Friday, Jun 21, 2019

लखीमपुर में बने इस मंदिर का पौराणिक कथाओं में है जिक्र, लोग आज भी हैं इस मंदिर से अनभिज्ञ

  • Updated on 5/16/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। आपने भगवान शिव के कई मंदिर देखे होंगे और उनके दर्शन भी किए होंगे। भगवान शिव वैसे तो हर जगह विराजमान है और लोग इस बात से अवगत भी हैं। शिव भक्तों ने केदारनाथ धाम, बदरीनाथ धाम और अमरनाथ धाम के दर्शन तो जरूर किए होंगे लेकिन शिव भक्त अभी भी शिव की महिमा को और करीब से नहीं जान पाएं हैं। वो इसलिए क्योंकि भगवान शिव का उत्तराखंड के अलावा उत्तरप्रदेश में भी एक मंदिर है जिनके बारे में शायद ही बहुत कम लोग जानते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के लखीमपुरखिरी में स्थित गोला गोकर्णनाथ मंदिर की। इस मंदिर को लोगों शायद सुनने में आम या साधारण मंदिर समझ रहे होंगे। लेकिन इस मंदिर का उल्लेख पौराणिक कथाओं में भी किया गया है। बता दें कि, गोला गोकर्णनाथ शिव मंदिर रामायण काल से माना जाता है। 

प्राचीन समय से चले आ रहा है भगवान शिव का यह मंदिर

छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध गोला गोकर्णनाथ मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग लंका के राजा रावण द्वारा स्थापित किया गया था। गाय के आकार का शिवलिंग होने के कारण इसका नाम गोकर्णनाथ पड़ा। बता दें कि, गोला गोकर्णनाथ मंदिर के समीप एक पक्का सरोवर है जिसे गोकर्ण तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। 

इसके पीछे छिपी पौराणिक कथा

त्रेता युग में राम और रावण के बीच होने वाले युद्ध के समय रावण ने अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया था जिससे भगवान शिव खुश होकर रावण को वरदान दे दें और वे युद्ध जीत जाएं। शिवजी ने शिवलिंग का आकार लेकर रावण को लंका में शिवलिंग स्थापित करने का संकेट दिया था। इसके लिए भगवान शिव ने एक शर्त भी रखी थी जिसमें उन्होंने कहा था कि शिवलिंग को बीच में कहीं पर भी नीचे नहीं रखना है।

लेकिन रास्ते में रावण को पेशाब लगी तो उसने एक गड़रिये को शिवलिंग पकड़ने को कहा। कहते हैं कि जब रावण ने शिवलिंग एक गड़रिये को पकड़ने को दिया था तो भगवान शिव ने अपना वजन बढ़ा दिया था और यही वजह थी कि गड़रिये वजन को सहन नहीं कर सका और उसने शिवलिंग को नीचे रख दिया। रावण को भगवान शिव की चालांकी समझ में आ गई और वह बहुत क्रोधित हुआ। रावण समझ गया कि शिवजी लंका नहीं जाना चाहते ताकि राम युद्ध जीत सकें। क्रोधित रावण ने अपने अंगूठे से शिवलिंग को दबा दिया जिससे उसमें गाय के कान (गौ-कर्ण) जैसा निशान बन गया। गड़रिये को मारने के लिए रावण ने उसका पीछा किया। अपनी जान बचाने के लिए भागते समय वह एक कुएं में गिर कर मर गया।

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