Tuesday, Sep 28, 2021
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achievements of 20 years again missing in taliban aljwnt

20 साल की उपलब्धियां फिर तालिबानियों में गुम?

  • Updated on 6/28/2021

अमरीका और गठबंधन सेना अफगानिस्तान से अपनी वापसी कर रही है और अमरीका 9/11 हमलों की बीसवीं बरसी पर अफगानिस्तान में अपनी सैन्य उपस्थिति को खत्म करना चाहता है। इन सब बातों को देखते हुए क्षेत्रीय शक्तियां अफगानिस्तान में प्रभाव बनाने की होड़ में लगी हैं। वे एक नए भू-राजनीतिक संघर्ष के लिए मंच तैयार कर रही हैं। यहां तक कि तालिबान और अफगानिस्तान की अशरफ गनी सरकार की सेना भी देश के नियंत्रण के लिए तालिबान आतंकियों संग एक भयंकर युद्ध लड़ रही है।

इसी महीने चीन, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों ने अफगानिस्तान के भविष्य पर चर्चा करने के लिए एक वीडियो कांफ्रैंसिंग के माध्यम से मुलाकात की, जिसमें चीन, अफगानिस्तान और पाकिस्तान ने रेखांकित किया है कि अफगानिस्तान से अमरीका की सेनाओं की वापसी के बाद देश को एक उदार मुस्लिम नीति अपनानी चाहिए। 

इस बीच, भारत ने तालिबान के साथ न उलझने की अपनी लंबे समय से चली आ रही नीति को चुपचाप उलट दिया है और कतर में समूह के प्रतिनिधियों के साथ कथित तौर पर कूटनीतिक बातचीत शुरू कर दी है।

पड़ोसी देश पाकिस्तान, जो अभी भी तालिबान पर काफी प्रभाव रखता है, अफगानिस्तान के भविष्य को प्रभावित करने के भारत के प्रयासों पर जोर दे रहा है। इस सप्ताह ताजिकिस्तान में क्षेत्रीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की एक बैठक के दौरान, पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, मोईद यूसुफ ने नई दिल्ली पर परोक्ष रूप से कटाक्ष करते हुए कहा कि स्थिति बिगाडऩे वाले ‘बाहरी लोग’ अफगानिस्तान में शांति प्रयासों को पटरी से उतारने का प्रयत्न कर रहे हैं। 

कुछ विश्लेषकों को डर है कि कूटनीतिक छद्म युद्ध पहले से ही कमजोर देश को और अस्थिर कर सकता है और तालिबान को सशक्त बना सकता है क्योंकि वे अफगानिस्तान के पूर्ण अधिग्रहण पर नजर गड़ाए हुए हैं।

कुछ विश्लेषकों ने 19वीं शताब्दी में मध्य एशिया पर रूसी और ब्रिटिश साम्राज्यों के बीच राजनीतिक संघर्ष के तथाकथित ‘महान खेल’ की तुलना इसके साथ की है। हालांकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह एक नए बड़े खेल में ठोकर खाने से बचने के लिए काम कर रहे हैं। 

वहीं देश के उत्तर में मिलिशिया नेताओं और सरदारों, जिनमें कई प्रमुख मुजाहिदीन कमांडर शामिल हैं, जिन्होंने 9/11 से पहले तालिबान से लड़ाई लड़ी थी, ने एक बार फिर हथियार उठाकर और समर्थकों से एकजुट होने का आह्वान करते हुए शून्य को भरने के लिए कदम बढ़ाया है।

वर्षों से, अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने जिला स्तर पर सुरक्षा और शासन की जिम्मेदारी सौंपने के दबाव का विरोध किया है। अब जबकि स्थानीय ताकतें ही तालिबान को सत्ता संभालने से रोक रही हैं, इसलिए वे अपने क्षेत्रों में और अधिक शक्ति की मांग करेंगी।

जब काबुल ने अमरीका के लिए बड़ी कीमत पर एक पेशेवर सेना का निर्माण करने में वर्षों बिताए, तो स्वतंत्रता सेनानियों के प्रसार से पुरानी प्रतिद्वंद्विता और युद्धपोत की वापसी का खतरा पैदा हो गया।

