Thursday, Sep 23, 2021
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राजधानी की चमकदार सड़कों ने निगली,1622 जिंदगियां

  • Updated on 1/12/2017

Navodayatimes

नई दिल्ली,  (ब्यूरो) : राजधानी की चमकदार सड़कों ने इस बार 1622 जिंदगियों को निगल लिया। सभी मौत सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में हुई। सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट(भारत में सड़क दुर्घटना-2015)का यह ताजा आंकड़ा राजधानी की यातायात व्यवस्था, नियम-कानून और इसे जमीनी स्तर पर लागू करने वाले निकायों के तमाम दावों को भी आईना दिखाने वाला साबित हुआ है।

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साथ ही सड़क पर जिंदगी की सुरक्षा पर एक बार फिर बहस का दौर चल पड़ा है। जानकारों की मानें तो राजधानी की सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिए अब पूरी शिद्दत के साथ जुटना होगा। साथ ही निर्धारित दिशा निर्देशों को जमीनी स्तर पर लागू करने की गंभीरता से पहल करनी होगी। दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान (एम्स) ट्रॉमा सेंटर में सड़क दुर्घटना में घायल होने वाले लोगों की सलाना तादाद भी रोड सेफ्टी की कोशिशों को कागजी करार देने के लिए काफी है। 

दूसरों की गलतियों से जा रही है जान : रिपोर्ट के मुताबिक देश में इसबार 5 लाख से अधिक सड़क दुर्घटना के मामले सामने आए हैं। पिछली रिपोर्ट के मुकाबले इसमें सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में 4.6 प्रतिशत की वृद्धि रेकार्ड की गई है। हैरान करने की बात यह है कि 100 में से 77 सड़क हादसों में वाहन चालकों की ही गलती पाई गई। वहीं सबसे ज्यादा हादसे हादसे ओवर स्पीडिंग के कारण हुए।

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जानकारों की मानें तो इसके लिए सिर्फ वाहन चालकों को ही दोषी मान लेना समस्या से आंख चुराने जैसा होगा। पूर्वी रेंज के डीसीपी (ट्रैफिक) किमें कामिंग ने भी सिर्फ वाहन चालकों को भी दोषी मानने पर एतराज जताते हुए कहा कि कई रूटों पर तकनीकी खामियां, सड़कों के हालात सहित कई अन्य पहलू भी दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि लोगों की सतर्कता और जागरूकता सड़क हादसों के बढ़ते हुए मामलों को काफी हद तक कम कर सकती है।

कामिंग के मुताबिक वाहन चालक ओवर स्पीङ्क्षडंग और शराब पीकर वाहन चलाने का जोखिम न लें। उन्होंने कि सड़क पर पैदल चलने के साथ वाहन चलाने संबंधित दिशानिर्देशों का लोगों को पालन करना चाहिए। यह सभी नियम और कायदे सड़क पर लोगों की सुरक्षा के लिए ही निर्धारित किए गए हैं। 

एम्स ट्रॉमा सेंटर में हर साल भर्ती होते हैं 70 हजार दुर्घटना पीड़ित : ट्रॉमा सेंटर के निदेशक डॉ. अमित गुप्ता के मुताबिक ट्रॉमा सेंटर में प्रतिवर्ष हजारों की तादाद में लोगों को भर्ती किया जाता है। इनमें से 70 हजार से अधिक मामले सड़क हादसों के होते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक ट्रॉमा सेंटर में लाए जाने वाले ऐसे मरीजों की हालत गंभीर होती है। उन्हें तत्काल उपचार की जरूरत होती है।

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जागरूकता की कमी के कारण कई बार दुर्घटना पीड़ितों को अस्पताल लाने में होने वाली देरी उनकी जिंदगी को संकट में डाल देता है। डॉक्टरों के मुताबिक किसी दुर्घटना पीड़ित को नजरअंदाज करने के बजाए या तो तत्काल अस्पताल में भर्ती किया जाना चाहिए। वहीं संबंधित विभागों को तत्काल सूचना देने और उसे अस्पताल लाने में मदद कर भी काफी हदतक जिम्मेदारियों को निभाया जा सकता है। 

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