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देवता और किन्नर रात को इस जगह करते हैं बादाम-अखरोट की दावत

  • Updated on 7/4/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। उत्तर प्रदेश से विभाजित हो कर बने राज्य उत्तराखंड को देवभूमि या देवलोक कहा जाता है। इसके पीछे कारण है कि वहां कई सिद्ध पीठ, पवित्र गंगा और भगवान के कई दर्शन स्थल हैं। उत्तराखंड के सभी सिद्ध पीठों में हजारों भक्त दूर-दूर से दर्शन के लिए आते हैं।

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उत्तराखंड के कुछ सिद्ध पीठ ऐसे भी हैं जहां पहुंचना आसान नहीं है। कुछ सिद्ध पीठ पर पहुंचना आसान है। उन तक पहुंचने के लिए पक्की सड़कें हैं जिनपर कार चलाना आसान है। हालांकि कई सिद्ध पीठ ऐसे हैं जहां कोई सड़क नहीं है। जहां पहुंचने के लिए केवल मिट्टी भरे रास्ते या पहाड़ों की चढ़ाई है। ऐसे स्थलों पर कुछ ही भक्त दर्शन के लिए जाते हैं।

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ऐसा ही एक स्थल है सीताबनी जो की उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित है। हिंदू मान्यता के अनुसार इस स्थल की यात्रा आत्मिक शांति के लिए की जाती है। इस स्थल पर पहुंचने के लिए 42 किमी जंगल की यात्रा करनी पड़ती है। हालांकि इस यात्रा में ऐसे कई दृश्य देखने को मिलेंगे जो बड़े शहरों में और आम राज्यों में देखने को नहीं मिलेंगे। लुभावने दृश्य देखने के साथ-साथ इन जंगलों में जंगली हाथी, शेर, रीछ के अलावा कई और जंगली जानवरों का डर भी रहता है। 

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सीताबनी दर्शन के लिए जाना हो तो दो रास्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है। पहला रास्ता नैनीताल जिले के रामनगर के घने जंगलों से है। इन जंगलों के बीच से 33 किमी का रास्ता तय करना होता है। इसी रास्ते पर प्रकृति के लुभावने दृश्य और जंगली जानवर दोनों मिलेंगे।

दूसरा रास्ता एक पक्की सड़क है। ये रामनगर से काला ढूंगी की तरफ 13 किमी दूर बैल पड़ाव तक है। वहां से आगे के लिए पक्की सड़क 7 किमी दूर पवलगढ़ तक है। इसके बाद 10 किमी का रास्ता पवलगढ़ से घने जंगलों को पार करके है। इस जंगल को पार करने वाला रास्ता सीधा सीताबनी पहुंचा देता है। इस जंगल के रास्ते पर भी कई जंगली जानवर मिल जाते हैं। 

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सीताबनी में मां सीता का मंदिर है। इस मंदिर में मां सीता की संगमरमर की मूर्ति है। इसमें खास ये है कि इस मूर्ति में मां सीता की गोद में लव-कुश हैं। कहा जाता है कि मां सीता की इस तरह की प्रतिमा किसी और मंदिर में देखने को नहीं मिलेगी। मंदिर के निर्माण को देखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि ये मंदिर सालों पुराना है। मंदिर के बाहर एक झरना है जिसमें पानी के लिए तीन पाइप लगा दिए गए हैं।

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मान्यता है कि इस इलाके में महाभारतकाल के पांडवों ने भी अज्ञातवास किया था। वहीं इस मंदिर से एक किलोमीटर की दूरी पर ऊपर एक पहाड़ी पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम है। वहां पैदल जा सकते हैं। इस आश्रम में सालों पुराने शंख और यज्ञवेदी मिलेंगे।

कहा तो ये भी जाता है कि सीता मां धरती में इसी जगह समाई थीं। इसलिए वाल्मीकि आश्रम में होने वाली दूवड़ा घास को सीता मां के बालों से जोड़ा जाता है। 

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बता दें कि इस इलाके में टेकनोलॉजी बिल्कुल काम नहीं करती है। यहां की शांति और शहरों की भागदौड़ से दूर रहने के साधन ही लोगों को इस इलाके में खींच लाते हैं। साथ ही यहां से जुड़ी मान्यता है कि रात को यहां देवता/किन्नर सशरीर आते हैं और उनकी बादाम-अखरोट की दावतें होती हैं। 

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