तालिबान ने पहले ही गनी की वाशिंगटन यात्रा को ‘बेकार’ और अफगानिस्तान के लिए कोई लाभ नहीं होने के रूप में खारिज कर दिया है। तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने कहा कि, ‘‘गनी और सी.ई.ओ. अब्दुल्ला अब्दुल्ला, जो वाशिंगटन के अनुरोध के बाद उनके साथ हैं, अपनी शक्ति और व्यक्तिगत हितों के संरक्षण के लिए अमरीकी अधिकारियों के साथ बात करेंगे।’’

उन्होंने आगे कहा कि 1990 के दशक में जब अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन था, तब से लेकर अब यह देश बहुत अलग है। हालांकि तालिबान विद्रोही एक इस्लामी सरकार स्थापित करने के लिए लड़ाई जारी रखेंगे। वह अफगानिस्तान की गनी सरकार को वैध सरकार नहीं मानते। 

तालिबान एक ऐसा प्रशासन देना चाहेंगे जहां ङ्क्षलगों को सख्ती से अलग किया जाएगा, महिलाओं को हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया जाएगा, और बोलने और सभी प्रकार की ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ खत्म हो जाएगी है।

लेकिन अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि तालिबान अपनी प्रगति की गति से हैरान और चिंतित हैं और अब एक ऐसे आधुनिक देश में शासन करने की क्षमता नहीं दिखा रहे।

अफगान लोग भी महसूस कर रहे हैं कि वे दोबारा 20 साल पहले वाले अफगानिस्तान में लौटना नहीं चाहते। यदि स्थानीय विद्रोह पूरे देश में फैलते हैं और तालिबान के खिलाफ प्रभावशाली प्रदर्शन करते हैं, तो गतिशीलता बदल सकती है। 

अफगानिस्तान में यदि चीन अपना वर्चस्व बढ़ाता है तो रूस भी पीछे नहीं रहेगा। ऐसे में भारत को अपनी सुरक्षा के लिए अधिक मात्रा में अतिरिक्त सुरक्षा बल और सेना अपने पश्चिमी छोर पर लगानी होगी। तालिबान का रुख भारत के लिए अब भी नर्म नहीं हुआ है इसलिए ईरान के साथ मिल कर ही भारत अपना बचाव कर सकता है। जहां तक ईरान का संबंध है वह भी इस ताक में है, कि अफगानिस्तान का कुछ हिस्सा तो उसे मिले और व्यापार के रास्ते वह अपनी पैठ वहां बना सके। 
जहां तक पाकिस्तान का सवाल है वह कुछ महीनों से पाक-हिंदुस्तान दोस्ती के बारे में बातचीत कर रहा है दो दिन पहले पाक प्रधानमंत्री इमरान खान ने ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ को एक इंटरव्यू में कहा है कि अमरीका उन्हें वही महत्व दे जो वह भारत को देता है।

देखना अब यह है कि जिस प्रकार बुश या फिर ओबामा की सरकार यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान का अफगानिस्तान में तालिबान को संरक्षण और प्रशिक्षण देने में उसका कितना बड़ा हाथ है परंतु उसके भौगोलिक महत्व को देखते हुए उन्हें पाकिस्तान को अपने साथ मजबूरन रखना पड़ा।

हालांकि अब अमरीका में भी यह विचार और फिक्र बढ़ती जा रही है कि यदि हम पूरी तरह से अफगानिस्तान छोड़ निकल गए तो ईराक की तरह वहां लौटकर दोबारा नहीं जा पाएंगे ऐसे में यह नहीं भूलना चाहिए कि यह वही देश है जिसने ईराक और सीरिया में आतंकवादी भेजे और यहां के पाकिस्तान के समर्थन वाले आतंकियों ने अमरीका पर भी हमला किया था तो ऐसे में कहां से सूचनाओं का भंडार मिलेगा ! 

भारतीय आॢथक निवेश भी जाया हो सकता है परंतु उससे भी अधिक चिंता की बात है कि चीन अब तीसरी ओर से भी हमें घेर सकता है और अफगानिस्तान  के लिए भी चीन से पीछा छुड़ाना आसान न होगा क्योंकि वह रूस या अमरीका जैसा देश नहीं है।

- विजय कुमार

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