Thursday, Jun 24, 2021
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‘कट्टरपंथी सोच’ का हथियार बन रहा ‘लव जेहाद’

  • Updated on 11/5/2020

इन दिनों देश के कुछ भागों में ‘लव जेहाद’ का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि प्यार के नाम पर कोई जेहाद नहीं होगा। उन्होंने 2 नवम्बर को कहा कि प्रदेश सरकार राज्य में इसके कथित प्रचलन को रोकने के लिए कानूनी व्यवस्था करेगी।

इसके साथ ही मध्यप्रदेश तीसरा भाजपा शासित राज्य बन गया है जिसने ‘लव जेहाद’ के खिलाफ  कानूनी प्रावधान बनाने के अपने इरादे की घोषणा की है। इससे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इसी तरह की घोषणा की थी।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 31 अक्तूबर को ‘लव जेहाद’ के खिलाफ  चेतावनी जारी की व कहा कि ‘सरकार ‘लव जेहाद’ की घटनाएं रोकने के लिए एक सख्त कानून लाने के लिए काम कर रही है।’

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश कि ‘विवाह के लिए धर्म परिवर्तन आवश्यक नहीं है,’ के दृष्टिगत यह बयान देते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं पहचान छुपाने वालों और हमारी बहनों के सम्मान के साथ खिलवाड़ करने वालों को कड़ी कार्रवाई की चेतावनी देता हूं। यदि आप अपना रास्ता नहीं बदलते हैं तो आपकी ‘राम नाम सत्य यात्रा’ शुरू हो जाएगी।’

आखिर ऐसी चेतावनी देने की वजह क्या है और इससे भी अधिक आवश्यक है यह जानना कि ‘लव जेहाद’ है क्या?
हाल ही में एक प्रसिद्ध कम्पनी के विज्ञापन जिसमें लड़की तो हिंदू थी और ससुराल मुसलमान, के खिलाफ़ आक्रोश बहुत सी जगहों और सोशल मीडिया पर नजर आया किंतु उसी संदर्भ में भोजन की होम डिलीवरी करने वाली एक कम्पनी के विज्ञापन जिसमें लड़की मुस्लिम थी और लड़का हिंदू, के विरुद्ध कोई आवाज नहीं उठी तो क्या यह ‘लव जेहाद’ मात्र हिन्दू लड़कियों को बचाने के लिए हैं? 

ऐसे में दो सवाल उठते हैं कि सरकारें व्यक्तिगत धार्मिक अधिकारों में क्यों दखलंदाजी करना चाह रही हैं जबकि भारत में धर्म की स्वतंत्रता संविधान द्वारा दिया गया एक मौलिक अधिकार है। भारत के प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म पर शांतिपूर्वक अमल करने और बढ़ावा देने का अधिकार है।

परंतु भारत के स्वतंत्रता अधिनियम या धर्म परिवर्तन विरोधी कानून राज्य स्तरीय कानून हैं जिन्हें अन्य धर्म परिवर्तनों को नियमित करने के लिए अधिनियमित किया गया है। आठ राज्यों अरुणाचल, ओडिशा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल, झारखंड और उत्तराखंड में ये कानून लागू हैं। 

राज्यों के धर्म परिवर्तन को प्रतिबंधित करने के लिए कानून विशेष रूप से बल या खरीद के माध्यम से धर्म परिवर्तनों को लक्षित कर रहे हैं। वर्तमान कानून ब्रिटिश भारत और कई रियासतों के कानूनों पर निर्भर हैं।
उड़ीसा 1967 में धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम लागू करने वाले सबसे शुरुआती राज्यों में से एक था। उड़ीसा अधिनियम 1967 का उद्देश्य एक धर्म से दूसरे धर्म में बल या उत्पीडऩ के इस्तेमाल से धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए एक अधिनियम के रूप में पारिभाषित करना है। 

कपटपूर्ण तरीकों से और आकस्मिक चिकित्सा के मामलों के लिए उड़ीसा अधिनियम, 1967 में उल्लिखित आपत्तिजनक साधनों के माध्यम से किसी को धर्म परिवर्तन करने के लिए निर्धारित सजा एक साल की जेल अथवा 50,000 रुपए का जुर्माना या दोनों थी। 

दिलचस्प बात यह है कि एक नाबालिग महिला या अनुसूचित जाति या जनजाति के किसी सदस्य को धर्म बदलने के लिए जुर्माना, दो साल के कारावास या 10,000 रुपए का जुर्माना या दोनों थे। कुल मिलाकर इस अधिनियम में ये अतिरिक्त दंड सरकार को बचाने के लिए शामिल किए गए थे। इन्हें समाज के कमजोर वर्गों के रूप में देखा जाता है। 

एक नाबालिग या महिला या अनुसूचित जनजाति/जातियों के सदस्य को धर्म परिवर्तन  करने के लिए बढ़ा हुआ जुर्माना इस विचार पर आधारित था कि जो लोग इन समूहों के व्यक्तियों का धर्म परिवर्तन कराते हैं वे उनकी गरीबी, सादगी और अज्ञानता का शोषण कर रहे थे। 

ऐसे में दूसरा प्रश्न उठता है कि क्या यह कानून पढ़ी-लिखी, आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाओं पर भी लागू होगा जो अपना फैसला अपनी मर्जी से विवेकपूर्वक ले सकती हैं और क्या इसमें लड़के भी शामिल होंगे?

हालांकि 2019 में  ‘लव जेहाद’ का शब्द और उसके पीछे की परिभाषा केरल में ‘सामूहिक परिवर्तन’ सामने आई परंतु अब यह कट्टरपंथी सोच का हथियार बनती जा रही है। आखिरकार इसका फैसला कौन करेगा, निजी अधिकारों का इस्तेमाल कौन करेगा? व्यक्ति या समाज या कानून?

सरकार किसी की निजी स्वतंत्रता पर कैसे अंकुश लगा सकती है? विचारणीय और गंभीर बात यह है कि सरकार इसे अब राष्ट्रीय कानून के रूप में लाना चाह रही है।

विडम्बना यह है कि जिस निर्णय को लेकर योगी आदित्यनाथ ‘लव जेहाद’ की बात कर रहे हैं, उसका ‘लव जेहाद’ से कोई लेना-देना नहीं बल्कि यह एक मुस्लिम महिला तथा एक हिंदू पुरुष से संबंधित है, जिन्होंने अपनी इच्छा से विवाह किया था और अपने परिवारों की ओर से विरोध को देखते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई है।

हालांकि अदालत ने  उनके ‘शांतिपूर्ण विवाहित जीवन में दखल देने से रोकने के लिए राज्य को निर्देश देने से इंकार किया है क्योंकि विवाह करवाने के लिए महिला ने पूरे तौर पर हिंदू धर्म अपना लिया।’

—विजय कुमार

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