Wednesday, Dec 01, 2021
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the murderers of nirbhaya don''''t deserve the delay in capital punishment

हैदराबाद एन्काउंटर से सबक ले न्यायालय, निर्भया के हत्यारे फांसी में देरी के लायक नहीं: केंद्र

  • Updated on 2/3/2020

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। ‘सावधान, कानून की विश्वसनीयता खतरे में है। अगर अभी भी निर्भया के हत्यारों को फांसी पर लटकाने की जगह फांसी को ही अगली तरीख के लिए लटकाते रहे तो लोगों का कानून पर से भरोसा उठता ही जाएगा। कमोबेश यही कारण था कि हैदराबाद में महिला चिकित्सक के बलात्कार और हत्या के आरोपियों के एंकाउंटर पर पूरे देश में खुशी का माहौल बन गया था। कानून व्यवस्था अपना विश्वास खोती जा रही है।‘ कमोबेश इसी अंदाज़ में केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय निर्भया के हत्यारों की फांसी देकर निर्भया को इंसाफ दिलाने की पुरजोर वकालत की।

केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के वकील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor Tushar Mehta) ने रविवार को दिल्ली हाईकोर्ट में निर्भया के हत्यारों की फांसी की सजा पर रोक लगाने के निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दलीलें रखी। अदालत में तुषार मेहता आरोप लगाया कि हत्यारे फांसी की सजा को ज्यादा से ज्यादा लटकाने के लिए सोची-समझी साजिश के तहत सुनियोजित चालें चल रहे हैं औऱ ‘‘देश के धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं।’’

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अदालत में हत्यारों के पक्ष में दलीलें रखने वाली वकील रेबेक्का जॉन ने दावा किया कि किसी भी दोषी को पहले फांसी नहीं दी जा सकती। इस दौरान दोषी मुकेश कुमार का प्रतिनिधित्व कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेक्का जॉन ने दलील दी कि चूंकि उन्हें एक ही आदेश के जरिए मौत की सजा सुनाई गई है, इसलिए उन्हें एक साथ फांसी देनी होगी और उनकी सजा अलग-अलग नहीं दी जा सकती। मुकेश की ओर से तर्क रखते हुए जॉन ने कहा, ‘‘मैं स्वीकार करती हूं कि मैंने प्रक्रिया विलंबित की, मैं बहुत खराब व्यक्ति हूं, मैंने एक घोर अपराध किया है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती, इसके बावजूद मैं संविधान (Constitution) के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) की हकदार हूं.’’

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तुषार मेहता ने दलील दी कि दोषी पवन गुप्ता ने दया याचिका दायर नहीं की है। ये बेहद सुनियोजित साजिश के तहत उठाया गया कदम है। निचली अदालत की व्याख्या के तहत अगर पवन गुप्ता दया याचिका (Mercy Petition) दायर नहीं करने का फैसला करता है तो किसी को भी फांसी नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा, ‘‘दोषियों द्वारा प्रक्रिया में देरी कराने की सुनियोजित चाल चली जा रही है जिससे निचली अदालत द्वारा कानून के तहत सुनायी गई उस सजा के अमल पर देर करायी जा सके जिसकी दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने पुष्टि की थी और जिसे उच्चतम न्यायालय ने भी बरकरार रखा था.’’ 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 6 दिसंबर को 2019 के हैदराबाद गैंगरेप (Hyderabad Gang Rape) और हत्या मामले का उल्लेख किया। इस मामले में हत्या और बलात्कार के चारों आरोपी पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में मारे गए थे। मेहता ने दावा किया कि इस अफसोसनाक हादसे पर देश भर में खुशियां जाहिर की गई थी। इसका बहुत खराब प्रभाव सामने आया।

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मेहता ने आरोप लगाया कि निर्भया मामले में आरोपी कानून की मशीनरी का मजाक बना रहे हैं। देश के धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं।

मुकेश और विनय शर्मा की दया याचिकाएं राष्ट्रपति (President) ने खारिज कर दी हैं। पवन ने अभी अर्जी दायर नहीं की है। अक्षय सिंह की दया याचिका शनिवार को दायर की गई थी और यह अभी लंबित है।

हत्या और बलात्कार के मामले में दोषी अक्षय सिंह (31), विनय शर्मा (26) और पवन गुप्ता (25) की ओर से पेश हुए वकील एपी सिंह ने केंद्र की फांसी की सजा पर रोक हटाने की केंद्र की अर्जी का विरोध किया।

जॉन ने केंद्र की अर्जी पर प्रारंभिक आपत्ति दर्ज करते हुए दावा किया कि केंद्र मामले की सुनवाई में कभी पक्षकार नहीं था, सरकार दोषियों (Victims) पर विलंब का आरोप लगा रही है जबकि वह खुद दो दिन पहले जागी है।

उन्होंने कहा, ‘‘वे पीड़िता के माता- पिता थे जिन्होंने दोषियों के खिलाफ मौत का वारंट जारी कराने के लिए निचली अदालत का रुख किया था। किसी भी समय केंद्र सरकार या राज्य सरकार ने मृत्यु वारंट तुरंत जारी करने के लिए निचली अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया।’’

उन्होंने कहा कि निचली अदालत (Lower Court) द्वारा एक साझा फैसला सुनाया गया था कि उन्हें मृत्यु होने तक फांसी पर लटकाया जाए और दोषियों को आखिरी सांस तक उन्हें उपलब्ध उपायों का इस्तेमाल करने का अधिकार है।

जॉन ने खुद दावा किया कि अदालत के आदेशों के तहत ही फांसी दी जाएगी, मगर किसी को भी प्रक्रिया में बाधा नहीं उत्पन्न करनी चाहिए क्योंकि यह किसी व्यक्ति के जीवन का सवाल है। जॉन ने दलील दी कि उच्चतम न्यायालय ने कभी नहीं कहा कि दोषियों ने प्रक्रिया विलंबित की है। दोषियों की दया याचिका राष्ट्रपति ने गुणदोष के आधार पर खारिज की है, विलंब के चलते नहीं।

ज्ञात रहे कि हत्यारों में एक किशोर भी शामिल था। जिसे एक किशोर न्याय बोर्ड ने दोषी ठहराया था और उसे तीन वर्ष बाद सुधार गृह से रिहा कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने 2017 के अपने फैसले में दोषियों को दिल्ली उच्च न्यायालय और निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा बरकरार रखी थी।

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