Monday, May 16, 2022
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#Nirbhaya: रेप से भी ज्यादा घिनौने हैं आरोपियों से लेकर राजनेताओं के ये बयान

  • Updated on 12/16/2018

नई दिल्ली/श्वेता राणा। देश की राजधानी के लिए आज की तारीख कोरे कागज पर गिरी उस काली श्याही के दाग की तरह है जिसे चाह कर भी साफ नहीं किया जा सकता। 16 दिसंबर ये वो तारीख है, जिसने पूरे देश में आंदोलनों की क्रांति ला दी थी। हम बात कर रहे हैं निर्भया गैंगरेप की। बलात्कार के इस मामले को गुजरे 6 साल हो गए हैं पर बावजूद इसके आज भी बलात्कार जैसी घिनौंनी वारदातें देश में थमी नहीं है।

2012 के निर्भया केस से दोषियों की मानसिकता किस तरह की हो सकती है इसका अंदाजा एक आरोपी के बयान से लगाया जा सकता है।

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वैसे तो इस केस में 6 आरोपी पकड़े गए थे, जिसमें से बस ड्राइवर राम सिंह ने तिहाड़ जेल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उनमें से एक नाबालिग होने के कारण बच गया, लेकिन शेष 4 में से एक आरोपी मुकेश सिंह के एक इंटरव्यू में लड़कियों के लिए बिगड़ते हुए बोल ये साफ जाहिर करते हैं कि उसकी मानसिकता कितनी घटिया थी।

BBC की एक डॉक्युमेंट्री में मुकेश का इंटरव्यू है, जिसमें वह कहता है कि -अगर रात में लड़कियां निकलेंगी तो ऐसी घटनाएं होंगी...ऐसी और भी बातें हैं जो उसकी घटिया मानसिकता को साफ-साफ दर्शाता है। वो कहता है---

  • किसी भी रेप के लिए लड़के से ज्यादा लड़की जिम्मेदार होती हैं। ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती, इसके लिए दो हाथ चाहिए होते हैं। कोई शरीफ लड़की रात के 9 बजे  घर से बाहर नहीं घूमती।
  • घर के काम और घर में रहना लड़कियों का काम है, वे रात में बार, डिस्को कैसे जा सकती है? भद्दे कपड़े पहनकर गलत काम करती हैं। केवल 20 प्रतिशत लड़कियां ही अच्छी होती हैं।

उसकी घटिया सोच यही नही रुकी, उसके मुताबिक अगर लड़की उसका विरोध नहीं करती तो वे उसे मारते नहीं

  • मुकेश कहता है कि- मैं गाड़ी चला रहा था। मेरे भाई ने लड़के को मारा। लड़की चिल्लाती रही- बचाओ, बचाओ! हम उसे मारपीट कर पीछे ले आए।
  •  हम आ जा रहे थे बारी-बारी से। लड़की विरोध कर रही थी, अगर वो ऐसा न करती तो उसकी जान न जाती। लड़की को घटना का विरोध नहीं करना चाहिए था।
  • जब हम उसका रेप कर रहे थे,तब उसे हमें रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थई। उसे चुपचाप जो हो रहा था, होने देना था। तब हम उसके साथ सब करने के बाद उसे  घर छोड़ देते ,सिर्फ लड़के को मारते।

मौत की सजा मिलने पर आरोपी का यह कहना है...

  • किसी रेपिस्ट को मौत की सजा देना लड़कियों के लिए और खतरनाक हो जाएगा। पहले रेप करके कहते थे, ‘इसे छोड़ दो, ये किसी से नहीं कहेगी’,  लेकिन अब जो रेप करेंगे, वो लड़की को सीधे मार देंगे, छोड़ेंगे नहीं।

मुकेश की इस तरह की मानसिकता होना कोई अनोखी बात नहीं है, क्योंकि वो भी हमारे समाज से ही आता है। लेकिन कई दफा हम सोच लेते हैं कि एक लड़की दूसरी लड़की का दर्द समझेगी। ऐसे में दूसरे आरोपी पवन गुप्ता की बहन द्वारा निर्भया को लेकर की गई बातें बुरी लगने के साथ-साथ इस बात को गलत भी साबित करती हैं।

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आरोपी पवन गुप्ता की बहन कहती हैं कि...

  • इस देश में हर कोई क्राइम करता है, औऱ कोई भी गलती कर सकता है, लेकिन सुधरने का एक मौका तो मिलना चाहिए।
  • सिर्फ यहीं नहीं उनके मुताबिक हमेशा लड़कों की गलती नहीं होती, कई बार लड़कियां भी उनको भड़काती हैं। 
  • वह कहती हैं कि कई बार मैं भी जींस या वेस्टर्न कपड़े पहनती हूं,लेकिन अगर कोई मुझे घूरे या कमेंट पास करे तो मैं सिर नीचे कर चुपचाप निकल जाता हूं, लेकिन अगर मैं उसमें मजे लेने लगूं, तो लड़के को लगेगा कि मैं सिग्नल दे रही हूं। 

सिर्फ आरोपी या इनके परिवारवालों के बयान ही क्यूं, हमारे देश के राजनीतिक नेता भी इस तरह की मानसिकता रखते  हैं।कई राजनेता रेप के लिए लड़कियों को जिम्मेदार ठहराते हैं, वहीं कुछ उन्हें नसीहत देते नजर आते हैं कि उन्हें कैसे और किस तरह का रवैया रखना चाहिए।

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ये हैं कुछ बयान...

मुलायम सिंह यादव

जब लड़के और लड़कियों में कोई विवाद होता है तो लड़की बयान देती है कि लड़के ने मेरा बलात्कार किया। इसके बाद बेचारे लड़के को फांसी की सजा सुना दी जाती है। बलात्कार के लिए फांसी की सजा अनुचित है। लड़कों से गलती हो जाती है।

 आरएसएस प्रमुख, मोहन भगवत

बलात्कार पाश्चात्य सभ्यता का दुष्प्रभाव है और इसलिए शहरी इलाकों में ज्यादा होता है। हमारे गांव जहां राष्ट्रीय भावना प्रबल होती है वहां बलात्कार नहीं होते हैं।

कांग्रेस नेता धर्मवीर गोयल

90 प्रतिशत मामलों में रोप नहीं होता। लड़कियां आपसी सहमति से संबंध बनाती हैं।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर

रेप और छेड़छाड़ की 80 से 90 फीसदी घटनाएं जानकारों के बीच होती है। लंबे समय तक साथ घूमते हैं और एक दिन अनबन होती है तो उस दिन उठकर के एफआईआऱ करवा देते हैं कि इसने मेरा रेप किया है। 

राजनेताओं और बाकी लोगों की तरफ से आए इस तरह के बयान ये दर्शातें हैं कि हमारा समाज ऐसी दुर्घटना के बाद महिला को दोष और नसीहत देने के बजाए दोषी का सामाजिक बहिष्कार नहीं करेगा। तब ऐसे में कितने कानून बन जाएं सब बेअसर ही रहेंगे क्योंकि जरुरत है तो सिर्फ मानसिकता बदलने की। ये समझने की कि औरत को भी हक है बिना किसी डर के किसी भी समय, कहीं भी सर उठा के चलने का, जीने का। 
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