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भगवान शिव का यह स्वरूप दर्शाता है, सृष्टि के सृजन से उसके अंत तक का पूरा सार

  • Updated on 5/19/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। भगवान शिव (Bhagwan Shiv) वैसे तो देवो के देव महादेव हैं और ये साथ में भोले भी हैं इसलिए इन्हें भोलेनाथ (Bholenath) कहा जाता है। शिव की महिमा अपरंमपार इसलिए जब भी कोई सच्चे मन से उनका ध्यान करता है उससे वह प्रसन्न हो जाते हैं और प्रसन्न होने के बाद वह वरदान भी दे देते हैं। शिव जितने भोले हैं उतना ही उनके अंदर क्रोध भी हैं और शिव का यही क्रोध उन्हें रोद्र रूप धारण करने पर मजबूर कर देता है और उनके इसी स्वरूप को भगवान रूद्र (rudra) के नाम से भी जाना जाता है। 

भगवान शिव का रूद्र अवतार उनके सबसे भयावय स्वरूप में से एक है। आपने भगवान शिव के अनेको स्वरूप के बारे में तो जरूर सुना होगा लेकिन क्या आपने भगवान शिव के उस स्वरूप के बारे में सुना है जो सृष्टि के सृजन से उसके अंत तक का वर्णन करता है। अगर नहीं तो आज हम आपको अपनी इस खबर में बताएंगे। वैसे तो भगवान शिव के 19 स्वरूप है जिनका वर्णन पौराणिक कथाओं में किया गया है। लेकिन जो उनके सबसे अहम स्वरूप हैं वो हैं तांडव स्वरूप जो शिव के तांडव को दर्शाता है।

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क्या है शिव के नटराज स्वरूप का अर्थ

शिव के तांडव के दो स्वरूप हैं। पहला उनका क्रोध का जिन्हें प्रलयकारी रौद्र तांडव कहा जाता है और दूसरा आनंद प्रदान करने वाला जिसे आनंद तांडव स्वरूप कहा जाता है। लेकिन ज्यादातर लोग शिव के तांडव शब्द को उनके क्रोध का स्त्रोत मानते हैं। रौद्र तांडव करने वाले शिव को रूद्र कहा जाता हैं, वहीं दूसरी तरफ आनंद तांडव करने वाले शिव को नटराज कहा जाता है। भगवान शिव के नटराज स्वरूप का अर्थ है नट यानी नृत्य और राज मतलब राजा यानी नृत्य का राजा। उन्हें नटराज स्वरूप इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस स्वरूप में शिव नृत्य अवस्था में रहते हैं। 

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बता दें कि, नटराज शिव की सबसे प्रसिद्ध प्राचीन मूर्ति है जिसकी चार भुजाएं हैं, इसमें वे चारों ओर अग्नि से घिरे हुए हैं। उनके एक पैर से उन्होंने एक बौने(अकश्मा) को दबा रखा है, और उनका दूसरा पैर नृत्य मुद्रा में ऊपर की ओर उठा हुआ है। उन्होंने अपने पहले दाहिने हाथ में डमरू पकड़ा हुआ है और डमरू की आवाज सृजन का प्रतीक माना जाता है। ऊपर की ओर उठे हुए उनके दूसरे हाथ में अग्नि है यहां अग्नि को विनाश का प्रतीक माना जाता है।

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अर्थात, शिव ही सृजनकृता हैं और वो ही विनाश कारक भी हैं। उनके एक हाथ से सृष्टि का सृजन होता हैं तथा दूसरे हाथ से वह सृष्टि का विनाश करते हैं। उनका दूसरा दाहिना हाथ अभय (या आशीष) मुद्रा में उठा हुआ है जो कि हमें सभी बुराईयों से बचाता है। बता दें कि, प्राचीन आचार्यों के अनुसार शिव के आनंद तांडव से ही सृष्टि अस्तित्व में आती है तथा उनके रौद्र तांडव में सृष्टि का विनाश हो जाता है। शिव का नटराज स्वरूप भी उनके अन्य स्वरूपों की ही भांति मनमोहक तथा उसकी अनेक व्याख्याएं हैं।
 

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