Wednesday, Dec 01, 2021
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दिल्ली में तय न्यूनतम मजदूरी अपर्याप्त : अदालत

  • Updated on 5/13/2017

Navodayatimes नई दिल्ली/टीम डिजिटल। दिल्ली उच्च न्यायालय ने  कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में मौजूदा आर्थिक स्थिति में किसी व्यक्ति के रहन-सहन के लिहाज से 'आप' सरकार द्वारा हाल में अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी काफी कम और अपर्याप्त है। 

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अदालत ने व्यापारियों, पेट्रोल डीलरों और रेस्तरां मालिकों जैसे याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाओं में दिल्ली सरकार की अधिसूचना को चुनौती दी गयी है। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि ये याचिकाकर्ता हलफनामे में यह कह पाने की स्थिति में नहीं है कि वे अपने कर्मचारियों को श्रम कानून के तहत सभी प्रकार के लाभ दे रहे हैं।

दिल्ली सरकार के 3 मार्च की अधिसूचना के अनुसार अकुशल, अद्र्ध-कुशल और कुशल श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी क्रमश: 13, 350 रुपए, 14, 698 रुपए तथा 16,182 रुपए नियत किया गया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायाधीश अन्नू मल्होत्रा की पीठ ने कहा, किसी व्यक्ति का जीवन यापन 13, 000 रुपए में संभव है? किसी व्यक्ति के लिये काम पर आने-जाने का औसत खर्च प्रतिदिन 100 रुपए है जो महीने में 3,000 रुपए बनता है। आप कहां खाते हैं? खाने पर 50 रुपए प्रतिदिन का खर्च आएगा। 13,000 रुपए की राशि बहुत कम है। यह अपर्याप्त है। व्यापारियों, डीलरों तथा रेस्तरां का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ संगठनों ने आप सरकार द्वारा कर्मचारियों के लिये अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी को चुनौती दी है। पीठ ने नियोक्ताओं से अधिक सक्रिय भूमिका निभाने को कहा। साथ में यह भी कहा कि अगर वे सरकार द्वारा निर्धारित मजदूरी से नाखुश हैं तो उन्हें निर्णय करना चाहिए कि आखिर न्यूनतम मजदूरी क्या हो।

अदालत ने कहा कि आप कर्मचारियों को देखिये। उन्हें अपना परिवार भी चलाना होता है और आप न्यूनतम मजदूरी 13,000 से 16,000 किए जाने को चुनौती दे रहे हैं। हालांकि अदालत ने यह भी आदेश दिया कि उन नियोक्ताओं के खिलाफ 11 सितम्बर तक कोई कार्रवाई नहीं होगी जिन्होंने अधिसूचना लागू नहीं की है।

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पीठ ने कहा कि कर्मचारियों के साथ भेदभाव होता है क्योंकि मांग के मुकाबले आपूर्ति अधिक है। अदालत ने कहा कि कोई भी याचिकाकर्ता हलफनामे में यह कहने की स्थिति में नहीं है कि वे श्रम कानून के तहत उपलब्ध लाभ अपने कर्मचारियों को दे रहे हैं। पीठ ने लेफ्टिनेंट गवर्नर के कार्यालय तथा दिल्ली सरकार के श्रम विभाग को नोटिस जारी कर नियोक्ताओं की याचिकाओं पर 11 सितम्बर तक अपना रुख स्पष्ट करने को कहा।

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