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‘ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने का भारत पर असर’

  • Updated on 12/29/2020

काफी देर तक ‘ब्रैग्जिट’ का मामला लटकता रहा है और इसे लेकर काफी तनाव भी पैदा ए, यहां तक कि इंगलैंड (England) के 2 प्रधानमंत्रियों डेविड कैमरून तथा थेरेसा मे का इस मुद्दे पर त्यागपत्र भी हो गया परंतु विश्व के सबसे बड़े व्यापार संगठन यानी ‘यूरोपीय संघ’ (ई.यू.) से ब्रिटेन के अलग होने के लिए तय समय सीमा समाप्त होने से ठीक एक सप्ताह पहले वीरवार को ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के बीच ब्रैग्जिट ट्रेड डील को अंतिम रूप दे दिया गया। 

ब्रिटेन के मंत्री माइकल गोव का कहना है कि पोस्ट ब्रैग्जिट ट्रेड डील से इंगलैंड और यूरोपीय संघ के बीच ‘विशेष रिश्तों’ की शुरूआत होगी। उनका कहना है कि इस समझौते से राजनीति में आई उस कड़वाहट का भी अंत होगा जो 2016 के जनमत संग्रह के बाद पैदा हुई थी। उन्होंने लिखा ‘‘अब हम इतिहास में एक नए और अधिक आशापूर्ण अध्याय की शुरुआत कर सकेंगे’’ अब अंतिम चरण में ब्रिटेन की संसद 30 दिसम्बर को यूरोपीय संघ के साथ व्यापारिक समझौते को मंजूरी देने के लिए मतदान करेगी। 

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अंदाजा है कि भारत को ‘ब्रैग्जिट’ समझौते से शुद्ध लाभ होगा क्योंकि यू.के. तथा यूरोपीय बाजारों के बीच अब पेशेवरों की मुक्त आवाजाही पर अंकुश से एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यानि भारत से सेवाओं के निर्यात में लाभ होने की सम्भावना है।‘ब्रैग्जिट’ व्यापार तथा सुरक्षा सौदे के अनुसार यू.के. व यूरोपीय संघ के नागरिकों को अब काम, अध्ययन व व्यापार शुरू करने या पहले की तरह रहने की अप्रतिबंधित स्वतंत्रता नहीं होगी। हालांकि दोनों के लिए एक-दूसरे के बाजारों तक शुल्क-मुक्त और कोटा-मुक्त पहुंच बनी रहेगी। 

‘फैडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन’ के महानिदेशक अजय सहाय के अनुसार : ‘‘बेशक ऐसा कहना थोड़ा स्वार्थपूर्ण लगे लेकिन अगर समझौते के बिना ब्रैग्जिट होता तो भारत को कुछ क्षेत्रों में बेहतर बाजार पहुंच प्राप्त होती। वैसे मौजूदा स्थिति भी इसलिए अच्छी है क्योंकि अब यूरोपीय संघ और यू.के. के बाजारों में कारोबार कर रहे भारतीय निर्यातकों के लिए अलग से दोनों बाजारों के लिए विभिन्न मानकों और पंजीकरणों को पूरा करने की चुनौती नहीं होगी।’’ 

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वैसे भारत को अधिक लाभ सेवा क्षेत्र में होने की सम्भावना है क्योंकि ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के बीच द्विपक्षीय सेवाओं का व्यापार काफी होता रहा है। ऐसे में आई.टी., आर.एंड डी., वास्तुकला और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में हमें दोनों बाजारों विशेष रूप से यू.के. में लाभ हो सकता है। उदाहरण के लिए आई.टी. क्षेत्र में यूरोपीय संघ में पोलैंड भारत का प्रतियोगी है। अब यू.के. में पोलैंड के आई.टी. पेशेवरों की मुक्त आवाजाही पर प्रतिबंध लगने से भारत के लिए लाभ की स्थिति होगी। हालांकि, जिन भारतीय कम्पनियों ने दोनों बाजारों में काम करने के लिए यू.के. या यूरोपीय संघ में अपने मुख्यालय स्थापित किए हैं, उन्हें कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। 

‘ब्रैग्जिट’ के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए यू.के. आधारित बड़ी और छोटी फर्मों के एक सर्वेक्षण में 100 प्रतिशत ने माना कि ‘ब्रैग्जिट’ भारत में उनके व्यवसायों के बढऩे का कारण बनेगा। सर्वेक्षण के अनुसार बहुमत (69 प्रतिशत) के लिए इसका कोई प्रभाव नहीं होगा, 31 प्रतिशत के लिए ‘ब्रैग्जिट’ ने उनकी कम्पनियों को भारत के साथ अधिक व्यापार करने की योजना बनाने के लिए प्रेरित किया है जो उत्साहजनक है। कुल मिलाकर ‘ब्रैग्जिट’ भारत में यू.के. की फर्मों के व्यापार पर अनुकूल प्रभाव डालेगा। 

भारत और यूरोपीय संघ (यू.के. सहित) के बीच एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते पर बातचीत 2013 में रद्द हो गई थी क्योंकि दोनों पक्ष आपसी मतभेदों को दूर करने में विफल रहे थे। यू.के. के साथ व्यापार समझौता अब अधिक सम्भावनापूर्ण लगता है क्योंकि एक महत्वपूर्ण व्यापारिक शक्ति के रूप में अपनी साख फिर से स्थापित करने के लिए वह दुनिया भर के देशों से जुडऩे की कोशिश करेगा। 

फिलहाल ब्रिटेन ने मुक्त-व्यापार सौदे करने के लिए भारत की बजाय ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को प्राथमिकता दी है। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिटेन में अपने समकक्ष बोरिस जॉनसन को गणतंत्र दिवस के लिए मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है जो दोनों पक्षों के लिए व्यापार समझौते को लेकर प्रारम्भिक विचार-विमर्श शुरू करने के लिए भी उपयुक्त अवसर हो सकता है। यू.के. और भारत के बीच वाॢषक 14 बिलियन डॉलर से अधिक मूल्य का व्यापार होता है जिसमें भारत के पास 2 बिलियन डॉलर का ट्रेड सरप्लस है। ऐसे में अनुमान है कि विपक्षी व्यापार सौदा होने से व्यापार 26 प्रतिशत तक बढऩे की क्षमता है। 

वहीं यह भी माना जा रहा है कि ‘ब्रैग्जिट’ समझौता हो जाने के चलते भारतीय शेयर बाजार भी नई ऊंचाइयां छू सकता है क्योंकि अब इससे जुड़ी अनिश्चितता खत्म हो गई है। सुनने में सब सकारात्मक लग रहा है। इसके संदर्भ में भारत को भी बहुत सी नीतियों पर ध्यान देना होगा। ईज आफ डूइंग बिजनैस पर ध्यान देना होगा। एक खास रिश्ता बनाने के लिए आयातकों और निर्यातकों को प्रोत्साहन देने की भी जरूरत होगी। 

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