Wednesday, Jan 19, 2022
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इस बसंत पंचमी न करें ये गलती, नहीं तो करियर में आएगी परेशानी

  • Updated on 2/15/2021

नई दिल्ली/ रविशंकर शर्मा। बसंत पंचमी का त्यौहार माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। माघ मास को यज्ञ, दान तथा तप आदि की दृष्टि से बड़ा ही पुण्य फलदायी माना जाता है। बसंत के आगमन पर शीत से जड़त्व को प्राप्त प्रकृति पुन: चेतनता को प्राप्त होने लगती है। भगवान श्रीकृष्ण गीता जी में कहते हैं कि 'ऋतुनां कुसुमाकर:'। ऋतुओं में वसंत मैं हूं। बसंत को ऋतुराज भी कहा जाता है।

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सज्जन एवं गुणवान व्यक्तियों के स्वभाव और वाणी में माधुर्य कोमलता जैसे गुण शामिल होते हैं। उनका शालीन व्यवहार सबको आनंद प्रदान करने वाला होता है। कठोर एवं अभिमान युक्त वाणी एवं रुखे व्यवहार से न केवल दूसरों को कष्ट होता है अपितु उनकी कार्य क्षमता और स्वभाव पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

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बसंत से मिलता है ये संदेश
बसंत का आगमन यह संदेश देता है कि जिस प्रकार बसंत के आने से प्रकृति का माधुर्य मन एवं शरीर को शीतलता और अनुकूल आनंद प्रदान करता है, शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है, शीत ऋतु की जकड़न से मुक्त हुए शरीर को एक नई अनुभूति होती है, जिस प्रकार जीवात्मा तत्व ज्ञान के अभाव में त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता हुआ कर्म बंधन में जकड़ा रहता है और तत्व ज्ञान की प्राप्ति स्वरूप वह राग द्वेष आदि द्वंद्वों से रहित पुरुष संसार बंधन से मुक्त हो जाता है, ठीक वैसे ही हमें अपने जीवन में इसी प्रकार के सकारात्मक परिवर्तन हेतु सदैव तत्पर रहना चाहिए।

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मां सरस्वती से हैं बसंत रितु का संबंध
 जिस प्रकार ऋतु परिवर्तन से प्रकृति में आनंद भरने वाली बसंत ऋतु का आगमन होता है, उसी प्रकार जीवन में निरंतर उत्साह और मन की प्रसन्नता से जीवन उमंग के रंग से भर जाता है। बसंत पंचमी का संबंध विद्या एवं संगीत की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती जी के जन्म दिवस से भी है। ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा और मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है।

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मिलता है फल
एक समय भगवान श्री कृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर कहा था कि उनकी बसंत पंचमी के दिन विशेष आराधना करने वालों को ज्ञान विद्या कला में चरम उत्कर्ष प्राप्त होगी। तब सर्वप्रथम भगवान श्री कृष्ण जी ने मां सरस्वती जी की आराधना की। सृष्टि निर्माण के लिए मूल प्रकृति के पांच रूपों में से सरस्वती एक हैं, जो वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी हैं। मां सरस्वती को वागेश्वरी, भगवती, शारदा और वीणावादिनी सहित अनेक नामों से संबोधित किया जाता है। शिक्षा के प्रति जन-जन के मन-मन में अधिक उत्साह भरने के उद्देश्य से बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर मां सरस्वती जी के पूजन की परंपरा को आरंभ किया गया।

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदंडमण्डितकरा या श्वेतपद्यासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा॥

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जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुंद के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं जिनके हाथ में वीणा दंड शोभायमान हैं जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है और ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं वही सम्पूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली मां सरस्वती हमारी रक्षा करें। विदेशी आक्रांताओं से त्रस्त भारत भूमि एक सहस्त्र वर्षों तक परतंत्र रही। अमर शहीद वीर बलिदानी बाल हकीकत का इतिहास भी बसंत पंचमी से जुड़ा हुआ है। बसंत पंचमी के दिन ही 23 फरवरी 1734 को एक छोटे से बालक वीर हकीकत राय को इस्लाम स्वीकार नहीं करने के कारण सिर को धड़ से अलग कर दिया गया था। वैदिक हिन्दू सनातन धर्म की रक्षा हेतु प्राणों की आहुति देने वाले वीर हकीकत अमर हो गए।

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गौरक्षा, स्वदेशी एवं नारी सशक्तिकरण के प्रखर समर्थक सतगुरु राम सिंह जी का जन्म दिवस भी बसंत पंचमी का है। ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने के  लिए उन्होंने कई प्रभावशाली आंदोलन चलाए। कवि, उपन्यासकार एवं कहानी लेखक सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का जन्म भी बसंत पंचमी के दिन, 21 फरवरी, 1899 को बंगाल की महिषादल रियासत के जिला मेदिनीपुर में हुआ था। बसंत पंचमी को पीले रंग से भी जोड़ा जाता है। यह रंग समृद्धि प्रकाश और ऊर्जा का परिचायक है। भगवान श्री हरि विष्णु भी पीत रंग के वस्त्र धारण करते हैं इसलिए इस रंग को अति पवित्र माना गया है। हर मंगल कार्य में इस रंग का प्रयोग होता है। बसंत पंचमी पर पीले रंग के पकवान बनाने और पतंगें उड़ाने की परंपरा है।

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बसंत पंचमी का पर्व राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता आपसी सौहार्द, देश की उन्नति एवं प्रगति को समर्पित है। धार्मिक सामाजिक ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बसंत पंचमी का पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। सभी सम्प्रदायों के लोग अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार इस पर्व को श्रद्धा एवं उत्साह से मनाते हैं। यही भारतीय संस्कृति का सौंदर्य है कि अपनी-अपनी परंपराओं से जुड़ा हर भारतीय जनमानस इन पर्वों को मनाता है। ये पर्व हमारी राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। इन्हें मना कर न केवल हम अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं अपितु आज के भागदौड़ के जीवन में हमें कुछ क्षणों के लिए अपनी गौरवशाली भारतीय संस्कृति के पर्वों के महान इतिहास से जुडऩे का हमें सुअवसर प्राप्त होता है। 

जिस प्रकार ऋतु परिवर्तन से प्रकृति में आनंद भरने वाली बसंत ऋतु का आगमन होता है, उसी प्रकार जीवन में निरंतर उत्साह और मन की प्रसन्नता से जीवन उमंग के रंग से भर जाता है।

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