Monday, Dec 16, 2019
why yamraj fears to heard the mahamrityunjay mantra

जानिए, महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने वालों से यमराज भी हो जाते हैं भयभीत

  • Updated on 8/14/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। युं तो इस दुनिया में कोई भी अमर नहीं है और जो इस दुनिया में आया है उसे एक ना एक दिन जाना जरुर पड़ता है। लेकिन भगवान शिव (Lord Shiva) को समर्पित महामृत्युंजय मंत्र (Mahamritiyunjay mantra) एकमात्र ऐसा मंत्र है जिससे काल भी प्राण हरने से घबराता है। इस मंत्र को अमृत मंत्र भी कहा जाता है, वो इसलिए क्योंकि यह मंत्र स्वंय देवो के देव महादेव को प्रसन्न करता है और जिस मंत्र से भगवान शिव प्रसन्न हो तो उसका बाल भी बाका होना असंभव है। कहते हैं जो भी इस मंत्र का सच्चे मन से जाप करता है वो अकाल मृत्यु से बच सकता है। बता दें कि, इस मंत्र का वर्णन स्कंद पुराण और शिव पुराण में भी मिलता है। महामृत्युंजय मंत्र का मंत्र वैसे तो हर इंसान के भगवान शिव का वरदान है लेकिन इसी मंत्र से यमराज भयभीत हो जाते है। आइए जानते हैं की क्या है इसके पीछे छिपी कहानी का सच।

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नीसंतान से दुखी होकर मृकण्ड ऋषि ने की थी भगवान शिव की तपस्या

पौराणिक कथाओं के मुताबिक मृकण्ड ऋषि (Mrakand Rishi) के पुत्र ने भगवान शिव के इस मंत्र महामृत्युंजय की रचना कि थी। ऐसा कहा जाता है कि मृकण्ड ऋषि नीसंतान होने से काफी दुखी थे और अपने इस दुख का निवारण करने के लिए उन्होंने सोचा की इस दुख से अब केवल देवों के देव महादेव ही बचा सकते हैं। इसके बाद मृकण्ड ऋषि भगवान शिव का ध्यान करने में जुट गए। गहन तपस्या और शिव की भक्ति में लीन होकर मृकण्ड ऋषि ने कठोर तप किया, जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें दर्शन दिए। यहां महादेव ने मृकण्ड ऋषि को उनकी तपस्या से खुश होकर उन्हें इच्छा मांगने के लिए कहा।

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भगवान शिव ने संतान का सुख देने के साथ दी एक चेतावनी

मृकण्ड ऋषि ने भगवान शिव से इच्छा मांगते हुए कहा कि, उन्हें नीसंतान के दोष से मुक्त करा दें और एक संतान की प्राप्ति हो। भगवान शिव ने मृकण्ड ऋषि को यह वरदान तो दे दिया लेकिन साथ ही उन्होंने एक चेतावनी भी दी जिसमें उन्होंने कहा कि, पुत्र की प्राप्ति से खुश होने के साथ-साथ एक बड़े दुख का भी सामना करना पड़ेगा। महादेव के इस कथन को सुनकर मृकण्ड ऋषि की प्रसन्न चिंतीत में परिवर्तित हो गई। कुछ समय बाद मृकण्ड ऋषि के घर एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम मार्कण्डेय पड़ा। मार्कण्डेय ऋषि के जन्म के साथ ही कई महाऋषियों ने उनको देखा जिसके बाद उन्होंने मृकण्ड ऋषि और उनकी पत्नी मरन्धती को बताया की यह पुत्र अल्पायु है इतना सुनने के बाद मृकण्ड ऋषि और उनकी पत्नी मरन्धती की प्रसन्नता दुख में परिवर्तित हो गई।

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मृकण्ड ऋषि ने पुत्र को भगवान शिव की भक्ति का दिया सुझाव

जब मार्कण्डेय ऋषि पड़ने और खेलने लायक थोड़े बड़े हुए तो उनके माता पिता ने उनकी अल्पायु होने की बात बताई। इसके साथ ही मृकण्ड ऋषि ने अपने पुत्र मार्कण्डेय को महादेव की भक्ति का सुझाव भी दिया जिसमें उन्होंने बताया कि अगर वे महादेव की भक्ति में लीन होकर उनकी घोर तपस्या करेंगे तो वह उनको इस अभिशाप से मुक्त करा देंगे। पिता की बात को आज्ञा मानकर मार्कण्डेय ऋषि (Markanday Rishi) ने भगवान शिव की घोर तपस्या शुरु कर दी। वह रात-दिन महादेव की घोर तपस्या करते रहते। तपस्या में लीन होने के चलते कई बरस बीत गए जिसके बाद वो दिन आखिर आ ही गया जब मार्कण्डेय ऋषि 12 वर्ष के होने वाले थे और यमराज को इसी दिन का इंतजार था। जब मार्कण्डेय ऋषि 12 वर्ष के हुए तो यमराज ने उन्हें लाने के लिए अपने यम दुतों को भेजा।

प्राणों को हरने के लिए यमराज ने भेजे थे अपने यम दूत

मार्कण्डेय ऋषि को लाने के लिए गए जब यम दुतों (Yamdut) ने उनको भगवान शिव की भक्ति करते देखी तो उन्होंने थोड़ा इंतजार किया। महादेव की भक्ति में लीन मार्कण्डेय ऋषि को कुछ ज्ञात नहीं था जिसके बाद यम दुतों का सर्ब टुटने लगा। मार्कण्डेय ऋषि को भक्ति में लीन देखकर यम दुत वहां से चले गए जिसके बाद उन्होंने यह बात यमराज को बताई और इस बात को सुनने के बाद यमराज ने तय कर लिया की वह स्वंय उन्हें लेने जाएंगे। यमराज के मंदिर पहुंचते मार्कण्डेय ऋषि उनका सुडौल शरीर, आंखों में रक्त और हाथों में पाश देखकर घबरा गए। यह देखकर मार्कण्डेय ऋषि रोने लगे जिसके बाद उन्होंने शिवलिंग को गले लगा लिया। जब यमराज उन्हें जबरदस्ती ले जाने लगे तो भगवान शिव को क्रोध आ गया।

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भगवान शिव ने दिया मार्कण्डेय ऋषि को दीर्घायु का वरदान

भगवान शिव के प्रकट होते ही उन्होंने यमराज से कहा कि, भक्त मेरी भक्ति में लीन होने वाले भक्त है तो मृत्युदंड देने का विचार भी आपको कैसे आया। इसका जवाब देते हुए यमराज (Yamraj) बोले की हे प्रभु मै तो बस आपके द्वारा दिए गए कार्य और अपने कर्तव्य को पूरा कर आपकी आज्ञा का पालन कर रहा हुं। इसके बाद भगवान शिव ने कहा कि मैने मार्कण्डेय ऋषि को दीर्घायु का वरदान दिया है अब तुम इसे अपने साथ नहीं ले जा सकते। भगवान शिव की बात को सुनने के बाद यमराज ने कहा कि हे भोलेनाथ आज से जो भी भक्त मार्कण्डेय ऋषि द्वारा रचित महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करेगा उनके प्राणो को मैं नहीं हरुंगा।

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