Sunday, Nov 28, 2021
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एक अंग्रेज ने खोला राज, फिरोजशाह नहीं बल्कि सम्राट अशोक की है लाट

  • Updated on 9/5/2021

नई दिल्ली/ अनामिका। फिरोजशाह कोटला जहां क्रिकेट के मैदान की वजह से काफी विख्यात है, वहीं अपनी ऐतिहासिकता को लेकर भी हमेशा चर्चा में रहता है। उसमें भी सबसे अधिक चर्चा रहती है फिरोजशाह तुगलक द्वारा सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए स्तंभ (लाट) को यहां लाकर लगाने की वजह से। शायद आपको यह जानकर हैरानी होगी कि काफी लंबे समय तक लोग इसे फिरोजशाह द्वारा बनवाया गया जानते थे लेकिन एक अंग्रेज इतिहासकार ने लाट पर लिखी लिपि को पढकर इसका भेद खोल दिया। जो कसर बची वो उसने समकालीन लेखक जिआउद्दीन बरनी की किताब से साफ कर दिया।

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लाट को गिराने के लिए सैमल रूई के बिछाए गए गदैले
बता दें कि 1356 ई. में फिरोजशाह द्वारा अशोक की इस लाट को यमुना के रास्ते खिजराबाद के निकट व मेरठ से लाकर दिल्ली में अपने दो महलों में लगवाया था। पहला लाट फिरोजशाह कोटला में व दूसरा लाट हिंदू बाडाराव के पास पीर गाईब में देखने को मिलता है। जिआउद्दीन बरनी ने अपनी किताब में लिखा है कि लाट को किस तरह गिराया गया ताकि उसे नुकसान ना पहुंचे। इसके लिए हजारों सैमल की रूई के गटठों का इस्तेमाल किया गया। जब लाट की जड को खोदा गया तो लाट उन रूई के गदैलों पर गिर गई जोकि चारों ओर बिछे हुए थे। लाट को निकालने के बाद वहां बनाए गए चैकोर पत्थर को भी निकाला गया जिस पर लाट टिकी हुई थी।

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यमुना के रास्ते पहुंची दिल्ली में लाट
लाट को निकालने के बाद जंगली घास, कच्चे चमडे में खूब लपेटा गया ताकि रास्ते में उसे हानि ना हो। एक बडी गाडी तैयार की गई जिसके 42 पहिए थे और हरेक पहिए में एक-एक रस्सा बांधा गया। बडी मुश्किल से लाट यमुना नदी तक पहुंची जहां बादशाह अपनी सवारी पर लाट का इंतजार कर रहा था। यमुना में बडी-बडी कश्तियां जमा की गईं और बडी कुशलता से लाट को लादा गया। 

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पिरामिडीय इमारत बनवा कर लगाई गई लाट 
फिरोजशाह ने फिरोजाबाद लाने के बाद लाट को खडा करने के लिए आज के फिरोजशाह कोटला के भीतर बनी मस्जिद के बराबर एक पिरामिडीय इमारत बनवाई। जिसके लिए उस जमाने के विख्यात कारीगर चुने गए। अनगढे पत्थरों से बनी इस इमारत के दूसरे मंजिल तक किसी तरह लाट को पहुंचा दिया गया लेकिन उसे लगाने के लिए मोटे-मोटे रस्सों व 6 स्थानों पर चर्ख बनाए गए। तब कहीं जाकर अशोक स्तंभ खडा किया गया। 

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मीनारेजरी रखा था तुगलक ने नाम
कहा जाता है कि उस समय ब्राहमी लिपि को पढने के लिए बादशाह ने बहुत से पुजारियों व ब्राहमणों को बुलवाया लेकिन कोई इसे पढ ना सका। तो इसका मतलब निकाला गया कि ‘कोई व्यक्ति अपनी जगह से इसे हिला ना सकेगा, सिर्फ एक मुसलमान बादशाह होगा जिसका नाम सुल्तान फिरोज होगा।’ इस पर सुनहरी कलस होने की वजह से बादशाह ने इसका नाम ‘मीनारेजरी’ यानि सोने का स्तम्भ रखा। लेकिन इसका ऊपरी हिस्सा कब और कैसे खंडित हुआ यह नहीं बताया जा सकता। इसका उल्लेख 1611 में भारत आए विलियम फ्रेंक ने भी किया है।

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जाने क्या लिखा है लाट पर
इस लाट पर दो बडे लेख हैं। पहला अशोक का जिसमें उसकी आज्ञाएं हैं जो ईसा से तीन सौ वर्ष पूर्व की हैं और यह लेख ब्राहमी भाषा में है जोकि उस वक्त भारतवर्ष में बोली जाती थी। वहीं दूसरा लेख संस्कृत भाषा का है जोकि नागरी लिपि में विक्रमी सम्वत 1220 यानि वर्ष 1163 का है। इस पर चैहानवंशी शाकंभरी के राजा विशालदेव की विजयों का वर्णन है

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अंग्रेज इतिहासकार के हाथ लगी थी ब्राहमी लिपि की कुंजी
इतिहासकार वाई.डी. शर्मा अपनी पुस्तक दिल्ली और उसका अंचल में लिखते हैं कि जेम्स प्रिन्सेप वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने साल 1837 में पहली बार लाट पर लिखे शब्दों को पढा था। शर्मा ने बताया कि उनके हाथ ब्राहमी लिपि को पढने वाली एक कुंजी लग गई थी, जिससे यह साफ हो पाया कि इस लाट का फिरोजशाह से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि इस पर अशोक की पांच राजाज्ञा में से एक लिखी हुई है।

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