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दुर्लभ बीमारियों से मुकाबले के लिए 100 करोड़

  • Updated on 7/10/2017

Navodayatimesनई दिल्ली/ब्यूरो।  देश में अनुवांशिक बीमारियों को लेकर हाईकोर्ट के आदेश के बाद केंद्र सरकार ने बाकायदा कानून (25 मई 2017) बनाकर 100 करोड़ रुपए का कोष तैयार किया है। जिसमें केंद्र सरकार 60 प्रतिशत की भागीदारी देगी। वहीं 40 प्रतिशत खर्च राज्य सरकार के कोष से दिया जाएगा। इसके बाद आर्थिक रूप से लाचार और गोचर जैसी जन्मजात और अनुवांशिक बीमारियों से पीड़ित परिवार और उनके सदस्यों को भारी राहत मिलेगी। ऐसी बीमारियों का इलाज में लाखों-करोड़ों का खर्च आता है।

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जिसका वहन कराना अधिकतर लोगों के लिए संभव नहीं होता। इसके अलावा हेल्थ इंसोरेंस देने वाली कंपनियां भी ऐसी कई बीमारियों को कवर नहीं करतीं। नतीजतन पीड़ितों के पास उपचार का कोई अन्य विकल्प नहीं रह जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक विश्व में करीब 6-8 हजार रोग रेयर डिजीज श्रेणी में शामिल हैं। जिनमें से 450 बीमारियों से पीड़ित मरीज भारत में मौजूद हैं। विशेषज्ञों की मानें तो अब देशभर में गौचर, फेबरी,पाम्पे, एमपीएस-1 सहित हजारों तरह की बीमारियों से पीड़ित मरीजों का निशुल्क इलाज हो सकेगा। 

यह सही है कि एंकाइलूजिंग स्पांडिलाइटिस से खासतौर से युवा प्रभावित होता है। इससे शरीर की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। मिड और एडवांस स्टेज में यह रोग युवाओं की कार्यक्षमता को काफी हद तक प्रभावित कर चुका होता है। इसका प्रभावी उपचार अबतक संभव नहीं है। कुछ दवाइयों और फिजियोथेरेपी की मदद से इसके फैलाव को ही रोकना संभव है। 
- डॉ. हिमांशु अग्रवाल, रिमेटोलॉजिस्ट, मैक्स अस्पताल 

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कोर्ट के आदेश के बाद सरकारी पहल सराहनीय है। फिलहाल बच्चों से जुड़ी बीमारियों के साथ अनुवांशिक और जन्मजात बिमारियों के निशुल्क इलाज की पहल की गई है, लेकिन एंकाइलूजिंग स्पांडिलाइटिस सूची से बाहर है।  
- डॉ. केके अग्रवाल, अध्यक्ष इंडियन मेडिकल एसोसिएशन

लाइलाज है बीमारी महंगा है प्रबंधन 
ऑटो इम्यून डिसार्डर श्रेणी के इस रोग का कोई प्रभावी इलाज मौजूद नहीं है। इसे सिर्फ सप्रेस (रोग प्रगति बाधित करना) किया जा सकता है। ध्यान देने की बात यह है कि यह रोग उस वक्त ज्यादातर प्रभावित होता है, जब इससे पीड़ित युवाओं को शारीरिक तौर से सक्रिय रहने की जरूरत होती है। रोग पीड़ित युवा इससे प्रभावित होने के कारण पढ़ाई, जॉब या करोबार चाहकर भी नहीं कर पाता।

कोर्ट से बरसी राहत 
कोर्ट ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव को अबतक उठाए गए कदमों की जानकारी 11 अगस्त 2017 तक देने के आदेश भी दिए हैं। जिसमें बिना कठिनाई के ऐसे दुर्लभ बीमारी से पीड़ित मरीज केंद्र के संबंधित कानून का लाभ कैसे ले सकेंगे? इसकी जानकारी भी मांगी गई है। केंद्र की ओर से की गई संबंधित पहल व्यवहारिक तौर पर संभव कोर्ट के दरवाजे से ही हो पाया है। इसके लिए 3 साल की लंबी लड़ाई लड़ी गई है।

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पेशे से रिक्शा चालक सिराजुद्दीन के पांच बच्चे अनुवांशिक और दुर्लभ किस्म की बीमारी गोचर से पीड़ित थे। उपचार के दौरान जब उसे पता चला कि इस बीमारी के इलाज में प्रतिमाह लाखों रुपए खर्च होंगे तो मानों उसके पैरो तले जमीन खिसक गई। सिराजुद्दीन की आंखों के सामने एक-एककर उसके पांच बच्चों की मौत हो गई। बाद में सिराजुद्दीन को जब छठी संतान को भी गोचर से पीड़ित होने का पता चला तो वह हतप्रभ रह गए, लेकिन निराश होने के बजाए वे हाईकोर्ट की शरण में जा पहुंचे।

सिराजुद्दीन ने केंद्र और दिल्ली सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अपने बेटे के निशुल्क इलाज की मांग की।  इस कानूनी लड़ाई में सबसे पहली जीत 17 जनवरी, 2014 को तब मिली, जब कोर्ट ने गौचर समेत अन्य आनुवांशिक और दुर्लभ बीमारियों से ग्रसित मरीजों के निशुल्क इलाज के लिए केंद्र और दिल्ली सरकार को आवश्यक नीति बनाने का आदेश जारी कर दिया। जिसके बाद केंद्र को पहल करनी पड़ी और सिराजुद्दीन का बेटे के स्वस्थ्य होने के साथ ऐसे 7000 रोगों के निशुल्क उपचार भी संभव हो गया। 

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