोर्ट पेश करने की अनुमति दे दी। 

शीर्ष अदालत ने जून में जांच ब्यूरो को निर्देश दिया था कि इस मामले में अप्राकृतिक यौनाचार के आरोपों की भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत जांच की जाये। इसके अलावा जांच ब्यूरो को आश्रय गृह में लड़कियों के साथ कथित हिंसा की वीडियो रिकार्डिंग  के मामले में सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत अपराध की जांच करने का भी निर्देश दिया था। 

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केन्द्रीय जांच ब्यूरो द्वारा दायर आरोप पत्र के आधार पर मुजफ्फरपुर कांड में दिल्ली की अदालत में 21 आरोपियों पर मुकदमा चल रहा है। शीर्ष अदालत ने फरवरी महीने में यह मामला बिहार से दिल्ली के साकेत जिला अदालत परिसर में यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण संबंधी मामलों की सुनवाई करने वाली अदालत को स्थानांतरित कर दिया था। शीर्ष अदालत ने टीआईएसएस की रिपोर्ट के आधार पर बिहार के 16 अन्य आश्रय गृहों में रहने वाले बच्चों के शारीरिक और यौन शोषण के आरोपों की जांच करने का निर्देश केन्द्रीय जांच ब्यूरो को दिया था।
 

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