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उत्तराखण्ड स्थित इस मंदिर में आज भी होते हैं मां काली के दिव्य दर्शन

  • Updated on 6/8/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। दुष्टों का संहार करने वाली मां भगवती के दर्शन से मात्र सारे पाप धुल जाते हैं। मां काली अच्छे लोगों को फल व बूरे लोगों को परिणामस्वरूप दण्ड देती है। ऐसा माना जाता है कि आज भी मां काली अपने भक्तों पर अपनी दृष्टि बनाई हुई हैं। मां काली के वैसे तो अनेकों मंदिर हैं लेकिन एक मंदिर ऐसा भी है जहां मां काली स्वंय निवास करती हैं।

जी हां, हम बात कर रहे हैं उत्तराखण्ड में स्थित कालीमठ मंदिर की। इस मंदिर में जितनी मान्यता हैं वहीं इसका रहस्त उतना ही पूराना है। कहा जाता है कि आज भी इस मंदिर में मां काली के होने का ऐहसास होता है। देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के केदारनाथ की चोटियों से घिरा हिमालय में सरस्वती नदी के किनारे स्थित प्रसिद्ध शक्ति सिद्धपीठ श्री कालीमठ मंदिर स्थित है। यह मंदिर समुन्द्रतल से 1463 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

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कालीमठ से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

बता दें कि, कि ये उत्तराखण्ड के कई मंदिरों में से सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर की खास बात यह है कि इस मंदिर में देवी की मूर्ती की नहीं बल्कि एक कुंड की पूजा कि जाती है। यह कुंड रजतपट श्री यन्त्र से ढका हुआ है। इस मंदिर में तंत्र विद्याओं का वास है और मंदिर को पूरे साल में शारदे नवरात्री में अष्टमी के दिन खोला जाता है, जहां अष्टमी की मध्यरात्रि के दिन कुछ ही मुख्य पूजारी रहते हैं जो इस कुंड कि पूजा करते हैं। साथ ही इस दिन दिव्य शक्ति के लिए मंदिर को शारदे नवरात्रि के दिन खोला जाता है। स्कंदपूराण के अंतर्गत केदारनाथ के 62वें अध्याय में इस मंदिर का उल्लेख किया गया है।

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कालीमठ में तीन अलग-अलग भव्य मंदिर है जहां मां काली के साथ माता लक्षमी और मां सरस्वती की पूजा की जाती है। कालीमठ मंदिर में 8 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित एक दिव्य चट्टान भी है जहां आज भी मां काली के चरण पादुका के निशान मौजूद हैं और इस चट्टान को काली शिला के नाम से भी जाना जाता है। मां काली के पैरों के निशान से जुड़ी एक रोचक बात है ऐसा कहा जाता है कि मां दुर्गा शुम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज दानव का संहार करने के लिए कालीशीला में 12 वर्ष की बालिका रूप में प्रकट हुई थी।

कालीशीला में देवी देवता के 64 यन्त्र है, मां दुर्गा को इन्ही 64 यंत्रो से शक्ति प्रदान हुई थी। कहते है कि इस स्थान पर 64 योगनिया विचरण करती रहती है। मान्यता है कि इस स्थान पर शुंभ-निशुंभ दानवों से तंग आकर सभी देवी देवताओं ने मां भगवती की तपस्या कि थी जिसके बाद मां काली प्रकट हुई और असुरों के आतंक के बारे में सुनकर मां का शरीर क्रोध से काला पड़ गया और उन्होंने विकराल (भयावह) रूप धारण कर युद्ध में दोनों दानवों का वध कर दिया था।

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