Friday, Jun 21, 2019

Buddha Purnima 2019: जब राजपाट छोड़कर धर्म की राह पर चले थे भगवान गौतम बुद्ध

  • Updated on 5/18/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। आज बैसाख मास यानी 18 मई को भगवान गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था और तब से ही इस दिन को उनके पर्व बुद्ध पूर्णिमा के तौर पर मनाया जाता है। बता दें कि, गौतम बुद्ध भगवान विष्णु के नौंवे अवतार थे, जिन्होंने सत्य का पाठ पढ़ाने के और अहिंसा को रोकने के लिए धरती पर जन्म लिया था।

गौतम बुद्ध को इसी दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और इसी दिन उनका महानिर्वाण भी हुआ था। वैसे तो बौद्ध धर्म के लिए ये बहुत ही खास पर्व है लेकिन इस पर्व को हिन्दुओं में भी मनाया जाता है। 

बौद्ध धर्म में गौतम बुद्ध को भगवान के रूप में पूजा जाता है वहीं दूसरी तरफ हिन्दुओं में गौतम बुद्ध की भगवान विष्णु के रूप पूजा की जाती है। इसलिए हिंदू भी इस त्योहार को पूरे धूमधाम के साथ मनाते हैं। इसी दिन गौतम बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे महाज्ञान की प्राप्ति हुई थी और इसी दिन उन्होंने देह का त्याग भी किया था इसलिए इसी दिन उनका निर्वाण दिवस भी होता है।

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बुद्ध पूर्णिमा तिथि

बता दें कि, हिन्दू पंचांग के अनुसार, इस साल बुद्ध पूर्णिमा 18 मई 2019 को सुबह 04 बजकर 10 मिनट से शुरू हो जाएगी। वहीं, 19 मई 2019 की सुबह 02 बजकर 41 मिनट तक पूर्णिमा समाप्त हो जाएगी।

बैसाख पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण के बचपन के मित्र सुदामा उनसे मिलने द्वारका पहुंचे थे। बातचीत के दौरान सुदामा ने कृष्ण से अपनी खराब आर्थिक स्थिती के बारे में बताया। जिसके बाद कृष्ण ने सुदामा को इसका समाधान बताते हुए सत्यविनायक उपवास पूरे मन से करने की सलाह दी। मित्र की सलाह मानते हुए गरीब सुदामा ने ये व्रत किया और उनकी आर्थिक तंगी पल में दूर हो गई।

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गौतम बुद्ध का इतिहास

भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में सिद्धार्थ गौतम के रूप में शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। वह एक वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति थे, जो शाक्य के राजकुमार थे। यह राज्य आज के आधुनिक भारत और नेपाल के किनारे एक छोटा सा क्षेत्र है। 16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने एक कन्या से विवाह किया जिसके बाद उनका एक बेटा भी हुआ। लेकिन इसके बाद उनके जीवन में एक अद्भुत मोड़ आया जब सिद्धार्थ 25 वर्ष के हुए तो वह पहली बार महल के मैदानों से बाहर निकलें।

उन्होंने दुनिया के दुखी वृद्धावस्था, बीमारी से ग्रसित और मृत्यु को प्राप्त होते हुए लोगों को देखा। जिसके बाद उन्होंने मानवता के हित के लिए अपना राज पाठ त्याने के निर्णय लिया। उनके इस निर्णय से राज घराने के लोग खुश नहीं थे। साथ ही उनके इस फैसले से उनकी पत्नी भी काफी दुखी थी। इस फैसले के बाद उन्होंने धर्म और मानवता को चुना और अपने राज पाठ का त्याग कर दिया।

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ज्ञान कि खोज के लिए अपनी पत्नी, बेटे और अपार धन को छोड़ दिया। वह वर्षों तक कई स्थानों में घूमते रहे और 25 वर्ष की उम्र में वह बोध गया में पहुंचे, जहां वह एक पीपल पेड़ के नीचे बैठे थे। और अकेले ध्यान के 40 दिनों के बाद उन्होंने निर्वाण, स्थायीता की सिद्धि प्राप्त की।

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