जगन्नाथ यात्रा का क्या है बारिश से कनेक्शन? जानिए 6 अनसुनी बातें...

  • Updated on 7/14/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। हिंदू धर्म में कई त्यौहारों पर उत्सव होते हैं। लेकिन कई उत्सव ऐसे भी हैं जो खुद त्यौहार में बदल जाते हैं। ऐसा ही एक उत्सव है ओडिशा के पुरी में निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा। ये यात्रा 500 सालों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। इसके बारे में स्कन्द पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी लिखा है। आज से पुरी की जगन्नाथ यात्रा शुरू हो गई है।

इस यात्रा का मुख्य आकर्षण होता है हजारों लोगों द्वारा पारंपरिक वाद्ययंत्रों की आवाज के बीच बड़े-बड़े रथों को मोटे-मोटे रस्सों से खींचना। इसमें भगवान जगन्नाथ के साथ-साथ भाई बलभद्र जी और बहन सुभग्रा जी का रथ होता है। 

भगवान और भक्तों का अनोखा मिलन है जगन्नाथ रथ यात्रा, जानिए पूरी कथा

मान्यता है कि इन रथों को खींचने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। ये यात्रा 9 दिन तक चलती है। यात्रा से जुड़ी कई ऐसी मान्यताएं और बातें हैं जिन्हें शायद ही कोई जानता हो। आज हम आपको भगवान जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा से जुड़ी कुछ अनोखी और अनजानी बातें बताएंगे...

रथ की लकड़ी

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इस यात्रा के लिए तीन रथ तैयार किए जाते हैं। एक रथ में भगवान जगन्नाथ सवार होते हैं, दूसरे में उनके भाई बलभद्र और तीसरे में उनकी बहन सुभद्रा। ये तीनों रथ बेहद विशाल होते हैं। इन रथों को नारियल की लकड़ी से तैयार किया जाता है। इसके पीछे कारण है कि नारियल की लकड़ी हल्की होती है जिससे इन रथों को खींचना थोड़ा आसान हो जाता है। वहीं तीनों रथों में भगवान जगन्नाथ का रथ सबसे बड़ा होता है। ये लाल और पीले रंग का होता है। ये रथ यात्रा में सबसे पीछे चलता है।

रथ पर घोड़े

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यात्रा में तीन रथ होते हैं। इन रथों को श्रद्धालु रस्सों की मदद से खींचते हैं और पूरे नगर में घूमाते हैं। लेकिन फिर भी इन रथों पर घोड़े बनाए जाते हैं। इन घोड़ों को बनाने का कारण है रथ को पूरा करना। एक रथ बिना घोड़ों के पूरा नहीं होता इसलिए इन रथों पर भी लकड़ी के घोड़े बनाए जाते हैं। हालांकि इन घोड़ों की एक और खासियत है। दरअसल तीनों रथों पर बने घोड़ों का रंग अलग रखा जाता है। सबसे बड़े रथ यानि भगवान जगन्नाथ के रथ के घोड़ों का रंग सफेद होता है। वहीं उनकी बहन सुभद्रा जी के रथ के घोड़ों का रंग भूरा और भाई बलभद्र के रथ के घोड़ों का रंग नीला होता है।

सफाई

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रथयात्रा की शुरुआत सोने के हत्थे वाली झाड़ू से भगवान जगन्नाथ जी के रथ के सामने सफाई करने से होती है। सालों से परंपरा है कि राजाओं के वंशज पारंपरिक ढंग से ये झाड़ू लगाते हैं। हालांकि अब देश में राजा शासन न होने से और देश में कोई राजा न होने से अब पुरी में खास तौर पर एक अधिकारिक राजा बनाया जाता है। ये अधिकारिक राजा यात्रा शुरू होने से पहले मंदिर के बाहर का रास्ता सोने से बने पोछे से साफ करता है।

पोड़ा पीठा

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इस यात्रा में एक रुकावट आती है। इस रुकावट का कारण है भगवान। दरअसल भगवान जग्गनाथ रास्ते में एक बार अपना पसंदीदा व्यंजन पोड़ा पीठा खाने के लिए रुकते हैं। पोड़ा पीठा ओडिशा में बनने वाली एक खास मीठी डिश है।

चलते-फिरते भगवान

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इस रथ यात्रा में हजारों की संख्या में लोग मौजूद होते हैं। ये केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर का अपने आप में इकलौता ऐसा उत्सव है जिसमें भगवान खुद घूमने निकलते हैं। इस उत्सव में भगवान रथ पर सवार होकर पूरे नगर का भ्रमण करते हैं और अंत में अपनी मौसी के घर, गुंदेचा मंदिर पहुंचते हैं।

बारिश

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लोग अक्सर कुछ बातों को अंधविश्वास मान लेते हैं लेकिन कई बातें अपने आप में एक सच होती हैं। ऐसी ही एक सच्चाई है कि भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के दिन बारिश जरूर होती है। सालों से चली आ रही इस यात्रा में आज तक कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि यात्रा के दिन बारिश न हुई हो।

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