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दिन में 2 बार जलमग्न रहता है ये मंदिर, उसके बाद भक्तों को देते हैं ये दर्शन

  • Updated on 5/18/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। वैसे तो भारत के कई अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक स्थल मौजुद हैं और बहुत कम लोग हैं जो इन धार्मिक स्थलों के बारे में जानते हैं। आज हम बात करने जा रहे हैं एक ऐसे मंदिर कि जिसमें साक्षात भगवान के दर्शन देखने को मिलते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं स्तंभेश्वर महादेव मंदिर की जहां दिन में दो बार भगवान शिव जलमग्न रहते हैं और कुछ देर बाद वो उसी जगह पर लोगों को दर्शन देने के लिए प्रकट हो जाते हैं। भगवान शिव के भारत में वैसे तो अनेको मंदिर हैं जिनमें अधिकतर लोग दर्शन भी कर चुके हैं लेकिन बहुत लोग ऐसे हैं जिन्हें स्तंभेश्वर महादेव मंदिर के बारे में नहीं पता है।

इसलिए आज हम अपनी इस खबर के माध्यम से आपको इस मंदिर के कुछ रोचक तथ्यों के बारे में बताएंगे जिसको सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे। गुजरात के वड़ोदरा में स्थित ये मंदिर करीब 85 किलोमीटर दूर भरुच जिले की जम्बूसर तहसील गांव ‘कावी’ में है। बता दें कि, यहां के स्थानीय लोगों के लिए ये मंदिर काफी आम बात है लेकिन दूर-दूर से आने वाले लोगों और पर्यटकों के लिए ये मंदिर किसी रोमांचकारी अनुभव से कम नहीं होता है।

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भगवान शिव का ये मंदिर लोगों को दिखने में एक आम मंदिर जैसा दिखेगा लेकिन इस मंदिर कि खासीयत से आपको इसके अंदर छिपा चमत्कार का अनुभव होगा। समुद्र में ज्वारभाटा आने से ये मंदिर दो बार जलमग्न रहता है। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है जिसके बाद लोग मंदिर के दर्शन नहीं कर सकते हैं। दरअसल, यह प्रक्रिया पौराणिक कथाओं से चली आ रही है। मंदिर अरब सागर के बीच कैम्बे तट पर स्थित है। इस तीर्थ का उल्लेख ‘श्री महाशिवपुराण’ में रुद्र संहिता भाग-2, अध्याय 11, पेज नं. 358 में मिलता है।

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पौराणिक कथाओं में इसका उल्लेख 

करीब 200 वर्ष पूर्व इस मंदिर की स्थापना हुई थी जब राक्षक ताड़कासुर ने अपनी कठोर तपस्या से शिव को प्रसन्न किया था। भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए तो उसने वरदान मांगा कि जिसमें उसने मांगा कि उसे कोई न मार पाए और वो अमर हो जाए। इस वरदान को मना करते हुए भगवान शिव ने ताड़कासुर से दुसरा वरदान मांगने के लिए कहा जिसके बाद उसने सिर्फ शिव जी का पुत्र ही मार सके और वह भी छह दिन की आयु वाला ऐसा वरदान मांगा था। शिव ने उसे यह वरदान दे दिया था। वरदान मिलते ही ताड़कासुर ने हाहाकार मचाना शुरू कर दिया। देवताओं और ऋषि-मुनियों को आतंकित कर दिया। अंतत: देवता महादेव की शरण में पहुंचे।

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शिव-शक्ति से श्वेत पर्वत के कुंड में उत्पन्न हुए शिव पुत्र कार्तिकेय के 6 मस्तिष्क, चार आंख, बारह हाथ थे। कार्तिकेय ने ही मात्र 6 दिन की आयु में ताड़कासुर का वध कर दिया था। इसके बाद जब कार्तिकेय को पता चला कि ताड़कासुर भगवान शिव का भक्त था, तो वे काफी व्यथित हुए। फिर भगवान विष्णु ने कार्तिकेय से कहा कि वे वधस्थल यानि कि जहां ताड़कासुर का वध हुआ था वो वहां पर शिवालय बनवा दें। इससे उनका मन शांत होगा। भगवान कार्तिकेय ने ऐसा ही किया। फिर सभी देवताओं ने मिलकर महिसागर संगम तीर्थ पर विश्वनंदक स्तंभ की स्थापना की, जिसे आज स्तंभेश्वर तीर्थ के नाम से जाना जाता है।

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